नई दिल्ली। धर्मांतरण और अनुसूचित जाति (SC) के दर्जे को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट कर दिया है कि, अगर कोई व्यक्ति अनुसूचित जाति समुदाय से है और बाद में ईसाई या किसी अन्य धर्म को अपनाता है, तो उसका अनुसूचित जाति का दर्जा तुरंत समाप्त हो जाएगा। ऐसे व्यक्ति को न तो SC/ST एक्ट के तहत सुरक्षा मिलेगी और न ही आरक्षण या अन्य संवैधानिक लाभों का दावा किया जा सकेगा।
सुप्रीम कोर्ट की दो जजों की पीठ ने यह फैसला सुनाते हुए आंध्र प्रदेश हाई कोर्ट के आदेश को सही ठहराया। अदालत ने कहा कि संविधान और 1950 के आदेश के अनुसार केवल हिंदू, सिख और बौद्ध धर्म के अनुसूचित जाति समुदायों को ही SC का दर्जा प्राप्त है।
यह मामला आंध्र प्रदेश के गुंटूर जिले के रहने वाले एक व्यक्ति से जुड़ा है। यह व्यक्ति जन्म से हिंदू था और अनुसूचित जाति समुदाय से संबंध रखता था। बाद में उसने ईसाई धर्म अपना लिया और करीब 10 वर्षों से ईसाई धर्म का पालन कर रहा था। इस व्यक्ति ने एक मामले में आरोप लगाया कि कुछ लोगों ने उसे जातिसूचक शब्द कहकर अपमानित किया। इसके बाद उसने आरोपियों के खिलाफ SC/ST एक्ट के तहत केस दर्ज कराया। हालांकि, आरोपियों ने इस केस को अदालत में चुनौती दी और कहा कि शिकायतकर्ता ने धर्म परिवर्तन कर लिया है और अब वह अनुसूचित जाति का सदस्य नहीं माना जा सकता।
मामले की सुनवाई के बाद आंध्र प्रदेश हाई कोर्ट ने शिकायतकर्ता की याचिका को खारिज कर दिया। कोर्ट ने कहा कि जब व्यक्ति ने ईसाई धर्म अपना लिया और सक्रिय रूप से उसका पालन कर रहा है, तो वह अनुसूचित जाति का सदस्य नहीं माना जा सकता। इस फैसले को चुनौती देते हुए शिकायतकर्ता ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। अब सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट के फैसले को बरकरार रखते हुए साफ कर दिया है कि धर्मांतरण के बाद SC दर्जा नहीं मिल सकता।
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि संविधान के तहत जारी Constitution (Scheduled Castes) Order, 1950 में यह स्पष्ट रूप से उल्लेख किया गया है कि अनुसूचित जाति का दर्जा केवल तीन धर्मों हिंदू, सिख और बौद्ध के अनुयायियों को ही दिया जा सकता है। अगर कोई व्यक्ति इन धर्मों को छोड़कर किसी अन्य धर्म जैसे ईसाई या मुस्लिम धर्म को अपनाता है, तो उसका SC दर्जा खुद ही समाप्त हो जाता है। कोर्ट ने कहा कि यह प्रतिबंध पूर्ण रूप से लागू है और इसमें किसी तरह का अपवाद नहीं है।
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सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में 1950 के आदेश के क्लॉज-3 का हवाला दिया। इस क्लॉज के अनुसार, अनुसूचित जाति का दर्जा केवल हिंदू, सिख और बौद्ध धर्म के लोगों को ही दिया जा सकता है। अगर कोई व्यक्ति अन्य धर्म अपनाता है तो वह SC समुदाय का सदस्य नहीं माना जाएगा। ऐसे व्यक्ति को किसी भी प्रकार के संवैधानिक लाभ या आरक्षण का अधिकार नहीं होगा। अदालत ने कहा कि यह नियम पूर्ण और बाध्यकारी है।
सुनवाई के दौरान अदालत के सामने कई ऐसे प्रमाण पेश किए गए जिससे यह स्पष्ट हुआ कि शिकायतकर्ता पिछले 10 वर्षों से सक्रिय रूप से ईसाई धर्म का पालन कर रहा था। अदालत ने रिकॉर्ड का हवाला देते हुए कहा कि, वह व्यक्ति चर्च में प्रार्थना करवाता था, संडे प्रेयर आयोजित करता था और खुद को एक ईसाई पादरी के रूप में प्रस्तुत करता था। इन सभी तथ्यों को देखते हुए अदालत ने माना कि वह व्यक्ति अब अनुसूचित जाति समुदाय का सदस्य नहीं माना जा सकता।
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सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में साफ कहा कि, किसी भी व्यक्ति का अनुसूचित जाति का दर्जा धर्म परिवर्तन करते ही समाप्त हो जाता है। भले ही वह जन्म से अनुसूचित जाति समुदाय में पैदा हुआ हो, लेकिन यदि वह हिंदू, सिख या बौद्ध धर्म छोड़कर किसी अन्य धर्म को अपना लेता है, तो उसका SC स्टेटस खत्म हो जाता है।
इसके बाद वह व्यक्ति SC/ST Act, 1989 के तहत संरक्षण का दावा नहीं कर सकता, आरक्षण का लाभ नहीं ले सकता और किसी भी सरकारी योजना में SC श्रेणी का लाभ नहीं ले सकता।
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में यह भी कहा कि कोई भी व्यक्ति एक साथ दो धार्मिक पहचान नहीं रख सकता। अदालत ने स्पष्ट किया कि, अगर कोई व्यक्ति ईसाई धर्म का पालन कर रहा है, तो वह हिंदू धर्म के आधार पर मिलने वाले आरक्षण या अन्य लाभों का दावा नहीं कर सकता। कोर्ट ने कहा कि कानून में दोहरा दर्जा मान्य नहीं है।
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि, अगर कोई व्यक्ति बाद में फिर से हिंदू, सिख या बौद्ध धर्म अपनाने का दावा करता है, तो उसे कुछ शर्तें पूरी करनी होंगी। अदालत के अनुसार उसे यह साबित करना होगा कि, उसने वास्तव में अपने पुराने धर्म को दोबारा अपनाया है, संबंधित समुदाय ने उसे स्वीकार कर लिया है और वह सामाजिक रूप से उसी समुदाय का हिस्सा बन गया है। इन तीनों बातों को साबित किए बिना SC दर्जा बहाल नहीं किया जा सकता।
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सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में यह भी कहा कि अनुसूचित जाति के दर्जे पर लगा संवैधानिक प्रतिबंध पूर्ण है। अदालत के अनुसार, कोई भी राज्य सरकार कोई भी कानून या कोई भी नीति इस नियम को बदल नहीं सकती। SC स्टेटस का निर्धारण केवल संविधान और 1950 के आदेश के अनुसार ही होगा।
सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले की प्रमुख बातें इस प्रकार हैं-