वैवाहिक विवाद में POCSO केस पर सुप्रीम कोर्ट के नए निर्देश, बिना पुख्ता जानकारी के नहीं होगी गिरफ्तारी

वैवाहिक विवाद में POCSO मामलों को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने अहम दिशा-निर्देश जारी किए हैं। अब पुलिस आरोपी की तत्काल गिरफ्तारी नहीं कर सकेगी। गिरफ्तारी से पहले बाल मनोवैज्ञानिक की राय और अन्य सबूतों पर विचार करना होगा।
वैवाहिक विवाद में POCSO केस पर सुप्रीम कोर्ट के नए निर्देश, बिना पुख्ता जानकारी के नहीं होगी गिरफ्तारी

नई दिल्ली। वैवाहिक विवाद और बच्चों की कस्टडी से जुड़े मामलों में POCSO एक्ट के कथित दुरुपयोग को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने अहम दिशा-निर्देश जारी किए हैं। कोर्ट ने कहा है कि पति-पत्नी के बीच विवाद के दौरान दर्ज POCSO मामलों में पुलिस आरोपी की तत्काल या रूटीन गिरफ्तारी नहीं कर सकेगी। गिरफ्तारी से पहले मामले में अपराध होने की पर्याप्त और पुख्ता जानकारी होना जरूरी होगा। सुप्रीम कोर्ट के सामने ऐसा मामला आया था, जिसमें वैवाहिक विवाद के दौरान मां ने पिता पर अपनी 9 साल की बेटी के यौन शोषण का आरोप लगाया था। यह मामला 2024 में दर्ज कराया गया था। सोर्स के मुताबिक, CBI जांच में सामने आया कि बच्ची की कस्टडी हासिल करने के लिए मां की ओर से कथित तौर पर झूठी FIR दर्ज कराई गई थी। इसके बाद जस्टिस जे.बी. पारडीवाला और जस्टिस के.वी. विश्वनाथन की बेंच ने बच्चे की कस्टडी दोबारा पिता को सौंप दी।

गिरफ्तारी से पहले विशेषज्ञ की राय जरूरी

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि वैवाहिक विवाद के दौरान दर्ज POCSO मामलों में पुलिस को बिना सोचे-समझे गिरफ्तारी से बचना होगा। गिरफ्तारी से पहले बाल मनोवैज्ञानिक या मनोचिकित्सक से बच्चे के बारे में निष्पक्ष राय लेना जरूरी होगा। विशेषज्ञ बच्चे से बातचीत कर उसका स्वतंत्र आकलन करेंगे। योग्य विशेषज्ञ के चयन के लिए जिला बाल संरक्षण इकाई यानी DCPU से सलाह ली जा सकेगी। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि गिरफ्तारी का फैसला केवल शिकायत के आधार पर नहीं लिया जाना चाहिए। जांच अधिकारी को मामले में सामने आए दूसरे सबूतों के साथ बाल मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ की रिपोर्ट पर भी गंभीरता से विचार करना होगा। विशेषज्ञ रिपोर्ट के बिना कोई कठोर कदम नहीं उठाया जाएगा।

कोर्ट में सीधे शिकायत पर भी सावधानी

सुप्रीम कोर्ट ने ऐसे मामलों में अदालतों के लिए भी सावधानी बरतने को कहा है। अगर कोई माता-पिता BNSS की धारा 33 के तहत सीधे कोर्ट में शिकायत दर्ज कराते हैं, तो जज को मामले का संज्ञान लेने और आरोपी को समन जारी करने से पहले बच्चे का मूल्यांकन बाल मनोचिकित्सक से कराना होगा।

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हर थाने और फैमिली कोर्ट तक पहुंचेगा आदेश

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इन दिशा-निर्देशों की जानकारी देश के सभी थानों और फैमिली कोर्ट तक पहुंचना जरूरी है। इसके लिए कोर्ट ने अपनी रजिस्ट्री को फैसले की कॉपी सभी राज्यों के मुख्य सचिवों और हाईकोर्ट को भेजने का निर्देश दिया है। कोर्ट ने वैवाहिक विवादों में बच्चों से जुड़े यौन शोषण के आरोपों को गंभीरता से लेते हुए कहा कि कानूनी बढ़त हासिल करने के लिए इस तरह के आरोप लगाए जाने की स्थिति में निर्दोष पक्ष को गंभीर सामाजिक और व्यक्तिगत नुकसान हो सकता है।

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By Sona Rajput

माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय से मास कम्युनिकेशन किया है। साल 2022 ...Read More

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