पल्लवी वाघेला, भोपाल
साल 2022 में शुरू हुए इस कार्यक्रम से अब तक 7 हजार 236 से ज्यादा किशोर जुड़ चुके हैं। ये टीनएजर न सिर्फ अपनी सोच बदल रहे हैं, बल्कि समाज में भी सकारात्मक बदलाव ला रहे हैं।
भोपाल की अन्ना नगर बस्ती के 17 साल के आदित्य ने पीरियड्स जैसे मुद्दे पर खुलकर अपनी बात रखी। जबलपुर में मप्र जेजे बोर्ड के कार्यक्रम में उन्होंने कहा कि स्कूलों में गर्ल्स के लिए अलग रेस्ट और चेंजिंग रूम होना चाहिए और इस पर बच्चों में जागरूकता जरूरी है। एक लड़के द्वारा यह मुद्दा उठाना सभी के लिए चौंकाने वाला था, जिसे जजेस ने भी सराहा। खास बात यह है कि तीन साल पहले तक आदित्य की सोच अलग थी और ईव टीजिंग को वह सामान्य मानता था। लेकिन ‘सृजन’ कार्यक्रम से जुड़ने के बाद उसकी सोच में बड़ा बदलाव आया। अब वह एक चेंज मेकर के रूप में काम कर रहा है और समाज में जागरूकता फैलाने की दिशा में सक्रिय है।

बता दें कि यह कार्यक्रम मप्र पुलिस की सामुदायिक पुलिसिंग के तहत शुरू किया गया है, जिसकी पहल डीआईजी विनीत कपूर ने की थी। इसमें निवसीड-बचपन, उदय, मुस्कान, आरंभ, साथिया, मीत और संगिनी जैसे एनजीओ सहयोग कर रहे हैं। निवसीड बचपन की निहारिका पंसोरिया के मुताबिक बस्तियों में जाकर बच्चों और उनके माता-पिता से संवाद किया जाता है और उन्हें इस कार्यक्रम से जोड़ा जाता है। यह पहल पुलिस और जनता के बीच भरोसे का सेतु भी बन रही है। 18 से 20 दिनों के प्रशिक्षण में बच्चों को अनुशासन, खेल, सेल्फ डिफेंस और सामाजिक कुरीतियों के प्रति जागरूक किया जाता है। साथ ही बच्चों को उनके अधिकारों के बारे में भी जानकारी दी जाती है।
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मुस्कान संस्था के जरिए 2024 में 15 वर्षीय शीतल इस कार्यक्रम से जुड़ी थी। उसने बाल विवाह की समस्या को समझते हुए अपनी ही बचपन में हुई शादी को शून्य करवाया और अब वह दसवीं की पढ़ाई कर रही है। इतना ही नहीं, उसकी प्रेरणा से एक अन्य किशोरी ने भी अपनी शादी को अमान्य कराया। शीतल अब बच्चों को स्कूल से जोड़ने और अपने कंजर समुदाय में नशामुक्ति के लिए भी काम कर रही है। यह उदाहरण दिखाता है कि सही मार्गदर्शन मिलने पर किशोर किस तरह अपने और समाज के भविष्य को बदल सकते हैं।

आदित्य शाह बताते हैं, 'मैं 2023 में निवसीड बचपन संस्था के जरिए ‘सृजन’ से जुड़ा और इसके बाद मेरी जेंडर समानता को लेकर सोच पूरी तरह बदल गई। अब मैं घर में खाना भी बनाता हूं और मुझे देखकर कई युवाओं ने भी यह जिम्मेदारी लेना शुरू की है। मैंने लड़कों को समझाया कि लड़कियों का पीछा करना या उन पर टिप्पणी करना मर्दानगी नहीं है।' इसी के साथ महक रघुवंशी कहती हैं, 'हम पांच बहनें हैं और पापा को बेटा न होने का दुख था, लेकिन सृजन के बाद जब मैं ट्रॉफी जीतकर घर पहुंची तो उन्होंने गर्व से मिठाई बांटी।' सृजन के कोऑर्डिनेटर ऋतुराज सिंह के मुताबिक यह प्रयास 26 जिलों में जारी है और लक्ष्य है कि हर बच्चे को जागरूक बनाकर जिम्मेदार नागरिक तैयार किया जाए।