
23 अप्रैल को बद्रीनाथ धाम के कपाट खुलने के साथ ही चार धाम यात्रा शुरू हो गई है। उत्तराखंड में स्थित बद्रीनाथ धाम भगवान विष्णु के प्रमुख तीर्थों में से एक है। यह धाम अपने धार्मिक महत्व के साथ-साथ अनोखी परंपराओं के लिए भी जाना जाता है। इन्हीं में से एक परंपरा है यहां पूजा के समय शंख नहीं बजाया जाता।
हिंदू धर्म में शंख को भगवान विष्णु का प्रिय माना जाता है। आमतौर पर मंदिरों में पूजा के दौरान शंखनाद किया जाता है, लेकिन बद्रीनाथ धाम में यह परंपरा नहीं निभाई जाती। यही वजह है कि भक्तों के मन में यह सवाल उठता है कि आखिर यहां शंख क्यों नहीं बजाया जाता। आइए इससे जुड़ी धार्मिक और पौराणिक मान्यताओं के बारे में जानते हैं...
मान्यता है कि बद्रीनाथ वह स्थान है जहां भगवान विष्णु ने लंबे समय तक तपस्या की थी। इस जगह की शांति बनाए रखने के लिए शंखनाद नहीं किया जाता, क्योंकि इसकी तेज आवाज साधना में बाधा डाल सकती है।
एक अन्य कथा के अनुसार, जब माता लक्ष्मी ध्यान में लीन थीं, तब भगवान विष्णु ने एक राक्षस का वध किया। परंपरा के अनुसार विजय के बाद शंख बजाया जाता है, लेकिन लक्ष्मी जी की साधना भंग न हो, इसलिए भगवान विष्णु ने शंख नहीं बजाया। तभी से यहां यह परंपरा चली आ रही है।
एक पौराणिक कहानी यह भी कहती है कि एक राक्षस शंख के अंदर छिप गया था। अगर शंख बजाया जाता, तो वह बाहर निकलकर नुकसान पहुंचा सकता था। इसी वजह से यहां शंख बजाने की मनाही मानी जाती है।
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हिंदू मान्यताओं के अनुसार, नागों को दिव्य और शक्तिशाली प्राणी माना जाता है। माना जाता है कि बद्रीनाथ और आसपास के हिमालयी क्षेत्रों में नागों का निवास होता है। शंख की तेज ध्वनि से कंपन पैदा होता है, जो नागों को परेशान कर सकता है।
पुराने समय में लोग प्रकृति को संवेदनशील मानते थे, इसलिए इस संतुलन को बनाए रखने के लिए शंख न बजाने की परंपरा बनाई गई।
कुछ लोग इसके पीछे वैज्ञानिक कारण भी मानते हैं। बद्रीनाथ पहाड़ी और बर्फीला क्षेत्र है, जहां सर्दियों में भारी बर्फबारी होती है। शंख की तेज आवाज पहाड़ों से टकराकर गूंज पैदा कर सकती है, जिससे बर्फ में दरार या हिमस्खलन का खतरा बढ़ सकता है।
बद्रीनाथ धाम में शंख न बजाने की परंपरा आस्था, पौराणिक कथाओं और प्रकृति के संतुलन से जुड़ी मानी जाती है। यही वजह है कि आज भी इस नियम का पालन किया जाता है और यह परंपरा धाम की विशेष पहचान बन चुकी है।