दिल से निकलेगी न मरकर भी वतन की उल्फत, मेरी मिट्टी से भी खुशबू-ए-वतन आएगी। भगत सिंह के वो शब्द जिसे सुनकर हमें आज भी आजादी की क्रांति की याद दिलाते है। हर साल 23 मार्च हमें एक सच्चाई याद दिलाता है भारत की आजादी कोई आसान जीत नहीं थी। यह हजारों वीरों के खून, संघर्ष और हिम्मत का परिणाम है। उन वीरों में सबसे पहले नाम आता है भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव का। इन तीनों नौजवानों ने देश के लिए अपनी जान तक कुर्बान कर दी और इतिहास में अमर हो गए।
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हर साल 23 मार्च को शहीद दिवस मनाया जाता है। इसी दिन साल 1931 में अंग्रेजों ने भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव को फांसी दे दी थी। यह दिन सिर्फ तीन नामों को याद करने का नहीं है, बल्कि उन सभी वीरों को श्रद्धांजलि देने का दिन है जिन्होंने देश के लिए अपनी जान दे दी।

भगत सिंह सिर्फ एक नाम नहीं, एक विचार हैं। उनका मानना था कि आजादी मांगने से नहीं, लड़कर मिलती है।
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1919 में हुए जलियावाला ने उनके मन पर गहरा असर डाला। उस समय वे सिर्फ 12 साल के थे, लेकिन इस घटना ने उनके अंदर अंग्रेजों के खिलाफ आग भर दी। उन्होंने युवाओं को जगाया और इंकलाब जिंदाबाद का नारा दिया, जो आज भी गूंजता है।
जब लाला लाजपत राय की मौत अंग्रेजों की लाठीचार्ज में हुई, तो भगत सिंह और उनके साथियों ने इसका बदला लेने का फैसला किया। उन्होंने अंग्रेज अधिकारी सांडर्स की हत्या की। इसके बाद 8 अप्रैल 1929 को भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने दिल्ली की असेंबली में बम फेंका। लेकिन खास बात यह थी कि वे भागे नहीं। उन्होंने खुद गिरफ्तारी दी ताकि अपने विचार पूरे देश तक पहुंचा सकें।
भगत सिंह करीब दो साल तक जेल में रहे। इस दौरान उन्होंने कई लेख लिखे और अपने विचारों से लोगों को प्रेरित किया। उनका मानना था कि असली लड़ाई सोच की होती है, और जब सोच बदलती है, तो समाज बदलता है।

23 मार्च 1931 की शाम, करीब 7:23 बजे, तीनों क्रांतिकारियों को फांसी दे दी गई। कहा जाता है कि वे हंसते-हंसते फांसी के फंदे पर चढ़ गए। उनके चेहरे पर डर नहीं, बल्कि देश के लिए गर्व था। आज पंजाब के Hussainiwala National Martyrs Memorial में उनकी समाधियां मौजूद हैं, जो हर किसी को यह याद दिलाती हैं कि आजादी मुफ्त में नहीं मिली।
शहीद दिवस हमें यह सिखाता है कि देश सबसे ऊपर है। यह दिन हमें उन बलिदानों की याद दिलाता है, जो आज की आजादी की नींव हैं।
यह सिर्फ इतिहास नहीं, एक जिम्मेदारी है देश के लिए कुछ करने की, अपने कर्तव्यों को निभाने की।