प्रवीण श्रीवास्तव, भोपाल। 65 साल के राकेश सिन्हा की अपने बेटे सिद्धार्थ से सिर्फ इसलिए नहीं बनती कि क्योंकी बेटा यू ट्यूबर ध्रुव राठी को पसंद करता है। पिता का मानना है कि ध्रुव राठी एंटी बीजेपी है। वहीं, सिद्दार्थ का मानना है कि राठी सही बात सबके सामने रखता है। यह मतभेद इतना बढ़ गया कि पिता ने बेटे को संपत्ति बेदखल करने की धमकी तक दे दी। इसी तरह 75 साल के रोशन सिंह पीएम के प्रशंसक हैं, जबकि बेटी अन्य पार्टी को सपोर्ट करती हैं। रोशन सिंह को यह पसंद नहीं कि उनकी बेटी पीएम को लेकर नकारात्मक पोस्ट करे।
सोशल मीडिया पर दिखने वाली पोस्ट का असर अब पारिवारिक रिश्तों पर हो रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि यह सिर्फ सामाजिक नहीं, बल्कि न्यूरो साइकोलॉजिकल समस्या है। इसे कलेक्टिव कॉग्निटिव डिस्टॉर्शन के रूप में देखा जा रहा है, जिसमें व्यक्ति अपनी पसंद की बाते देखना और सुनना चाहता है और दूसरों से भी वही उम्मीद रखता है। ऐसा ना होने पर टकराव शुरू हो जाता है। डॉक्टर्स का मानना है कि बीते कुछ सालों में ऐेस मामले बढ़े हैं। दरअसल सोशल मीडिया का प्रभाव बढने से इस तरह के मामलों में भी इजाफा होने लगा है।
गांधी मेडिकल कॉलेज भोपाल की असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. रुचि सोनी के मुताबिक जब कोई व्यक्ति अपनी पसंद के विचारों से मेल खाता कंटेंट देखता है, तो मस्तिष्क में डोपामिन रिलीज होता है, जो रिवार्ड सिस्टम को एक्टिव करता है। इससे व्यक्ति बार-बार उसी तरह की जानकारी की ओर आकर्षित होता है। वहीं, विरोधी विचार आने पर कोर्टिसोल जैसे स्ट्रेस हार्मोन बढ़ते हैं, जिससे चिड़चिड़ापन और आक्रामकता बढ़ती है। इस न्यूरोलॉजिकल प्रक्रिया के कारण व्यक्ति अनजाने में ही अपनी सोच को बचाने के लिए दूसरों से टकराने लगता है और रिश्तों में दूरी आ जाती है।
गांधी मेडिकल कॉलेज की मनोचिकित्सक डॉ. रुचि सोनी बताती हैं-सोशल मीडिया के एल्गोरिदम इस प्रवृत्ति को मजबूत करते हैं, जिससे व्यक्ति एक इको चैंबर में फंस जाता है। डोपामिन सक्रिय होते हैं, अपनी सोच सही होने का सुखद अहसास देते हैं।
डिजिटल प्लेटफॉर्म पर मिलने वाला रिवार्ड व्यक्ति को अपनी ही सोच में कैद कर देता है। कई ऐसे केस आते हैं जिसमें व्यक्तिगत पसंद या विचारों से रिश्ते प्रभावित हो जाते हैं।
डॉ. राहुल शर्मा, क्लीनिकल साइकोलॉजिस्ट, जेपी अस्पताल