दूधी सिर्फ नदी नहीं, गांव की जीवनरेखा, पानी बचाने के साथ कचरे से कमाई और तकनीक से रोजगार पर जोर

सीहोर। किसी गांव की जिंदगी सिर्फ खेतों में उगने वाली फसल से नहीं चलती, उसकी असली ताकत पानी, मिट्टी, ऊर्जा और स्थानीय संसाधनों में छिपी होती है। जब जलस्रोत सूखते हैं तो सिर्फ नदी की धार नहीं रुकती, बल्कि खेतों की हरियाली, पशुपालन, रोजगार और गांव की आर्थिक रफ्तार भी प्रभावित होती है। इसी सोच के साथ जावर में आयोजित विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी आधारित प्रशिक्षण एवं जागरूकता कार्यक्रम में दूधी नदी संरक्षण को गांव की आत्मनिर्भरता से जोड़ने पर जोर दिया गया।
नदी को बचाना है तो पूरी व्यवस्था बदलनी होगी
शासकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय में आयोजित कार्यक्रम में दक्षिण कोरिया से जुड़े सीनियर रिसर्चर डॉ. आकाश पटेल, वैज्ञानिक डॉ. सत्यम मिश्रा और डॉ. राजकुमार मालवीय ने ग्रामीणों से सीधा संवाद किया। विशेषज्ञों ने कहा कि दूधी नदी को बचाने के लिए केवल नदी की सफाई पर्याप्त नहीं है। बारिश के पानी को रोकना, भूजल को रिचार्ज करना, कचरे को नदी तक पहुंचने से रोकना और स्थानीय संसाधनों का वैज्ञानिक उपयोग जरूरी है।
‘दूधी में पानी के साथ भविष्य भी जुड़ा है’
डॉ. राजकुमार मालवीय ने कहा कि दूधी को सिर्फ एक नदी मानकर संरक्षण करने की बजाय इसे गांव की आर्थिक धुरी के रूप में देखना होगा। उन्होंने कहा कि नदी का पानी खेतों, कुओं, नालों और भूजल से जुड़ा है। यदि बारिश का पानी गांव में रुके और जमीन के भीतर पहुंचे तो आने वाले वर्षों में जल संकट को काफी हद तक कम किया जा सकता है। उन्होंने सोकपिट, रिचार्ज संरचनाओं और स्थानीय जल संरक्षण तकनीकों को बढ़ावा देने की बात कही। उनका संदेश साफ था। जलस्रोत बचेंगे तो खेती बचेगी, खेती बचेगी तो गांव की आय और रोजगार भी बचेंगे।
डव्वा पंचायत ने दिखाया गांव बदलने का रास्ता
दक्षिण कोरिया से जुड़े सीनियर रिसर्चर डॉ. आकाश पटेल ने महाराष्ट्र के गोंदिया जिले की डव्वा ग्राम पंचायत का उदाहरण देकर ग्रामीणों को समझाया कि बदलाव के लिए हमेशा बड़े बजट की जरूरत नहीं होती। सही योजना, स्थानीय संसाधनों की पहचान और ग्रामीणों की सामूहिक भागीदारी से गांव की तस्वीर बदली जा सकती है। उन्होंने बताया कि डव्वा में सौर ऊर्जा, जल संरक्षण, पौधरोपण और कचरा प्रबंधन को एक-दूसरे से जोड़ा गया। इसी तरह स्थानीय जरूरतों के अनुसार कुरावर में भी एक ऐसा मॉडल तैयार किया जा सकता है, जिसमें पर्यावरण संरक्षण के साथ ग्रामीणों के लिए आय और रोजगार के अवसर पैदा हों।
कचरा नहीं, कमाई का साधन है जैविक अवशेष
डॉ. पटेल ने ग्रामीणों को बताया कि घर, खेत और पशुपालन से निकलने वाला हर अवशेष बेकार नहीं होता। जैविक कचरे से खाद, गोबर से बायोगैस और कृषि अवशेषों से ऊर्जा तैयार की जा सकती है। इससे एक ओर गांव में स्वच्छता बढ़ेगी, वहीं दूसरी ओर ईंधन और खाद पर होने वाला खर्च कम होगा। उन्होंने कहा कि यदि युवा इन गतिविधियों को तकनीकी प्रशिक्षण के साथ अपनाएं तो गांव में छोटे-छोटे उद्यम खड़े किए जा सकते हैं। यानी कचरा उठाने से लेकर उसके प्रसंस्करण तक रोजगार की नई श्रृंखला तैयार हो सकती है।
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फूड वेस्ट और गोबर से बनेगी ऊर्जा
वैज्ञानिक डॉ. सत्यम मिश्रा ने जैविक कचरे से बायोगैस तैयार करने की संभावनाओं पर विस्तार से जानकारी दी। उन्होंने कहा कि घरों से निकलने वाले गीले कचरे को अलग एकत्र कर उसका उपयोग खाद और बायोगैस बनाने में किया जा सकता है। प्रशिक्षण के दौरान गीले और सूखे कचरे का पृथक्करण, कम्पोस्टिंग, बायोगैस, प्लास्टिक संग्रहण, वर्षाजल संचयन, भूजल रिचार्ज और सौर ऊर्जा जैसे विषयों पर ग्रामीणों को जानकारी दी गई।
पानी, कचरा, खेती और ऊर्जा-एक ही मॉडल में
विशेषज्ञों ने ग्रामीण विकास का ऐसा मॉडल अपनाने की जरूरत बताई जिसमें पानी, कचरा, खेती और ऊर्जा अलग-अलग विषय न होकर एक-दूसरे से जुड़े हों। बारिश का पानी जमीन में उतरे, जैविक कचरे से खाद और ऊर्जा बने, कृषि अवशेषों का उपयोग हो और सौर ऊर्जा से बिजली की जरूरत पूरी हो तो गांव का खर्च घटने के साथ स्थानीय आय बढ़ सकती है।विशेषज्ञों ने स्पष्ट किया कि तकनीक का मतलब महंगे उपकरण खरीदना नहीं, बल्कि स्थानीय समस्या का टिकाऊ, सरल और कम खर्च वाला समाधान तलाशना है।
युवाओं के हाथ में गांव के भविष्य की नई दिशा
कार्यक्रम में युवाओं और विद्यार्थियों को विशेष रूप से ऐसी गतिविधियों से जोड़ने पर जोर दिया गया, जिनसे उनमें तकनीकी कौशल विकसित हो सके। विशेषज्ञों का मानना है कि गांव के युवा यदि जल संरक्षण, कचरा प्रबंधन, सौर ऊर्जा, जैविक खाद और बायोगैस जैसे क्षेत्रों में प्रशिक्षण लें तो रोजगार के लिए बाहर जाने की मजबूरी कम हो सकती है। यह मॉडल गांव में ‘समस्या से समाधान और समाधान से रोजगार’ की नई सोच पैदा कर सकता है।
सरपंच बोलीं-दूधी की जिम्मेदारी हर घर की
सरपंच सुमित्रा देवी ने कहा कि दूधी नदी संरक्षण का अभियान तभी सफल होगा, जब पंचायत के साथ प्रत्येक परिवार अपनी जिम्मेदारी समझे। जल संरक्षण, स्वच्छता और कचरा प्रबंधन को केवल अभियान नहीं, बल्कि रोजमर्रा की आदत बनाना होगा। उन्होंने कहा, “दूधी हमारी जीवनरेखा है। इसे स्वच्छ और जीवंत रखने के लिए पंचायत के साथ हर ग्रामीण को जिम्मेदारी निभानी होगी। विज्ञान और तकनीक के जरिए गांव के संसाधनों का बेहतर उपयोग कर कुरावर को स्वच्छ, आत्मनिर्भर और विकसित बनाने का प्रयास किया जाएगा।”
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विज्ञान भवन भोपाल के प्रायोजन से चल रहा अभियान
यह प्रशिक्षण एवं जागरूकता अभियान मां हिंगलाज सेवा समिति के आयोजन, मध्यप्रदेश विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी परिषद, विज्ञान भवन भोपाल के प्रायोजन और कर्मयोगी जनकल्याण समिति के सहयोग से चलाया जा रहा है। कार्यक्रम में शासकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय के प्राचार्य, ग्राम पंचायत सचिव गजेन्द्र सिंह ठाकुर, समाजसेवी एवं स्थानीय संयोजक राधेश्याम मंडलोई सहित ग्रामीण मौजूद रहे।




















