सीहोर: 17 दिन तक मॉर्च्युरी में रखा नवजात का शव, माता-पिता बोले- जिंदा थी तो मिलने नहीं दिया

सीहोर। श्यामपुर तहसील के ग्राम सीलखेड़ा निवासी मजदूर शिवनारायण की पत्नी सविता बाई ने 30 जून को सीहोर जिला अस्पताल में बच्ची को जन्म दिया था। जन्म के समय बच्ची का वजन कम होने के कारण उसे स्पेशल न्यूबॉर्न केयर यूनिट (एसएनसीयू) में भर्ती किया गया। परिजनों के मुताबिक बच्ची करीब तीन सप्ताह तक अस्पताल में भर्ती रही। सविता का कहना है कि वह कई दिनों तक अस्पताल में रहकर बच्ची को दूध पिलाने जाती थीं। उनके आरोप के अनुसार, बच्ची की हालत के बारे में उन्हें पर्याप्त जानकारी नहीं दी जाती थी और बच्ची को देखने के दौरान डॉक्टर और स्टाफ उन्हें दूर रहने के लिए कहते थे।
मां बोली- बच्ची जिंदा थी तो देखने तक को तरस गए
सविता ने कहा कि डॉक्टरों से बार-बार बच्ची को देखने और उसकी रिपोर्ट जानने की कोशिश की गई। उनका आरोप है कि उन्हें बताया गया कि बच्ची का वजन बढ़ने तक अस्पताल से छुट्टी नहीं दी जाएगी। परिवार बच्ची को बेहतर इलाज के लिए निजी अस्पताल ले जाना चाहता था, लेकिन उन्हें छुट्टी नहीं दी गई। सविता का कहना है कि बेटी के इलाज को लेकर परिवार लगातार चिंतित था, लेकिन उन्हें उसकी वास्तविक स्थिति की पूरी जानकारी नहीं मिल सकी।
सिवनी में युवती ने आत्महत्या: स्कूल परिसर में फंदे पर मिला शव, पुलिस जांच में जुटी
इलाज में खर्च हुए करीब एक लाख
शिवनारायण मजदूरी कर परिवार का भरण-पोषण करते हैं। उनके मुताबिक रोजाना करीब 200 से 300 रुपए की मजदूरी से परिवार का खर्च चलता है। पत्नी की डिलीवरी और बच्ची के लंबे इलाज के दौरान परिवार पर आर्थिक दबाव बढ़ गया। परिजनों का दावा है कि अस्पताल में रहने, आने-जाने, खाने-पीने और इलाज से जुड़े खर्च में करीब 80 हजार से एक लाख रुपए तक खर्च हो गए। उनका कहना है कि अगर बच्ची की बीमारी और स्थिति की स्पष्ट जानकारी दी जाती तो वे अपनी आर्थिक क्षमता के अनुसार आगे के इलाज का फैसला कर सकते थे।
जिला अस्पताल से नहीं मिली छुट्टी
आवेदन में बच्ची की तबीयत 23 जुलाई को बिगड़ने और 24 जुलाई को अस्पताल से उसकी मौत की सूचना मिलने की बात कही गई है। वहीं सिविल सर्जन का कहना है कि बच्ची की मौत 24 जुलाई को हुई। परिवार का आरोप है कि 23 जुलाई को जब बच्ची की हालत बिगड़ी तो उन्होंने निजी अस्पताल में इलाज कराने के लिए डॉक्टर से छुट्टी मांगी थी, लेकिन डॉक्टर ने बच्ची का वजन 1 किलो 800 ग्राम होने तक छुट्टी नहीं देने की बात कही।
परिजनों ने डॉक्टरों पर लगाया लापरवाही का आरोप
शिवनारायण ने पुलिस अधीक्षक को दिए आवेदन में आरोप लगाया है कि 24 जुलाई को अस्पताल से फोन कर बच्ची की मौत की सूचना दी गई और हस्ताक्षर कर शव ले जाने के लिए कहा गया। परिवार ने शव लेने से इनकार करते हुए कहा कि जब बच्ची की तबीयत खराब थी तब छुट्टी नहीं दी गई, अब वे शव नहीं लेंगे। आवेदन में यह भी आरोप लगाया गया है कि अस्पताल की ओर से पुलिस में शिकायत करने और जेल भेजे जाने की बात कहकर दबाव बनाया गया। परिजन ने बच्ची की मौत को लेकर संदेह जताते हुए पूरे मामले की जांच और जिम्मेदार लोगों पर कार्रवाई की मांग की है।
सिविल सर्जन बोले-परिजन इलाज में परिजन सहयोग नहीं कर रहे थे
जिला अस्पताल के सिविल सर्जन डॉ. यूके श्रीवास्तव ने बताया कि बच्ची का जन्म 30 जून को हुआ था और कम वजन के कारण उसे एसएनसीयू में भर्ती किया गया था। उनके अनुसार इलाज के दौरान बच्ची की स्थिति में अपेक्षित सुधार नहीं हुआ। सिविल सर्जन का कहना है कि परिजन इलाज में सहयोग नहीं कर रहे थे और 20 जुलाई को अस्पताल से चले गए थे। अस्पताल की ओर से उन्हें बच्ची की स्थिति की जानकारी दी गई थी। इसके बाद 24 जुलाई को बच्ची की मौत हो गई। मौत के बाद परिजन शव लेने नहीं आए, जिसके चलते शव मॉर्च्युरी में रखा गया है।
भोपाल: होटल में फर्जी पुलिसकर्मी बनकर युवक-युवती से ठगी, 70 हजार वसूले; 3 आरोपी गिरफ्तार
17 दिन से मॉर्च्युरी में रखा शव
अस्पताल प्रबंधन के अनुसार नवजात का शव 17 दिनों से मॉर्च्युरी में रखा हुआ है। प्रबंधन का कहना है कि शव को लंबे समय तक सुरक्षित रखना संभव नहीं है और अधिक समय बीतने पर उसके खराब होने का खतरा रहता है। अस्पताल की ओर से परिजनों से संपर्क कर शव ले जाने के लिए समझाइश देने की बात कही गई है।
एसपी और कलेक्टर से जांच की मांग
परिजनों ने पुलिस अधीक्षक सोनाक्षी सक्सेना, कलेक्टर बाला गुरु के, कोतवाली थाना सहित अन्य अधिकारियों को आवेदन देकर मामले की जांच की मांग की है। आवेदन में एसएनसीयू के डॉक्टर जयप्रकाश परमार पर लापरवाही के आरोप लगाए गए हैं। परिजनों का कहना है कि बच्ची की हालत बिगड़ने के बाद भी उन्हें निजी अस्पताल ले जाने के लिए छुट्टी नहीं दी गई और बाद में बच्ची की मौत हो गई। फिलहाल मामले में परिजनों के आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है। अस्पताल प्रबंधन ने इलाज में लापरवाही के आरोपों को स्वीकार नहीं किया है। अब जांच के बाद ही यह स्पष्ट हो सकेगा कि बच्ची की मौत के पीछे क्या चिकित्सकीय कारण थे और इलाज के दौरान अस्पताल की ओर से निर्धारित प्रोटोकॉल का पालन किया गया था या नहीं।












