भारत के अंडमान और निकोबार द्वीप समूह में स्थित नॉर्थ सेंटिनल आइलैंड दुनिया के सबसे रहस्यमयी और संवेदनशील क्षेत्रों में से एक है। यह द्वीप भारत का हिस्सा होने के बावजूद आम लोगों के लिए पूरी तरह प्रतिबंधित है। यहां बिना अनुमति जाना न केवल गैरकानूनी है, बल्कि खतरनाक भी हो सकता है।
इस द्वीप पर रहने वाली जनजाति को सेंटिनली कहा जाता है। यह दुनिया की उन दुर्लभ जनजातियों में से एक है, जिसने हजारों वर्षों से बाहरी दुनिया से कोई संपर्क नहीं रखा है। विशेषज्ञों के अनुसार, यह जनजाति करीब 50,000 से 60,000 सालों से इस क्षेत्र में रह रही है। उनकी जीवनशैली आज भी बहुत सरल और पारंपरिक है, जिसमें शिकार, मछली पकड़ना और प्राकृतिक संसाधनों पर निर्भर रहना शामिल है।
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भारत सरकार ने इस द्वीप पर जाने के लिए सख्त नियम बनाए हैं। इसके पीछे दो मुख्य कारण हैं:
सेंटिनली जनजाति बाहरी लोगों के प्रति संवेदनशील और रक्षात्मक मानी जाती है। यदि कोई व्यक्ति बिना अनुमति उनके क्षेत्र में प्रवेश करता है, तो वे अपनी सुरक्षा के लिए प्रतिक्रिया कर सकते हैं। 2006 में दो भारतीय मछुआरे गलती से इस द्वीप के पास पहुंच गए थे, जिनकी वहां मृत्यु हो गई थी।
इस जनजाति की इम्युनिटी (रोग प्रतिरोधक क्षमता) बाहरी दुनिया के लोगों की तुलना में बहुत कम है। ऐसे में सामान्य सर्दी-जुकाम जैसे रोग भी उनके लिए खतरनाक साबित हो सकते हैं और पूरी जनजाति के अस्तित्व को खतरे में डाल सकते हैं। इसी कारण सरकार ने इस द्वीप के आसपास 5 समुद्री मील के दायरे में भी प्रवेश पर प्रतिबंध लगा रखा है।
भारत सरकार और अंडमान प्रशासन इस द्वीप की सख्ती से निगरानी करते हैं। यह प्रतिबंध केवल सुरक्षा के लिए नहीं, बल्कि इस जनजाति की संस्कृति और अस्तित्व को सुरक्षित रखने के लिए भी है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी इस तरह की जनजातियों को “Isolated Tribes के रूप में संरक्षित करने की नीति अपनाई जाती है, ताकि उनकी जीवनशैली में बाहरी हस्तक्षेप न हो।
सेंटिनली जनजाति आज भी आधुनिक तकनीक और सभ्यता से पूरी तरह अलग जीवन जी रही है। उनके पास न बिजली है, न इंटरनेट, और न ही किसी आधुनिक सुविधा का उपयोग। वे प्रकृति के साथ संतुलन बनाकर जीवन जीते हैं और बाहरी दुनिया से दूरी बनाए रखना ही उनकी सबसे बड़ी पहचान है।