सोहागपुर: सतपुड़ा टाइगर रिजर्व में बढ़ा बारहसिंघा का कुनबा, संख्या बढ़कर 303 हुई

सोहागपुर। वर्ष 2015 में कान्हा टाइगर रिजर्व से सतपुड़ा में बारहसिंघों के पुनर्स्थापन की प्रक्रिया शुरू हुई थी। वर्ष 2015 से 2026 के बीच 135 बारहसिंगों को कान्हा से सतपुड़ा लाया गया। उपलब्ध नवीनतम अध्ययन के अनुसार अब इनकी संख्या बढ़कर करीब 303 हो गई है। बोरी, मालिनी और आसपास के उपयुक्त घासस्थलों में बारहसिंघा बिना डरे विचरण कर रहे हैं। यह केवल वन्यजीव को एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जाने की कहानी नहीं, बल्कि उसके ऐतिहासिक आवास में दोबारा स्थापित होने की कहानी है।
पचमढ़ी से गायब हुआ था बारहसिंघा
ऐतिहासिक दस्तावेजों से पता चलता है कि 19वीं सदी में पचमढ़ी-सतपुड़ा क्षेत्र बारहसिंगा के प्राकृतिक विस्तार क्षेत्र का हिस्सा था। कैप्टन जेम्स फोर्सिथ ने अपनी पुस्तक The Highlands of Central India में पचमढ़ी के आसपास साल वनों के बाहरी हिस्सों में बारहसिंघों की मौजूदगी का उल्लेख किया था। एफ.एच. गाइल्स ने 1937 के अध्ययन में बताया कि फोर्सिथ के समय यहां बारहसिंगा पाए जाते थे, लेकिन बाद में वे विलुप्त हो चुके थे। वन्यजीव वैज्ञानिक जॉर्ज बी. शैलर ने भी फिन के 1929 के संदर्भ का उल्लेख करते हुए पचमढ़ी के आसपास बारहसिंगों की आबादी और बाद में उसके समाप्त होने की जानकारी दी।
ये भी पढ़ें: छिंदवाड़ा के दो मंदिरों में चोरों का धावा, जैन मंदिर से 9 तीर्थंकरों की मूर्तियां चोरी
कान्हा से शुरू हुआ पुनर्वास का अभियान
बारहसिंघा की स्थिति एक समय मध्य भारत में बेहद चिंताजनक हो गई थी और कान्हा में भी 1970 के दशक में इसकी संख्या करीब 66 रह गई थी। लगातार संरक्षण प्रयासों से कान्हा में इसकी संख्या बढ़ी और मजबूत आबादी तैयार हुई। इसके बाद पूरी आबादी को एक ही स्थान पर सीमित रखने के जोखिम को देखते हुए दूसरी सुरक्षित आबादी विकसित करने की योजना बनाई गई। सतपुड़ा के घास के मैदान, जलस्रोत और पुनर्स्थापित वन क्षेत्र बारहसिंघों के लिए उपयुक्त पाए गए और वर्ष 2015 में तत्कालीन फील्ड डायरेक्टर एल कृष्णमूर्ति के निर्देशन में पुनर्स्थापन की प्रक्रिया शुरू हुई।
बोमा तकनीक से जंगल में बसाए गए
बारहसिंघों को पकड़ने के लिए पारंपरिक तरीके के बजाय बोमा यानी नियंत्रित बाड़े की तकनीक अपनाई गई। विशेष रूप से तैयार परिवहन वाहनों के जरिए बारहसिंगों को सुरक्षित तरीके से सतपुड़ा लाया गया और यहां उनके लिए विशेष बाड़े तैयार किए गए। धीरे-धीरे उन्हें नए वातावरण के अनुकूल बनाया गया और बाद में खुले जंगल में छोड़ा गया। वन विभाग, पशु चिकित्सकों, वन्यजीव वैज्ञानिकों और तकनीकी विशेषज्ञों के समन्वय से यह पूरी प्रक्रिया आगे बढ़ी और 2015 से 2026 के बीच कुल 135 बारहसिंगों को कान्हा से सतपुड़ा लाया गया।
ये भी पढ़ें: सीहोर में 7 लाख की सीसी रोड का लोकार्पण, नपाध्यक्ष ने गिनाए विकास कार्य
अब सतपुड़ा में खुद बढ़ रहा कुनबा
इस अभियान की सबसे बड़ी उपलब्धि यह है कि बारहसिंघों ने सतपुड़ा के वातावरण को स्वीकार करने के साथ प्राकृतिक प्रजनन भी किया। वर्ष 2022 के प्रबंधन मूल्यांकन में बोरी के घास मैदानों में 67 और मालिनी क्षेत्र में 25 बारहसिंघों के स्वतंत्र विचरण और प्राकृतिक प्रजनन का जिक्र किया गया था। इसके बाद आबादी में लगातार वृद्धि हुई और वर्ष 2026 के उपलब्ध अध्ययन के अनुसार सतपुड़ा में इनकी संख्या करीब 303 तक पहुंच गई है। बोरी और मालिनी के घास मैदानों में आज बारहसिंगों का झुंड स्वच्छंद विचरण करता दिखाई देता है, जो विलुप्ति से पुनर्वास तक की सफल संरक्षण यात्रा की जीवंत तस्वीर है। बारहसिंघा की यह वापसी किसी एक व्यक्ति या एक विभाग की उपलब्धि नहीं है। इसके पीछे वनकर्मियों, अधिकारियों, वन्यजीव वैज्ञानिकों, पशु चिकित्सकों, संरक्षणवादियों और स्थानीय समुदायों के सामूहिक प्रयास हैं।





















