PU Special :National RTI Day- सूचना के अधिकार के 4 सफल उदाहरण, जिनसे सिस्टम बदला और गड़बड़ियों का किया पर्दाफाश

भारत में 12 अक्टूबर 2005 को सूचना का अधिकार लागू हुआ। इसके बाद विभागों को आम लोगों को जानकारियां देनी पड़ी। मप्र में गैस पीड़ितों के दवा परीक्षण और पुनर्वास राशि, स्वच्छ सर्वेक्षण की कथित अनियमितताओं, अधिकारियों के नियुक्ति प्रमाणपत्रों और पेड़ कटाई की अनुमति से जुड़े मामले सामने आए। चार कहानियों में आरटीआई के जरिए सरकारी रिकॉर्ड हासिल कर जवाबदेही तय करने की कोशिशों को मजबूती मिली।
National RTI Day- सूचना के अधिकार के 4 सफल उदाहरण, जिनसे सिस्टम बदला और गड़बड़ियों का किया पर्दाफाश
फाइल फोटो

भोपाल के गैस पीड़ित अफसरों को कोर्ट तक ले गए,  RTI से खुले 279 दवा
ट्रायलऔर 272.75 करोड़ के पुनर्वास फंड के राज

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भोपाल का यूनियन कार्बाइड गैस कारखाना

 प्रवीण श्रीवास्तव, भोपाल। गैस कांड के बाद हजारों परिवारों की जिंदगी बीमारी और इलाज के बीच गुजरती रही। किसी को इलाज में दी गई दवा को लेकर सवाल था, किसी को यह जानना था कि गैस के असर पर हुए शोध में क्या सामने आया और किसी परिवार को यह पता नहीं था कि पुनर्वास के नाम पर सरकार ने कितना पैसा दिया और उसका इस्तेमाल कहां हुआ। दफ्तरों में पूछने पर जवाब नहीं मिलता तो सवाल वहीं रह जाता। गैस पीड़ित संगठनों ने 2005 के बाद इसी परेशानी का रास्ता आरटीआई में खोजा। सवाल सीधे थे—अस्पताल में किसका दवा परीक्षण हुआ, दवा कंपनियों से कितना पैसा मिला, गैस प्रभावित लोगों पर हुए शोध का क्या हुआ और पुनर्वास की रकम कहां खर्च हुई? आरटीआई के जवाब आए तो पहली बार कई सवालों के सामने सरकारी रिकॉर्ड था। बीएमएचआरसी के दवा परीक्षणों में 279 लोगों के शामिल होने की जानकारी सामने आई, जिनमें 215 गैस पीड़ित थे। इस मामले में राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने भी संज्ञान लिया था। गैस प्रभावित माताओं के बच्चों से जुड़े शोध और पुनर्वास राशि के इस्तेमाल की जानकारी भी सामने आई। इस तरह आरटीआई ने पीड़ितों को सिर्फ कागज नहीं दिए, बल्कि अपनी बात मजबूती से रखने का रास्ता दिया।

सवाल पूछने वालों के हाथ आया सरकारी रिकॉर्ड, 5 लाख पीड़ितों की लड़ाई को मिली ताकत

आरटीआई के बाद गैस पीड़ितों को यह पता चल सका कि सरकारी विभागों और अस्पतालों में उनके मामलों से जुड़ी फाइलों में क्या दर्ज है। दवा परीक्षणों की जानकारी सामने आने के बाद मामला राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग तक पहुंचा। पुनर्वास के लिए 272.75 करोड़ रुपए की योजना में मेडिकल, रोजगार, सामाजिक पुनर्वास और सुरक्षित पेयजल जैसे काम शामिल थे। सरकारी रिकॉर्ड में इस राशि का प्रावधान और उसके खर्च की स्थिति भी दर्ज है। यानी पहले जहां पीड़ित के पास सिर्फ अपनी परेशानी और सवाल थे, वहीं आरटीआई के बाद उसके पास सरकारी जवाब और दस्तावेज भी आ गए। इन्हीं दस्तावेजों के आधार पर संगठनों ने आगे सवाल उठाए, अधिकारियों से जवाब मांगा और मामले आयोग व अदालत तक ले गए। असर किसी एक आवेदक तक सीमित नहीं रहा-भोपाल के करीब पांच लाख गैस पीड़ितों की लंबी लड़ाई में आरटीआई ने जानकारी को सामूहिक ताकत में बदल दिया।

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ग्वालियर के संदीप शर्मा का कमाल-स्वच्छ सर्वेक्षण की मूल्यांकन प्रक्रिया में हुआ बदलाव 

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ग्वालियर के आरटीआई कार्यकर्ता संदीप शर्मा

राकेश भारती, ग्वालियर। स्वच्छ सर्वेक्षण में कथित अनियमितताओं को लेकर ग्वालियर के आरटीआई एक्टिविस्ट संदीप शर्मा ने दिल्ली स्थित केंद्रीय आवासन एवं शहरी कार्य मंत्रालय में शिकायतें की थीं। उनका दावा है कि इन शिकायतों के बाद सर्वेक्षण की जांच और मूल्यांकन प्रक्रिया में व्यापक सुधार किए गए तथा अनियमितता करने वाली एजेंसियों को सर्वेक्षण से बाहर किया गया। शर्मा के अनुसार, स्वच्छ सर्वेक्षण-2019 में काम करने वाली एजेंसियों कार्वी डाटा मैनेजमेंट और कंटार इंडिया पर नगरीय निकायों से सांठगांठ कर गलत रैंकिंग देने के आरोप थे। उन्होंने सूचना का अधिकार अधिनियम के तहत करीब 50 नगरीय निकायों से दस्तावेज प्राप्त किए। साथ ही, केंद्रीय मंत्रालय से दोनों एजेंसियों को दिए गए कार्य की निविदा संबंधी दस्तावेज जुटाकर शिकायत की। शर्मा का दावा है कि शिकायत सही पाए जाने के बाद दोनों एजेंसियों को स्वच्छ सर्वेक्षण से बाहर किया गया। इसके बाद सर्वेक्षण की विश्वसनीयता बनाए रखने के लिए जांच और मूल्यांकन प्रक्रिया में बदलाव किए गए।

निगम के 25 करोड़ रुपये बचाने का दावा

स्वच्छ भारत मिशन-2.0 के तहत ग्वालियर में लीगेसी वेस्ट यानी पुराने जमा कचरे के निपटान के लिए केंद्र सरकार से 33 करोड़ रुपये मिलने की बात शर्मा ने कही है। उनके अनुसार, इस काम में दया चरण कंपनी ने कथित गड़बड़ी की। उन्होंने आरटीआई के जरिए दस्तावेज प्राप्त कर शिकायत की।शर्मा का दावा है कि शिकायत सही पाए जाने के बाद कंपनी को 33 करोड़ रुपये के बजाय केवल आठ करोड़ रुपये का भुगतान किया गया। इससे नगर निगम ग्वालियर के 25 करोड़ रुपये बचने का दावा है।

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बहाना काम नहीं आया, विभागों को वेबसाइट पर अपलोड करने पड़े नियुक्ति प्रमाणपत्र

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जबलपुर के आरटीआई कार्यकर्ता अभिषेक सिंह 

रमेश मिश्रा,जबलपुर। सूचना के अधिकार के तहत अधिकारियों और कर्मचारियों के नियुक्ति संबंधी प्रमाणपत्रों को व्यक्तिगत अथवा गोपनीय जानकारी बताकर जानकारी देने से बचने वाले विभागों के लिए अब स्थिति बदल गई है। राज्य सूचना आयोग के निर्देश के बाद विभिन्न विभागों ने अधिकारियों-कर्मचारियों के नियुक्ति से संबंधित दस्तावेज और प्रमाणपत्र अपनी वेबसाइट पर उपलब्ध कराने की व्यवस्था शुरू की है। इससे कोई भी व्यक्ति इन दस्तावेजों की जानकारी आसानी से देख सकता है। यह व्यवस्था आरटीआई एक्टिविस्ट अभिषेक सिंह की पहल का परिणाम है। सिंह ने बताया कि अधिकारियों-कर्मचारियों के शैक्षणिक और जाति प्रमाणपत्रों को सार्वजनिक कराने के लिए उन्होंने सूचना के अधिकार के तहत प्रयास किया था। वर्ष 2016-17 में नगर निगम में पदस्थ अधिकारियों के प्रमाणपत्रों की जानकारी मांगी गई थी, लेकिन निगम ने इसे व्यक्तिगत जानकारी बताते हुए उपलब्ध कराने से इनकार कर दिया था।

मामला पहुंचा राज्य सूचना आयोग 

नगर निगम के जवाब के खिलाफ अभिषेक सिंह ने राज्य सूचना आयोग में अपील की। आयोग ने माना कि नियुक्ति के समय शासन को उपलब्ध कराए गए प्रमाणपत्रों को केवल व्यक्तिगत जानकारी बताकर छिपाया नहीं जा सकता। आयोग ने नियुक्ति संबंधी प्रमाणपत्रों को सार्वजनिक करने और आरटीआई के तहत जानकारी उपलब्ध कराने के निर्देश दिए।

वेबसाइट पर उपलब्ध होने लगी जानकारी 

सिंह के अनुसार आयोग के निर्देशों के बाद वर्ष 2018-19 से विभिन्न विभागों ने अपनी वेबसाइट पर अधिकारियों और कर्मचारियों के नियुक्ति संबंधी प्रमाणपत्र अपलोड करने की व्यवस्था शुरू की। इससे नियुक्तियों में पारदर्शिता बढ़ी और दस्तावेजों की जानकारी आम लोगों के लिए सुलभ हुई। अब संबंधित विभागों की वेबसाइट के माध्यम से नियुक्ति प्रमाणपत्रों की जानकारी प्राप्त की जा सकती है।

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आरटीआई से खुला पेड़ काटने की अनुमति का राज, बची हजारों पेड़ों की जान 

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भोपाल का अयोध्या बायपास रोड

शाहिद खान, भोपाल। पेड़ काटने की अनुमति देने का अधिकार किसके पास होना चाहिए, उस अधिकारी के पास जिसे कानून ने इसकी जिम्मेदारी दी है या उस कर्मचारी के पास जिसे यह अधिकार सौंप दिया गया हो। भोपाल में इसी सवाल ने पेड़ कटाई से जुड़ी व्यवस्था पर सवाल खड़े किए और इसी सवाल ने पिछले एक साल में हजारों पेड़ों को कटने से बचा लिया। अयोध्या बायपास रोड चौड़ीकरण की बात करें, तो यहां 10 हजार से ज्यादा पेड़ों को काटा जाना था, लेकिन बाद में इनकी गिनती सात हजार के आसपास सिमट गई। यानी इसी एक आरटीआई ने एक ही प्रोजेक्ट में कटने की कगार पर पहुंच गए 3 हजार पेड़ों को बचा लिया। जबकि अन्य प्रोजेक्ट में भी यही एक आरटीआई पेड़ों की ढाल बनी और आज हजारों पेड़ कटने से बच चुके हैं।

आरटीआई में 15 आदेशों का रिकॉर्ड मिला, शासन की अनुमति नहीं 

मध्यप्रदेश वृक्षों का परिरक्षण (नगरीय क्षेत्र) अधिनियम, 2001 के तहत शहरी क्षेत्रों में पेड़ काटने के लिए तय प्रक्रिया का पालन जरूरी है। भोपाल नगर निगम में वृक्ष अधिकारी की जिम्मेदारी आयुक्त के पास होती है। इसी व्यवस्था के बीच सवाल उठा कि क्या आयुक्त पेड़ काटने की अनुमति देने के अपने अधिकार अधीनस्थ अधिकारियों को सौंप सकते हैं और क्या इसके लिए शासन की मंजूरी जरूरी है। आरटीआई कार्यकर्ता नितिन सक्सेना ने 5 जून 2025 को नगर निगम से साल 2015 से अब तक वृक्ष अधिकारी के अधिकार दूसरे अधिकारियों को सौंपने के आदेशों और शासन की अनुमति का ब्योरा मांगा। निगम के सामान्य प्रशासन विभाग ने 4 जुलाई 2025 को जवाब दिया कि ऐसे 15 आदेशों का रिकॉर्ड उपलब्ध है, लेकिन अधिकार सौंपने के लिए शासन की अनुमति या अभिमत से जुड़े दस्तावेज कार्यालय में नहीं हैं। इसी जवाब ने अधिकारों के इस्तेमाल और अनुमति देने की प्रक्रिया पर सवाल खड़े किए।

भोजपुर रोड मामले में हाईकोर्ट की सख्ती

भोजपुर रोड चौड़ीकरण मामले में नितिन सक्सेना पक्षकार बने। हाईकोर्ट में वृक्ष अधिकारी की शक्तियां दूसरे अधिकारियों को सौंपने का मुद्दा उठा। 26 नवंबर 2025 के आदेश में अदालत ने कानून के प्रावधानों का हवाला देते हुए स्पष्ट किया कि वृक्ष अधिकारी की शक्तियां नगर निगम के किसी दूसरे अधिकारी को इस तरह नहीं सौंपी जा सकतीं। कानून में अन्य अधिकारियों की नियुक्ति का प्रावधान है, लेकिन वे वृक्ष अधिकारी के अधीन काम करते हैं। अदालत के हस्तक्षेप के बाद नगर निगम ने पहले जारी किए गए आदेश निरस्त कर वृक्ष अधिकारी का प्रभार आयुक्त के पास रखने की व्यवस्था अपनाई। इससे पेड़ कटाई की अनुमति जारी करने की प्रक्रिया में बदलाव आया और अधिकारों को लेकर स्थिति स्पष्ट हुई।

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By Naresh Bhagoria

नरेश भगोरिया। 27 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय हूं। माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विश्ववि...

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