Asha Dashami Vrat 2026 :कब है आशा दशमी व्रत? जानें शुभ मुहूर्त, महत्व, पूजा और नल-दमयंती की कथा

Asha Dashami Vrat 2026 : आशा दशमी व्रत 24 जुलाई 2026, शुक्रवार को रखा जाएगा। जानें दशमी तिथि, धार्मिक महत्व, शुभ मुहूर्त, व्रत से मिलने वाले लाभ और नल-दमयंती से जुड़ी पौराणिक कथा, जिसे भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को सुनाया था।
कब है आशा दशमी व्रत? जानें शुभ मुहूर्त, महत्व, पूजा और नल-दमयंती की कथा
कब है आशा दशमी व्रत....?

हिंदू धर्म में आशा दशमी व्रत को बहुत शुभ माना जाता है। मान्यता है कि इस दिन श्रद्धा और विश्वास के साथ व्रत और पूजा करने से जीवन में नई उम्मीद का संचार होता है। यह व्रत विशेष रूप से अधूरी मनोकामनाओं की पूर्ति, सुख-समृद्धि और परिवार में खुशहाली के लिए किया जाता है।

आशा दशमी व्रत 2026 कब है?

इस वर्ष आशा दशमी व्रत शुक्रवार, 24 जुलाई 2026 को रखा जाएगा।

दशमी तिथि

दशमी तिथि प्रारंभ : 23 जुलाई 2026, सुबह 7:03 बजे

दशमी तिथि समाप्त : 24 जुलाई 2026, सुबह 9:12 बजे

जानें शुभ मुहूर्त

ब्रह्म मुहूर्त - 04:15 ए एम से 04:57 ए एम

प्रातः सन्ध्या - 04:36 ए एम से 05:38 ए एम

अभिजित मुहूर्त - 12:00 पी एम से 12:55 पी एम

विजय मुहूर्त - 02:44 पी एम से 03:39 पी एम

गोधूलि मुहूर्त - 07:17 पी एम से 07:38 पी एम

सायाह्न सन्ध्या - 07:17 पी एम से 08:19 पी एम

अमृत काल - 04:57 पी एम से 06:44 पी एम

निशिता मुहूर्त - 12:07 ए एम, जुलाई 25 से 12:48 ए एम, 25 जुलाई

सर्वार्थ सिद्धि योग - 05:38 ए एम से 04:36 ए एम, 25 जुलाई 

रवि योग - 05:38 ए एम से 04:36 ए एम, 25 जुलाई

आशा दशमी व्रत का धार्मिक महत्व

हिंदू पंचांग के अनुसार यह व्रत शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को किया जाता है। इस दिन देवी-देवताओं की पूजा कर सुख, शांति, धन, समृद्धि और सफलता की कामना की जाती है। 'आशा' का अर्थ है उम्मीद और विश्वास। इसलिए यह व्रत जीवन में सकारात्मक सोच और धैर्य बनाए रखने का संदेश देता है।

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस व्रत से-

  • मनोकामनाओं की पूर्ति का आशीर्वाद मिलता है।
  • घर में सुख-समृद्धि और खुशहाली आती है।
  • परिवार में प्रेम और सौहार्द बढ़ता है।
  • जीवन की बाधाएं और परेशानियां कम होती हैं।
  • व्यक्ति में धैर्य, विश्वास और सकारात्मक सोच मजबूत होती है।

आशा दशमी व्रत की पौराणिक कथा

पौराणिक मान्यता के अनुसार, महाभारत काल में जब अर्जुन ने भगवान श्रीकृष्ण से जीवन की निराशाओं को दूर करने का उपाय पूछा, तब श्रीकृष्ण ने उन्हें राजा नल और रानी दमयंती की कथा सुनाते हुए आशा दशमी व्रत का महत्व बताया।

Religious

राजा नल और दमयंती का बिछोह

निषध देश के राजा नल अपने भाई पुष्कर के साथ द्यूत (जुए) में अपना पूरा राज्य हार गए। इसके बाद वे अपनी पत्नी दमयंती के साथ जंगल में रहने लगे। दोनों को कई दिनों तक भूखे-प्यासे भटकना पड़ा।

एक घटना ने दोनों को अलग कर दिया

एक दिन राजा नल ने कुछ सुनहरे पक्षियों को पकड़ने के लिए अपना एकमात्र वस्त्र उन पर फेंका, लेकिन पक्षी वह वस्त्र लेकर उड़ गए। अपनी हालत से दुखी होकर राजा नल रात में सो रही दमयंती को छोड़कर चले गए।

दमयंती ने नहीं छोड़ी उम्मीद

पति के बिछड़ने के बाद दमयंती उन्हें ढूंढ़ते-ढूंढ़ते चेदि देश पहुंचीं। वहां राजमाता ने उन्हें आश्रय दिया। बाद में वे अपने मायके लौट गईं, लेकिन पति से मिलने की उम्मीद कभी नहीं छोड़ी।

आशा दशमी व्रत से हुआ पुनर्मिलन

दमयंती ने एक विद्वान ब्राह्मण से उपाय पूछा। ब्राह्मण ने उन्हें आशा दशमी व्रत करने की सलाह दी और बताया कि यह व्रत मनोकामनाएं पूरी करने वाला है। दमयंती ने पूरी श्रद्धा और विधि-विधान से व्रत किया। मान्यता है कि इस व्रत के प्रभाव से उनका राजा नल से पुनर्मिलन हुआ। इतना ही नहीं, दोनों को अपना खोया हुआ राज्य और सुख-समृद्धि भी वापस मिल गई।

क्या है इस व्रत का संदेश?

आशा दशमी केवल एक धार्मिक व्रत नहीं, बल्कि उम्मीद, धैर्य और विश्वास का प्रतीक भी है। यह व्रत सिखाता है कि कठिन परिस्थितियों में भी आशा नहीं छोड़नी चाहिए। श्रद्धा, धैर्य और सकारात्मक सोच के साथ किए गए प्रयास जीवन में सफलता और खुशियां ला सकते हैं।

Shivani Gupta
By Shivani Gupta

शिवानी गुप्ता | MCU, भोपाल से इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में ग्रेजुएशन | 9 वर्षों की टीवी और डिजिटल तक की य...

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