वराह जयंती 2026: क्यों लिया था भगवान विष्णु ने वराह अवतार? जानें पूरी कथा

हिंदू पंचांग के अनुसार हर साल भाद्रपद माह के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को वराह जयंती मनाई जाती है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, यह दिन भगवान विष्णु के वराह अवतार के प्राकट्य दिवस के रूप में मनाया जाता है। इस दिन भगवान वराह की पूजा, भोग और दान करने का विशेष महत्व बताया गया है। मान्यता है कि वराह भगवान की उपासना करने से नकारात्मकता दूर होती है और जीवन में सुख-समृद्धि आती है। आइए जानते हैं वराह जयंती की पौराणिक कथा, पूजा का महत्व और शुभ मुहूर्त।
क्यों की जाती है वराह अवतार की पूजा?
पौराणिक कथा के अनुसार, हिरण्याक्ष नाम के असुर ने पृथ्वी को जल में छिपा दिया था। पृथ्वी को बचाने के लिए भगवान विष्णु ने वराह यानी जंगली सूअर का अवतार लिया। भगवान वराह ने पृथ्वी को अपनी दाढ़ों पर उठाकर जल से बाहर निकाला और उसकी रक्षा की। इसके बाद उन्होंने हिरण्याक्ष का वध किया। धार्मिक मान्यता के अनुसार यह घटना भाद्रपद शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि से जुड़ी है। इसी कारण इस दिन वराह जयंती मनाई जाती है। मान्यता है कि भगवान वराह की पूजा करने से संकट दूर होते हैं, नकारात्मकता कम होती है और सुख-समृद्धि की प्राप्ति होती है।
कब है वराह जयंती 2026?
पंचांग के अनुसार, भाद्रपद शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि की शुरुआत 13 सितंबर 2026 को सुबह 7:08 बजे होगी और इसका समापन 14 सितंबर को सुबह 7:06 बजे होगा। इसलिए वराह जयंती 13 सितंबर 2026 को मनाई जाएगी।
वराह जयंती पूजा का शुभ समय:
दोपहर 1:31 बजे से शाम 4:00 बजे तक
वराह जयंती पर कैसे करें पूजा?
- सुबह स्नान करके भगवान विष्णु और वराह अवतार का ध्यान करें।
- पूजा स्थल पर भगवान वराह की प्रतिमा या तस्वीर स्थापित करें।
- भगवान को पीले वस्त्र, चंदन, रोली, अक्षत और पुष्प अर्पित करें।
- फल, हलवा और मिठाई का भोग लगाएं।
- भोग में तुलसी के पत्ते जरूर शामिल करें।
- भगवान विष्णु के मंत्रों का जाप करें और अपनी श्रद्धा के अनुसार पूजा करें।
- जरूरतमंद लोगों को अन्न, वस्त्र या धन का दान करें।
वराह जयंती पर किन बातों का रखें ध्यान?
धार्मिक मान्यता के अनुसार इस दिन सात्विक जीवनशैली अपनाना शुभ माना जाता है। इसलिए तामसिक भोजन और नशे आदि से दूर रहने की सलाह दी जाती है। भगवान विष्णु की पूजा में श्रद्धा और स्वच्छता का विशेष ध्यान रखना चाहिए।




















