आजादी की लड़ाई से जुड़ा उत्सव! गणेश चतुर्थी की वो कहानी, जिसने पूरे देश में बदल दिया उत्सव का अंदाज

लाइफस्टाइल। गणेश चतुर्थी का इंतजार हर साल भक्तों को रहता है। इस मौके पर घरों और पंडालों में गणपति की प्रतिमा स्थापित की जाती है और कई दिनों तक पूजा-अर्चना का दौर चलता है। लेकिन आज जिस भव्य रूप में गणेश उत्सव दिखाई देता है, उसका इतिहास काफी दिलचस्प है। कभी गणपति की पूजा मुख्य रूप से घरों में होती थी। बाद में यह धार्मिक आयोजन लोगों को एक साथ जोड़ने वाला बड़ा सार्वजनिक उत्सव बन गया। लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक ने इसे जनभागीदारी से जोड़ने में अहम भूमिका निभाई और गणेश उत्सव को सामाजिक एकता का माध्यम बनाया।
शिवाजी के दौर से जुड़ी है परंपरा
गणेश चतुर्थी मनाने की परंपरा काफी पुरानी मानी जाती है। इतिहास में इसके संबंध मराठा शासक छत्रपति शिवाजी महाराज के समय से भी बताए जाते हैं। हालांकि, सार्वजनिक तौर पर गणपति की प्रतिमा स्थापित करने की परंपरा को आगे बढ़ाने में भाऊसाहेब लक्ष्मण जावले का नाम भी लिया जाता है। इसके बाद इस उत्सव ने धीरे-धीरे बड़ा रूप लेना शुरू किया।
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तिलक ने उत्सव को दिया नया रूप
साल 1893 में लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक ने गणेश उत्सव को सार्वजनिक स्तर पर आयोजित करने को बढ़ावा दिया। उस दौर में उन्होंने लोगों को एक जगह लाने के लिए इस पर्व को एक बड़े मंच के रूप में देखा। सार्वजनिक पंडालों में लोग पूजा के साथ सांस्कृतिक कार्यक्रमों में शामिल होने लगे। इससे अलग-अलग वर्गों के लोगों के बीच मेल-जोल बढ़ा।
आजादी की लड़ाई से भी जुड़ा उत्सव
ब्रिटिश शासन के दौर में सार्वजनिक राजनीतिक सभाओं पर कई तरह की पाबंदियां थीं। ऐसे समय में गणेश उत्सव लोगों के एक साथ आने का जरिया बना। तिलक ने धार्मिक और सांस्कृतिक आयोजन के जरिए लोगों में एकता और देश के प्रति जागरूकता की भावना मजबूत करने की कोशिश की। इसी वजह से गणेश उत्सव का सामाजिक और राष्ट्रीय महत्व भी बढ़ता गया।
दस दिनों तक होती है गणपति की पूजा
गणेश चतुर्थी पर सबसे पहले भगवान गणेश की प्रतिमा घर या पंडाल में स्थापित की जाती है। इसे प्राणप्रतिष्ठा कहा जाता है। इसके बाद पूजा, आरती और भगवान को भोग लगाने का सिलसिला चलता है। भक्त गणपति को फूल, चंदन, सिंदूर और मिठाई अर्पित करते हैं। कई जगहों पर दस दिनों तक विशेष आयोजन किए जाते हैं।
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विसर्जन के साथ होता है उत्सव का समापन
उत्सव के अंतिम दिन गणपति की प्रतिमा का विसर्जन किया जाता है। इससे पहले पूजा और आरती होती है और फिर भक्त जुलूस के साथ गणपति को विदाई देते हैं। अलग-अलग राज्यों और क्षेत्रों में पूजा की परंपराएं अलग हो सकती हैं, लेकिन श्रद्धा और गणपति के प्रति आस्था इस पूरे पर्व का सबसे बड़ा आधार है।




















