PU Special :पितृपक्ष बना बिछड़े रिश्तों को जोड़ने का जरिया, मध्य प्रदेश में 7 बुजुर्ग वृद्धाश्रम से लौटे घर

पल्लवी वाघेला, भोपाल। पितृपक्ष में पूर्वजों की आत्मा की शांति के लिए तर्पण और श्राद्ध करने की परंपरा है। इसी दौरान मध्य प्रदेश में कुछ परिवारों के लिए यह समय अपने जीवित माता-पिता और बुजुर्गों से दोबारा जुड़ने का जरिया भी बना। प्रदेश में पितृपक्ष के दौरान वृद्धाश्रमों में रह रहे 7 बुजुर्गों के अपने घर लौटने की जानकारी सामने आई है। इनमें कहीं बुजुर्गों की यादों और बातचीत से परिवार का पता चला, तो कहीं सोशल मीडिया पर पोस्ट की गई रील ने बिछड़े परिजनों को मिला दिया। कुछ मामलों में परिवार की युवा पीढ़ी ने पहल की और बुजुर्गों को वापस घर ले गई। इन घटनाओं ने यह भी दिखाया कि उम्र, पारिवारिक विवाद और आपसी दूरियों के कारण कमजोर पड़ चुके रिश्तों को दोबारा जोड़ने की उम्मीद हमेशा बनी रह सकती है। हालांकि, बुजुर्गों की घर वापसी तभी सार्थक होगी, जब परिवार में उन्हें सम्मान, सुरक्षा और भावनात्मक सहारा मिलता रहे।
बातचीत के दौरान बुजुर्गों ने बताया अपने अतीत का पता
पितृपक्ष के दौरान इंदौर और भोपाल के वृद्धाश्रमों में रह रहे दो बुजुर्गों से मिलने उनके परिवार पहुंचे थे। बातचीत के दौरान दोनों बुजुर्गों ने अपने अतीत से जुड़ी ऐसी जानकारियां साझा कीं, जिनसे उनके परिवारों तक पहुंचने का रास्ता खुला।
एक बुजुर्ग ने बताया कि वह उत्तर प्रदेश के रहने वाले हैं और अपने जिले की जानकारी भी दी। वहीं भोपाल के वृद्धाश्रम में रह रहे एक अन्य बुजुर्ग ने बताया कि वह बैतूल में पुलिस विभाग में काम कर चुके हैं।
दोनों वृद्धाश्रमों के संचालकों के मुताबिक, ये बुजुर्ग करीब एक साल से वहां रह रहे थे। इस दौरान उनसे कई बार परिवार के बारे में जानने की कोशिश की गई, लेकिन उन्होंने अपने परिजनों के बारे में कुछ नहीं बताया था। पितृपक्ष में हुई बातचीत से मिली जानकारी के आधार पर जब परिवारों की तलाश की गई, तो एक सप्ताह के भीतर दोनों के परिजनों का पता चल गया। बताया गया कि परिवार भी अपने बुजुर्गों को खोजने में लगे हुए थे। इस तरह बातचीत के दौरान सामने आई पुरानी यादें और पते से जुड़ी जानकारियां परिवारों को फिर से मिलाने में मददगार बनीं।
सोशल मीडिया पर भजन और डांस की रील से मिले परिजन
सोशल मीडिया भी दो बुजुर्गों के लिए परिवार तक पहुंचने का माध्यम बना। शिवपुरी और उज्जैन जिले के वृद्धाश्रमों में रह रहे दो बुजुर्गों की भजन और डांस से जुड़ी रील सोशल मीडिया पर पोस्ट की गई। पितृपक्ष के दौरान वृद्धाश्रम पहुंचे लोगों ने इन बुजुर्गों के वीडियो साझा किए। ये रील उनके परिवारों तक पहुंच गईं और परिजनों को उनके बारे में जानकारी मिली। इसके बाद परिवार के सदस्य खुद वृद्धाश्रम पहुंचे और बुजुर्गों को अपने साथ घर ले गए। इस तरह सोशल मीडिया पर साझा किए गए वीडियो, जिनका उद्देश्य बुजुर्गों की गतिविधियों को सामने लाना था, परिवारों को दोबारा जोड़ने का जरिया बन गए।
युवा पीढ़ी की पहल से तीन बुजुर्गों की घर वापसी
अन्य तीन मामलों में परिवार के सदस्य खुद बुजुर्गों को लेने पहुंचे। ये मामले ग्वालियर, सतना और जबलपुर के करमेता क्षेत्र से जुड़े बताए गए हैं। इन परिवारों के सदस्यों ने स्वीकार किया कि घर के बुजुर्गों को वृद्धाश्रम में छोड़ देना उनकी गलती थी। परिवारों की युवा पीढ़ी की पहल ने इन मामलों में अहम भूमिका निभाई और बुजुर्गों की घर वापसी का रास्ता बना। एक मामले में बहू ने बताया कि गरुड़ पुराण सुनते समय उसे इस बात का एहसास हुआ कि अपनी सास को वृद्धाश्रम में छोड़ना गलत था। इसके बाद परिवार ने उन्हें वापस घर लाने का फैसला किया। इन घटनाओं से यह संकेत मिलता है कि कभी-कभी परिवार के भीतर किसी एक सदस्य की पहल भी लंबे समय से बनी दूरी को कम करने और रिश्तों को नया अवसर देने में अहम हो सकती है।
मध्य प्रदेश में करीब 83 वृद्धाश्रम, 600 से अधिक बुजुर्ग
प्रदेश में वृद्धाश्रमों से जुड़ी उपलब्ध जानकारी के मुताबिक मध्य प्रदेश में करीब 83 वृद्धाश्रम हैं, जिनमें 600 से अधिक बुजुर्ग रह रहे हैं। वहीं भोपाल में चार प्रमुख वृद्धाश्रमों में कुल 143 बुजुर्गों के निवासरत होने की जानकारी दी गई है।
भोपाल के वृद्धाश्रमों का विवरण इस प्रकार है:
- आसरा वृद्धाश्रम: 83 बुजुर्ग
- अपना घर: 25 बुजुर्ग
- आनंद धाम: 23 बुजुर्ग
- कमल बसंत: 12 बुजुर्ग
इन आंकड़ों से पता चलता है कि वृद्धाश्रम कई बुजुर्गों के लिए रहने और देखभाल का सहारा हैं। लेकिन घर से दूर रहने वाले बुजुर्गों के लिए परिवार से जुड़ाव और भावनात्मक सहयोग भी उतना ही महत्वपूर्ण है।
भोजन और दवा के साथ भावनात्मक सहारा भी जरूरी
आसरा वृद्धाश्रम की केयरटेकर समीना मसीह के मुताबिक, बुजुर्गों को भोजन, दवा और सुरक्षित आवास उपलब्ध कराना जरूरी है लेकिन उनकी भावनात्मक जरूरतों को समझना भी उतना ही अहम है। परिवार में बुजुर्गों की बात सुनी जाए, उन्हें फैसलों में शामिल किया जाए और उनकी स्वतंत्रता का सम्मान किया जाए, तो अकेलेपन की भावना कम हो सकती है। उम्र बढ़ने के साथ उन्हें केवल देखभाल ही नहीं बल्कि अपनापन, बातचीत और सम्मान की भी जरूरत होती है। पितृपक्ष जैसे अवसर परिवारों को अपने रिश्तों पर विचार करने और बुजुर्गों के प्रति अपनी जिम्मेदारियों को समझने का मौका देते हैं। समीना मसीह के अनुसार बुजुर्गों की घर वापसी तभी स्थायी हो सकती है, जब उन्हें दोबारा उपेक्षा का सामना न करना पड़े।
घर वापसी के साथ रिश्तों को निभाना भी जरूरी
मध्य प्रदेश में पितृपक्ष के दौरान सामने आए इन सात मामलों में परिवारों के दोबारा मिलने के अलग-अलग माध्यम रहे। कहीं पुरानी यादों ने रास्ता दिखाया, कहीं सोशल मीडिया की रील मददगार बनी और कहीं परिवार के सदस्यों ने अपनी गलती स्वीकार कर बुजुर्गों को वापस लाने की पहल की।




















