सिवनी में बहनों ने भाई की अर्थी को दिया कंधा, बड़ी बहन ने दी मुखाग्नि
सिवनी। जिले के कान्हीवाड़ा में पंडित रविशंकर शुक्ला उर्फ रवि विद्रोही के अंतिम संस्कार का यह भावुक दृश्य शुक्रवार को सामने आया। शनिवार दोपहर अंतिम संस्कार का वीडियो सामने आने के बाद इस मार्मिक विदाई की चर्चा होने लगी। रवि अविवाहित थे और परिवार में कोई अन्य पुरुष सदस्य नहीं होने के कारण उनकी बहनों ने ही अंतिम संस्कार की पूरी जिम्मेदारी निभाई। भाई की अर्थी को कंधा देने से लेकर मुखाग्नि देने तक, हर रस्म में बहनें उसके साथ खड़ी रहीं।
आखिरी सफर में बहनों ने दिया भाई को कंधा
कान्हीवाड़ा से रवि विद्रोही की अंतिम यात्रा जब मोक्षधाम पहुंची, तो वहां मौजूद लोगों के लिए यह दृश्य भावनाओं से भर देने वाला था। बहनों ने अपने भाई की अर्थी को कंधा दिया और अंतिम संस्कार की रस्में निभाईं। यह उनके लिए केवल एक परंपरा निभाने का क्षण नहीं था, बल्कि उस रिश्ते को आखिरी बार पूरी जिम्मेदारी के साथ जीने का पल था, जो जीवनभर उनके साथ रहा।भाई को खोने का दुख किसी शब्द में बयां नहीं किया जा सकता। ऐसे समय में जब परिवार को सहारे की सबसे अधिक जरूरत होती है, रवि की बहनों ने अपने आंसुओं के बीच खुद को संभाला। बड़ी बहन रूखमणी शुक्ला ने चिता को मुखाग्नि दी। जिस भाई को कभी परिवार के बीच हंसते-बोलते देखा होगा, उसी को पंचतत्व में विलीन होते देखना उनके लिए कितना कठिन रहा होगा, इसका अंदाजा वहां मौजूद लोगों की नम आंखों से लगाया जा सकता था।
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बड़ी बहन रूखमणी शुक्ला ने दी मुखाग्नि
भारतीय समाज में लंबे समय से अंतिम संस्कार की प्रमुख रस्में पुरुष परिजनों द्वारा निभाने की परंपरा रही है। हालांकि, बदलते समय के साथ बेटियों और बहनों द्वारा अपने परिजनों को मुखाग्नि देने के उदाहरण भी सामने आते रहे हैं। हिंदू अंतिम संस्कार की परंपराओं में मुखाग्नि का विशेष महत्व है, लेकिन इसे निभाने के लिए पुरुष होना अनिवार्य नहीं है। पारिवारिक परिस्थितियों और मान्यताओं के अनुसार महिलाएं भी यह दायित्व निभाती हैं।रवि विद्रोही के अंतिम संस्कार में उनकी बहनों ने भी यही जिम्मेदारी निभाई। उन्होंने किसी शोर या प्रदर्शन के बिना अपने भाई को अंतिम विदाई दी। उनकी यह पहल बताती है कि दुख की घड़ी में रिश्तों की जिम्मेदारी निभाने का साहस किसी एक लिंग या परंपरा तक सीमित नहीं होता।
मोक्षधाम में हर आंख थी नम
अंतिम संस्कार के दौरान मौजूद लोगों ने जब बहनों को अर्थी को कंधा देते और बड़ी बहन को मुखाग्नि देते देखा, तो माहौल भावुक हो गया। भाई को खोने का दर्द और बहनों का साहस, दोनों इस विदाई में एक साथ दिखाई दिए। यह केवल एक परिवार के बिछड़ने का दृश्य नहीं था, बल्कि भाई-बहन के उस रिश्ते की मार्मिक तस्वीर थी, जिसमें अंतिम विदाई के क्षण में भी जिम्मेदारी और अपनापन कायम रहा।रवि विद्रोही अब इस दुनिया में नहीं हैं, लेकिन उनकी अंतिम यात्रा में बहनों ने जिस तरह अपने भाई का साथ निभाया, वह दृश्य लंबे समय तक लोगों की स्मृतियों में बना रहेगा। भाई की अर्थी को कंधा देती बहनें और चिता को मुखाग्नि देती बड़ी बहन-यह तस्वीर अपने आप में कहती है कि रिश्तों की गहराई रस्मों से नहीं, उन्हें निभाने के साहस से पहचानी जाती है।






















