NVDA के 2677 दैनिक वेतनभोगियों का मामला, नियमितीकरण चुनौती वाली सरकार की अपील हाईकोर्ट ने खारिज की

जबलपुर। नर्मदा घाटी विकास प्राधिकरण यानी NVDA के दैनिक वेतनभोगी कर्मचारियों के नियमितीकरण से जुड़े मामले में मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को झटका दिया है। जस्टिस विवेक रूसिया और जस्टिस प्रदीप मित्तल की डिवीजन बेंच ने सरकार और एनवीडीए की ओर से दायर दोनों रिट अपीलें खारिज कर दीं। ये अपीलें 31 जुलाई 2024 को सिंगल बेंच द्वारा दिए गए उस आदेश के खिलाफ थीं, जिसमें कर्मचारियों के नियमितीकरण के मामलों पर 20 फरवरी 2009 को गठित समिति की सिफारिशों के आधार पर विचार करने का निर्देश दिया गया था। हाईकोर्ट ने पाया कि अपील दाखिल करने में 617 दिनों की देरी हुई और सरकार इस देरी का संतोषजनक कारण नहीं बता सकी। कोर्ट ने मामले के मेरिट पर भी विचार किया और पाया कि अपील में हस्तक्षेप का पर्याप्त आधार नहीं है।
शैलेन्द्र गुहा और राकेश अग्रवाल के मामलों से जुड़ी थी अपील
यह मामला भोपाल निवासी शैलेन्द्र गुहा और राकेश कुमार अग्रवाल से जुड़ा है। दोनों ने लंबे समय से दैनिक वेतनभोगी के रूप में काम करने के आधार पर नियमितीकरण की मांग को लेकर हाईकोर्ट में याचिकाएं दायर की थीं। सिंगल बेंच ने 31 जुलाई 2024 को W.P. No. 408/2011 और W.P. No. 411/2011 का निपटारा करते हुए निर्देश दिया था कि दोनों कर्मचारियों के नियमितीकरण के मामलों पर 20 फरवरी 2009 को गठित समिति की सिफारिशों के अनुरूप विचार किया जाए। इसी आदेश को राज्य सरकार और NVDA ने डिवीजन बेंच में चुनौती दी थी।
617 दिन की देरी पर सरकार को राहत नहीं
अपीलों की सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने सबसे पहले इनके दाखिल होने में हुई देरी पर सवाल उठाया। कोर्ट के आदेश के मुताबिक दोनों अपीलें 617 दिन की देरी से दाखिल की गई थीं। सरकार की ओर से देरी का कारण बताते हुए कहा गया कि विभाग ने पहले हाईकोर्ट के आदेश का पालन करने की दिशा में कदम बढ़ाया था लेकिन बाद में सामान्य प्रशासन विभाग से अनुमति नहीं मिली। इसके बाद अपील दाखिल करने का निर्णय लिया गया।डिवीजन बेंच ने कहा कि यह स्थिति 617 दिनों की देरी को माफ करने के लिए पर्याप्त आधार नहीं है। कोर्ट ने पहले मामले के मेरिट पर विचार करना उचित समझा।
2677 कर्मचारियों की जांच का दावा
राज्य सरकार और NVDA ने हाईकोर्ट में दलील दी कि प्राधिकरण में कार्यरत 2677 दैनिक वेतनभोगी कर्मचारियों के मामलों की जांच के लिए स्क्रूटनी कमेटी बनाई गई थी। सरकार के मुताबिक, कमेटी की जांच में इनमें से 145 कर्मचारियों को नियमितीकरण के योग्य पाया गया था और शैलेन्द्र गुहा तथा राकेश अग्रवाल उन कर्मचारियों की सूची में शामिल नहीं थे। हालांकि हाईकोर्ट ने पाया कि सरकार ने यह स्पष्ट करने के लिए स्क्रूटनी कमेटी की रिपोर्ट ही रिकॉर्ड पर पेश नहीं की, जिससे यह पता चल सके कि संबंधित कर्मचारियों को नियमितीकरण के लिए किस आधार पर अपात्र माना गया। कोर्ट ने यह भी नोट किया कि न तो मूल रिट याचिकाओं के दौरान और न ही रिट अपीलों के समय कमेटी की रिपोर्ट पेश की गई।
2677 कर्मचारियों की वरिष्ठता सूची भी नहीं पेश की
मामले में हाईकोर्ट की एक और अहम आपत्ति यह रही कि सरकार 2677 दैनिक वेतनभोगी कर्मचारियों की वरिष्ठता सूची भी रिकॉर्ड पर नहीं ला सकी।कोर्ट ने कहा कि यदि यह दावा किया जा रहा है कि 145 कर्मचारी नियमितीकरण के लिए पात्र पाए गए थे, तो वरिष्ठता सूची के जरिए यह स्पष्ट किया जा सकता था कि शैलेन्द्र गुहा और राकेश अग्रवाल की स्थिति क्या थी और उन्हें किस आधार पर बाहर रखा गया। सुनवाई के दौरान जब डिवीजन बेंच ने रिपोर्ट और वरिष्ठता सूची पेश न किए जाने को लेकर सवाल किया तो सरकार की ओर से बाद में दस्तावेज पेश करने के लिए समय मांगा गया। कोर्ट ने इस पर भी असंतोष जताया और कहा कि अपील दाखिल करते समय इन महत्वपूर्ण दस्तावेजों को रिकॉर्ड पर लाया जाना चाहिए था।
हाईकोर्ट ने सरकारी पक्ष की कार्यप्रणाली पर की टिप्पणी
डिवीजन बेंच ने रिकॉर्ड पेश करने के तरीके को लेकर राज्य सरकार के रुख पर कड़ी टिप्पणी की। कोर्ट ने कहा कि जवाब दाखिल करने और रिट अपील पेश करने में अपनाया गया “लापरवाह और आधा-अधूरा रवैया” सरकार के मामले के लिए घातक साबित हुआ। अदालत ने यह भी कहा कि महत्वपूर्ण मामलों में इस तरह की कार्यप्रणाली पर महाधिवक्ता कार्यालय को आत्ममंथन करने की जरूरत है।
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कर्मचारियों ने लंबे समय तक दैनिक वेतन पर काम करने का दिया हवाला
मामले की सुनवाई के दौरान कर्मचारियों की ओर से यह पक्ष रखा गया कि वे लंबे समय से NVDA में दैनिक वेतनभोगी के रूप में काम कर रहे हैं। अदालत के आदेश में दर्ज है कि याचिकाकर्ताओं ने 12 नवंबर 1991 से निरंतर काम करने के आधार पर नियमितीकरण का दावा किया था। राज्य पक्ष ने दूसरी ओर स्क्रूटनी कमेटी की रिपोर्ट का हवाला देते हुए उनके मामलों को नियमितीकरण के लिए उपयुक्त नहीं माना था। लेकिन संबंधित रिपोर्ट और वरिष्ठता सूची रिकॉर्ड पर नहीं होने के कारण सरकार अपनी दलील को दस्तावेजों के साथ पुष्ट नहीं कर सकी।
हाईकोर्ट ने सिंगल बेंच के आदेश में दखल से किया इनकार
डिवीजन बेंच ने पूरे मामले की मेरिट पर विचार करने के बाद कहा कि 31 जुलाई 2024 के सिंगल बेंच के आदेश में हस्तक्षेप का कोई आधार नहीं बनता। इसके बाद रिट अपील नंबर 2419/2026 और 2417/2026 को खारिज कर दिया गया। इन मामलों में क्रमशः राज्य सरकार बनाम शैलेन्द्र गुहा और नर्मदा घाटी विकास प्राधिकरण विभाग व अन्य बनाम राकेश कुमार अग्रवाल शामिल थे। कर्मचारियों की ओर से अधिवक्ता अशोक कुमार गुप्ता ने पैरवी की, जबकि सरकार की ओर से शासकीय अधिवक्ता दर्शन सोनी अदालत में उपस्थित हुए।
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अब सिंगल बेंच के निर्देश के अनुसार प्रक्रिया आगे बढ़ेगी
हाईकोर्ट के डिवीजन बेंच द्वारा अपीलें खारिज किए जाने के बाद 31 जुलाई 2024 के सिंगल बेंच के आदेश पर आगे की प्रक्रिया का रास्ता साफ हुआ है। उस आदेश में दोनों कर्मचारियों के मामलों पर 20 फरवरी 2009 की समिति की सिफारिशों के आधार पर विचार करने के निर्देश दिए गए थे। इस मामले में हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि केवल 2677 कर्मचारियों की जांच और 145 कर्मचारियों को पात्र बताए जाने का उल्लेख पर्याप्त नहीं है। संबंधित कर्मचारियों को अपात्र मानने का आधार रिकॉर्ड पर मौजूद दस्तावेजों से स्पष्ट होना चाहिए। अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि संबंधित विभाग सिंगल बेंच के निर्देश के अनुसार दोनों कर्मचारियों के मामलों पर आगे क्या निर्णय लेता है।




















