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बूढ़े शरीर में लोहे का दम: मलेशियाई धरती पर गूंजेगा भारत का डंका, 85 किलो भारवर्ग में मोहन ठोकेंगे गोल्ड पर दावा

67 वर्षीय वेटरन वेटलिफ्टर मोहन पाराशर मलेशिया में 4 से 6 दिसंबर तक होने वाले मास्टर्स वर्ल्ड कप व कॉमनवेल्थ चैंपियनशिप में भारत की नुमाइंदगी करेंगे, 85 किलो भारवर्ग में उनका सीधा निशाना गोल्ड पर है।
जानिए कैसे सीहोर का यह सूरमा मलेशिया में रचने जा रहा है इतिहास!

सीहोर। जो लोग 60 के पार जाते ही घुटने टेक देते हैं और उम्र को अपनी लाचारी का बहाना बना लेते हैं, उनके मुंह पर यह खबर एक जोरदार तमाचा है। सीहोर के ग्राम बिलकिसगंज का 67 वर्षीय यह सूरमा किसी भी नौजवान के पसीने छुड़ाने का माद्दा रखता है। नाम है मोहन पाराशर। इरादे फौलाद से भी सख्त और हौसला ऐसा कि अंतरराष्ट्रीय मंच पर बड़े-बड़े धुरंधर इनके नाम से खौफ खाते हैं। आगामी 4 से 6 दिसंबर तक मलेशिया के पेनांग में यूनाइटेड मास्टर्स वेटलिफ्टिंग फेडरेशन द्वारा आयोजित होने वाले मास्टर्स वर्ल्ड कप और कॉमनवेल्थ चैंपियनशिप में मोहन पाराशर भारत का परचम लहराने के लिए कमर कस चुके हैं। 65 से 69 वर्ष के आयु वर्ग और 85 किलोग्राम भारवर्ग में यह खिलाड़ी जब बारबेल पर हाथ रखेगा, तो लक्ष्य सिर्फ और सिर्फ सोने का तमगा होगा।

​भोर के 4 बजे से लोहे से टकराने का कड़ा मुकद्दर

​यह कोई इत्तेफाक नहीं है कि 67 की उम्र में किसी को देश का प्रतिनिधित्व करने का परवाना मिल जाए। इसके पीछे का सच रोंगटे खड़े कर देने वाला है। जब पूरी दुनिया रजाई में दुबकी नींद के मजे ले रही होती है, ठीक सुबह 4 बजे मोहन पाराशर का अखाड़ा गूंजने लगता है। लगातार चार घंटे तक लोहे की रॉड और भारी-भरकम प्लेट्स से भिड़ना, शरीर की रग-रग से पसीना निचोड़ देना और अपनी मांसपेशियों को फौलाद बनाए रखना..यह हर किसी के बस की बात नहीं है। उनका सीधा और कड़ा रुख है: अगर मैदान में उतरना है तो अनुशासन से कोई समझौता नहीं होगा। भारतीय दल में शामिल छह खिलाड़ियों में सीहोर का यह शेर सबसे आगे खड़ा दिखता है, जिसकी फिटनेस देखकर नए दौर के नौजवान भी अपना सिर झुका लें।

​ग्रीस से लेकर एशिया तक, दुनिया ने माना है इनका लोहा

​मोहन पाराशर का रिकॉर्ड उठाकर देखिए, बड़े-बड़े विरोधियों की फाइलें ठंडी पड़ जाएंगी। यह खिलाड़ी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर 6 बार और राष्ट्रीय स्तर पर 5 बार देश की झोली में स्वर्ण पदक डाल चुका है। विश्व चैंपियनशिप में तीन बार का स्वर्णिम रिकॉर्ड इनके नाम दर्ज है, जिसमें ग्रीस की वह ऐतिहासिक भिड़ंत शामिल है, जहां इन्होंने मंच पर 148 किलोग्राम वजन उठाकर दुनिया को स्तब्ध कर दिया था और वर्ल्ड चैंपियनशिप का गोल्ड अपने सीने से लगाया था। इसके अलावा दो कॉमनवेल्थ और एक एशियन चैंपियनशिप का गोल्ड इनकी स्वर्णिम दास्तान की गवाही देते हैं। जब यह खिलाड़ी मलेशिया में उतरेगा, तो विपक्षी मुल्कों को पहले से पता होगा कि सामना किससे है।

​13 की उम्र से शुरू हुई लोहे की जंग

​यह जुनून किसी कल की पैदाइश नहीं है बल्कि पांच दशकों के अटूट संघर्ष की भट्ठी में तपकर निकला अंगारा है। महज 13 साल की उम्र में जब बच्चे गलियों में खेल-कूद कर वक्त जाया करते हैं, तब मोहन पाराशर ने वजन उठाने का फैसला किया था। उस दौर में न तो आधुनिक जिम थे और न ही फैंसी प्रोटीन डाइट। था तो सिर्फ एक जिद्दी दिमाग और देश के लिए कुछ कर गुजरने की आग। नतीजा यह निकला कि 1978 से लेकर 1982 तक लगातार पांच साल तक इस खिलाड़ी ने पूरे प्रदेश पर राज किया और स्टेट चैंपियन की ट्रॉफी को अपनी बपौती बनाए रखा। सीहोर की मिट्टी से उठा यह बवंडर अब पूरी दुनिया के पोडियम पर अपनी दस्तक दे चुका है।

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​नई पौध तैयार करने वाला ऐसा गुरु, जो ढिलाई बर्दाश्त नहीं करता

​मोहन पाराशर सिर्फ खुद ही वजन नहीं उठा रहे बल्कि आने वाली पीढ़ियों के खून में भी लोहा भरने का काम कर रहे हैं। उनके कोचिंग सेंटर में 60 से ज्यादा युवा वेटलिफ्टर दिन-रात पसीना बहा रहे हैं। उनके सिखाने का अंदाज बिल्कुल साफ है..अगर अखाड़े में कदम रखा है तो बहानेबाजी बाहर छोड़ आओ। उनकी इस सख्त ट्रेनिंग का ही असर है कि आधा दर्जन से अधिक खिलाड़ी नेशनल लेवल और खेलो इंडिया जैसी प्रतिष्ठित प्रतियोगिताओं में मेडल झटक चुके हैं। वे तकनीक के साथ-साथ मानसिक मजबूती की ऐसी खुराक देते हैं जो किसी भी खिलाड़ी को मैदान में टूटने नहीं देती।

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​सुधर जाओ युवाओं, मैदान तुम्हारा इंतजार कर रहा है

​मोहन पाराशर का दो-टूक फरमान आज के उन युवाओं के नाम है जो सोशल मीडिया और अकर्मण्यता के जाल में अपनी जवानी बर्बाद कर रहे हैं। उनका कहना साफ है कि खेल सिर्फ तमगे जीतने का जरिया नहीं, बल्कि जिंदगी को अनुशासन और ताकत से जीने का सबसे बड़ा हथियार है। जब 67 साल का एक बुजुर्ग इंटरनेशनल स्टेज पर तिरंगा फहराने के लिए अपनी जान झोंक सकता है, तो 20 साल के युवाओं को घर में बैठने का कोई हक नहीं है। मलेशिया का अखाड़ा तैयार है, भारतीय खेमा मुस्तैद है और सीहोर का यह लड़ाका एक बार फिर दुनिया को यह दिखाने के लिए तैयार है कि भारतीय जिगरे की कोई एक्सपायरी डेट नहीं होती।

Sunil Sharma
By Sunil Sharma

सुनील शर्मा, सीहोर जिला ब्यूरो, पीपुल्स समाचार ढाई दशक से पत्रकारिता में सक्रिय। दैनिक भास्कर, पत...Read More

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