जबलपुर: रेत खनन ठेकेदार के खिलाफ याचिका खारिज, व्यापारी पर 50 हजार रुपए जुर्माना

जबलपुर। जस्टिस विवेक रूसिया और जस्टिस प्रदीप मित्तल की डिवीजन बेंच ने कहा कि निजी विवाद निपटाने के लिए याचिका का इस्तेमाल नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने याचिकाकर्ता के अधिवक्ता को भी भविष्य में दूसरे पक्ष के खिलाफ ऐसे आरोप लगाने से बचने की चेतावनी दी, जिनका उद्देश्य अदालत की धारणा को प्रभावित करना हो। जुर्माने की राशि 4 सप्ताह के भीतर मप्र राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण, जबलपुर में जमा करनी होगी।
कंपनी के खिलाफ जांच और अनुबंध निरस्त करने की मांग
सीधी में रहने वाले व्यापारी मनीष सिंह ने हाईकोर्ट में याचिका दायर कर सहकार ग्लोबल लिमिटेड के खिलाफ जांच कराने और उसके खनन अनुबंध निरस्त करने की मांग की थी। कंपनी को शहडोल और सिंगरौली जिलों में रेत खनन, भंडारण, परिवहन और बिक्री के लिए माइन डेवलपर-कम-ऑपरेटर नियुक्त किया गया था। याचिकाकर्ता का आरोप था कि कंपनी ने उसके ट्रक के नाम पर 17 फर्जी ई-ट्रांजिट पास जारी किए, जबकि वाहन तकनीकी खराबी के कारण करीब एक महीने से बंद था।
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ट्रक के नाम पर फर्जी ई-ट्रांजिट पास का आरोप
याचिकाकर्ता ने इसी आधार पर कंपनी के खिलाफ कार्रवाई और ठेका निरस्त करने की मांग की थी। मामले की सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की ओर से कंपनी के वकील शोएब हसन खान पर बार-बार मेंशन कर सुनवाई टलवाने का आरोप लगाया गया। दावा किया गया कि ऐसा सिंगरौली क्षेत्र में पड़ी रेत हटाने का मौका देने के लिए किया जा रहा है।
18 अगस्त को जांच के आदेश, 22 अगस्त को रिपोर्ट
हाईकोर्ट ने 18 अगस्त 2026 को मामले की जांच के आदेश प्रधान रजिस्ट्रार (न्यायिक) को दिए। 22 अगस्त 2026 की जांच रिपोर्ट में अधिवक्ता शोएब हसन खान के खिलाफ लगाए गए आरोप सही नहीं पाए गए। रिपोर्ट पर गौर करने के बाद बेंच ने पिछले आदेश में अधिवक्ता शोएब हसन के खिलाफ की गईं प्रतिकूल टिप्पणियां वापस लेते हुए जांच की कार्यवाही समाप्त कर दी।
निजी विवाद में न्यायिक प्रक्रिया के इस्तेमाल पर टिप्पणी
अपने आदेश में हाईकोर्ट ने कहा कि मुख्य रूप से याचिकाकर्ता और कंपनी के बीच ट्रकों के परिवहन कार्य को लेकर विवाद था। याचिकाकर्ता ने कंपनी के खिलाफ आपराधिक शिकायत, रिट याचिका और अवमानना आवेदन सहित कई कानूनी प्रक्रियाओं का सहारा लिया। बेंच के अनुसार, इससे प्रतीत होता है कि प्रतिवादी कंपनी पर दबाव बनाने के लिए न्यायिक प्रक्रिया का इस्तेमाल किया गया।
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याचिका खारिज, 50 हजार रुपये का जुर्माना
हाईकोर्ट ने याचिका खारिज करते हुए कुल 50 हजार रुपये का जुर्माना लगाया। इसमें 25 हजार रुपये झूठे आरोपों के लिए और 25 हजार रुपये निराधार याचिका दायर करने के लिए हैं। पूरी राशि 4 सप्ताह के भीतर मप्र राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण, जबलपुर में जमा करनी होगी। बेंच ने याचिकाकर्ता के अधिवक्ता को भविष्य में दूसरे पक्ष के खिलाफ ऐसे आरोप लगाने से बचने की चेतावनी भी दी, जिनका उद्देश्य अदालत की धारणा को प्रभावित करना हो।




















