भोपाल नगर निगम में आईटी सेल के जरिए फर्जी ई-बिल बनाकर भुगतान किए जाने का मामला अब तूल पकड़ने लगा है। भोपाल नगर निगम में इस प्रकरण के सामने आने के बाद प्रशासनिक हलचल तेज हो गई है। शुक्रवार को मध्य प्रदेश लोकायुक्त संगठन की टीम ने निगम के सर्वर सेंटर में सर्च कार्रवाई की, जिसके बाद पूरे निगम प्रशासन में हड़कंप मच गया। इसी बीच निगम आयुक्त संस्कृति जैन ने वित्त एवं लेखा विभाग में बड़ा प्रशासनिक बदलाव करते हुए अपर आयुक्त गुणवंत सेवतकर को इस विभाग की जिम्मेदारी से हटा दिया है। उनकी जगह अपर आयुक्त मुकेश शर्मा को वित्त एवं लेखा विभाग का अतिरिक्त प्रभार सौंपा गया है। आदेश के अनुसार मुकेश शर्मा अपने मौजूदा कार्यों के साथ-साथ इस विभाग की जिम्मेदारी भी संभालेंगे।
सूत्रों के अनुसार निगम की केंद्रीय कर्मशाला (मोटर वर्कशॉप) में वाहनों की मरम्मत, रंग-रोगन और मेंटेनेंस के नाम पर फर्जी ई-बिल तैयार कर लाखों रुपए का भुगतान कराए जाने की शिकायत लोकायुक्त को मिली थी। आरोप है कि कई मामलों में वास्तविक काम कराए बिना ही बिल तैयार किए गए, उन्हें सिस्टम में अपलोड किया गया और बाद में भुगतान भी पास हो गया। शिकायत के आधार पर लोकायुक्त की टीम ने आईटी सेल से जुड़े डिजिटल रिकॉर्ड की जांच शुरू कर दी है। बताया जा रहा है कि आईटी सेल प्रभारी (कंप्यूटर प्रोग्रामर) आंदलीप वारसी के घर पर भी टीम ने दबिश दी और उनसे कई घंटों तक पूछताछ की।
इस पूरे मामले में सबसे बड़ा सवाल वित्त विभाग की कार्यप्रणाली पर उठ रहा है। आमतौर पर किसी भी भुगतान से पहले बिलों की तकनीकी और वित्तीय जांच की प्रक्रिया पूरी की जाती है, लेकिन आरोप है कि इस मामले में यह प्रक्रिया सही तरीके से नहीं अपनाई गई। केंद्रीय कर्मशाला से तैयार होकर वित्त विभाग तक पहुंचे ई-बिलों को पर्याप्त सत्यापन के बिना ही मंजूरी दे दी गई, जिससे फर्जी भुगतान की आशंका और मजबूत हो गई है।
लोकायुक्त की टीम फिलहाल निगम के सर्वर सेंटर में उपलब्ध डिजिटल रिकॉर्ड, ई-बिलिंग डेटा और भुगतान से जुड़े दस्तावेजों की बारीकी से जांच कर रही है। टीम ऑनलाइन एंट्री और वास्तविक भुगतान के दस्तावेजों का मिलान कर रही है। प्रारंभिक जांच में आशंका जताई जा रही है कि इस मामले में कई अधिकारी और कर्मचारी भी जांच के दायरे में आ सकते हैं।
शिकायत में यह भी आरोप लगाया गया है कि जिन फर्मों के नाम पर भुगतान किया गया, उनमें से कुछ फर्में आरोपित कर्मचारियों के परिचितों या रिश्तेदारों के नाम पर संचालित बताई जा रही हैं। इन फर्मों के माध्यम से सरकारी राशि का हस्तांतरण कर घोटाले को अंजाम देने की आशंका जताई जा रही है।
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सूत्रों का कहना है कि वाहनों की मरम्मत और मेंटेनेंस के नाम पर फर्जी बिल बनाकर भुगतान कराने के साथ-साथ कमीशनखोरी का खेल भी लंबे समय से चल रहा था। फिलहाल लोकायुक्त टीम सभी दस्तावेजों और डिजिटल रिकॉर्ड की जांच कर रही है। जांच पूरी होने के बाद इस पूरे मामले में शामिल अधिकारियों और कर्मचारियों की भूमिका स्पष्ट होने की संभावना है। वहीं वित्त एवं लेखा विभाग में जिम्मेदारी बदलने के फैसले को भी इसी घटनाक्रम से जोड़कर देखा जा रहा है।