अंबानी ग्रुप पर 150 करोड़ की धोखाधड़ी का आरोप!पैसे दूसरी कंपनियों में किए डाइवर्ट, फर्जीवाड़ा और लोन डाइवर्जन की पूरी कहानी

नई दिल्ली। अनिल अंबानी ग्रुप से जुड़ी कंपनियों पर गंभीर वित्तीय धोखाधड़ी के आरोप सामने आए हैं। मुंबई पुलिस की आर्थिक अपराध शाखा (EOW) की जांच में दावा किया गया है कि फर्जी दस्तावेजों के आधार पर बैंक से करीब 150 करोड़ का लोन लिया गया और बाद में इस रकम को तय उद्देश्य के बजाय अन्य कंपनियों में ट्रांसफर कर दिया गया।
मामला आखिर है क्या?
मुंबई में अनिल अंबानी ग्रुप से जुड़ी कंपनियों के तत्कालीन निदेशकों पर गंभीर आरोप लगे हैं। आरोप है कि बैंक से करीब 150 करोड़ रुपए का लोन लेकर उसे तय उद्देश्य के बजाय दूसरी कंपनियों और कामों में ट्रांसफर कर दिया गया। इस पूरे केस में धोखाधड़ी और आपराधिक साजिश जैसे गंभीर अपराधों की बात सामने आ रही है। जांच मुंबई पुलिस की आर्थिक अपराध शाखा (EOW) कर रही है।
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शिकायत किसने की?
इस मामले की शुरुआत बैंक की आधिकारिक शिकायत से हुई। Axis Bank के वाइस प्रेसिडेंट प्रकाश प्रभाकर राव ने पुलिस में शिकायत दर्ज कराई थी। शिकायत में कहा गया कि लोन लेने के दौरान बैंक को गुमराह किया गया और गलत जानकारी देकर वित्तीय नुकसान पहुंचाने की साजिश रची गई। बैंक का दावा है कि यह कोई सामान्य डिफॉल्ट नहीं, बल्कि एक योजनाबद्ध वित्तीय धोखाधड़ी है।
मामला कब का है?
यह पूरा घटनाक्रम जनवरी 2010 से लेकर नवंबर 2019 के बीच का बताया जा रहा है। यानी लगभग एक दशक तक यह वित्तीय लेन-देन और कथित गड़बड़ियां चलती रहीं। इसी अवधि में कई कंपनियों और निदेशकों की भूमिका की जांच की जा रही है।
किन लोगों पर आरोप हैं?
जांच के दायरे में कई लोग और कंपनियां शामिल हैं, जिनमें रिलायंस होम फाइनेंस लिमिटेड के तत्कालीन होल-टाइम डायरेक्टर और अनिल धीरूभाई अंबानी ग्रुप (ADAG) से जुड़ी कंपनियों के अधिकारी शामिल है। इन सभी पर आरोप है कि उन्होंने मिलकर बैंकिंग सिस्टम को गुमराह किया और फंड का गलत इस्तेमाल किया।
लोन कैसे लिया गया और क्या हुआ आगे?
पुलिस जांच के अनुसार, बैंक से लोन लेने के लिए कई दस्तावेज जमा किए गए थे। लेकिन आरोप है कि दस्तावेजों में वित्तीय स्थिति को गलत तरीके से दिखाया गया, बैंक को भ्रामक जानकारी दी गई और लोन मंजूरी के लिए गलत तथ्यों का सहारा लिया गया। जब बैंक से करीब 150 करोड़ रुपए का लोन पास हो गया, तो उसके बाद असली खेल शुरू हुआ।
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पैसा कहां गया?
लोन लेने के बाद आरोप है कि पैसा उस काम में इस्तेमाल नहीं किया गया, जिसके लिए वह लिया गया था। इसके बजाय पैसा ग्रुप की दूसरी कंपनियों में ट्रांसफर किया गया, कई खातों में फंड डाइवर्ट किया गया और बिजनेस उद्देश्य के बजाय अंदरूनी कंपनियों के बीच रकम घुमाई गई। इसी प्रक्रिया को लोन डाइवर्जन कहा जाता है।
आसान भाषा में समझें तो जब कोई कंपनी बैंक से बिजनेस के लिए पैसा ले और उसे उस काम में न लगाकर दूसरी जगह भेज दे, तो उसे लोन डाइवर्जन कहते हैं। जो बैंकिंग नियमों के खिलाफ माना जाता है।
पहले भी दर्ज हो चुकी है FIR
यह पहला मामला नहीं है। इसी साल 12 मार्च को भी इसी तरह के आरोपों में अनिल अंबानी ग्रुप से जुड़ी कंपनियों और कई निदेशकों के खिलाफ पहली FIR दर्ज की गई थी। अब यह दूसरी FIR दर्ज की गई है, जिससे मामला और गंभीर हो गया है।
बैंक की क्या दलील है?
बैंक का कहना है कि यह सिर्फ लोन न चुकाने का मामला नहीं है, बल्कि सुनियोजित वित्तीय धोखाधड़ी, फर्जी दस्तावेजों के जरिए लोन लेना और बाद में उस पैसे का गलत इस्तेमाल करने से जुड़ा है। बैंक का यह भी दावा है कि यह कार्रवाई उनके अंदरूनी ऑडिट और जांच के बाद सामने आई।
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EOW क्या होती है?
इकोनॉमिक ऑफेंस विंग (EOW) पुलिस की एक विशेष इकाई होती है, जो बड़े आर्थिक अपराधों की जांच करती है। इसमें बैंक फ्रॉड, कॉरपोरेट घोटाले, जालसाजी और बड़े वित्तीय लेन-देन में धोखाधड़ी जैसे अपराध शामिल है।
आगे क्या हो सकता है?
फिलहाल जांच जारी है। EOW सभी दस्तावेज, बैंक ट्रांजैक्शन और कंपनी रिकॉर्ड की जांच कर रही है। आने वाले समय में और लोगों से पूछताछ हो सकती है, नए दस्तावेज सामने आ सकते हैं और मामले में और FIR या चार्जशीट संभव है।











