कॉकरोच से क्रांति तक...कौन हैं आंदोलन के 'चार स्तंभ'? जिनकी वजह से देशभर में गूंजी छात्रों की आवाज

एक सोशल मीडिया पोस्ट... चार चेहरे... और देखते ही देखते एक ऐसा छात्र आंदोलन, जिसकी गूंज पूरे देश में सुनाई देने लगी। मई में चीफ जस्टिस सूर्यकांत की 'कॉकरोच' टिप्पणी चर्चा में आई। इसके बाद अभिजीत दीपके ने सोशल मीडिया पर एक सवाल उठाया- अगर कॉकरोच कहे जा रहे सभी युवा एकजुट हो जाएं, तो क्या होगा? यही सवाल आगे चलकर हजारों युवाओं के लिए एक अभियान की शुरुआत बन गया।
देश में छात्र आंदोलनों का लंबा इतिहास रहा है, लेकिन इस बार एक ऐसा आंदोलन देखने को मिला जिसकी शुरुआत किसी बड़े राजनीतिक मंच से नहीं, बल्कि सोशल मीडिया पर लिखी गई एक पोस्ट से हुई। कुछ ही दिनों में कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) नाम से एक डिजिटल मुहिम सामने आई। सोशल मीडिया पर इस अभियान को तेजी से समर्थन मिलने लगा और NEET पेपर लीक का मुद्दा इसका सबसे बड़ा एजेंडा बन गया। ऑनलाइन शुरू हुई यह मुहिम जल्द ही सड़कों तक पहुंची और जंतर-मंतर समेत कई जगहों पर छात्रों ने प्रदर्शन शुरू कर दिए।
एक टिप्पणी से शुरू हुई पूरी कहानी
मई महीने में एक टिप्पणी सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हुई। इसके बाद युवाओं के बीच इस पर लगातार चर्चा होने लगी। उसी दौरान अभिजीत दीपके ने सोशल मीडिया पर एक पोस्ट लिखी। उन्होंने लिखा कि अगर 'कॉकरोच' कहे जा रहे सभी युवा एकजुट हो जाएं, तो क्या होगा? यह सवाल केवल एक पोस्ट नहीं रहा। हजारों युवाओं ने इसे अपनी आवाज बना लिया। देखते ही देखते यह पोस्ट सोशल मीडिया पर वायरल हो गई और एक नए आंदोलन की शुरुआत हो गई।
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70 दिनों में खड़ी हो गई नई पहचान
सोशल मीडिया पर लोगों का समर्थन मिलने के बाद अभिजीत दीपके ने कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) नाम से एक मंच बनाया। कुछ ही दिनों में इसके सोशल मीडिया अकाउंट पर करोड़ों लोग जुड़ गए। इसके बाद NEET पेपर लीक को मुख्य मुद्दा बनाकर देशभर के छात्रों को एक मंच पर लाने की तैयारी शुरू हुई। ऑनलाइन अभियान धीरे-धीरे जमीनी आंदोलन में बदलने लगा। जंतर-मंतर पर धरना, राज्यों में प्रदर्शन और लगातार बढ़ते जनसमर्थन ने इस आंदोलन को राष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाई।
आंदोलन को क्रांति बनाने वाले 4 चेहरे
अभिजीत दीपके: जिसने गुस्से को आंदोलन में बदल दिया
अभिजीत दीपके को इस छात्र आंदोलन के प्रमुख चेहरों में माना जाता है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार उन्होंने बोस्टन यूनिवर्सिटी से मास्टर्स की पढ़ाई की है और लंबे समय से सोशल मीडिया के जरिए युवाओं से जुड़े मुद्दों पर अपनी बात रखते रहे हैं। 'कॉकरोच' टिप्पणी के बाद उनकी एक सोशल मीडिया पोस्ट ने सबसे ज्यादा चर्चा बटोरी। इसी पोस्ट के बाद कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) नाम से अभियान शुरू हुआ। आंदोलन के दौरान उन्होंने डिजिटल कैंपेन चलाने, स्वयंसेवकों को जोड़ने, अलग-अलग टीम बनाने और सोशल मीडिया के जरिए छात्रों तक संदेश पहुंचाने में अहम भूमिका निभाई। समर्थकों का मानना है कि ऑनलाइन शुरू हुई इस मुहिम को जमीनी आंदोलन बनाने में उनकी बड़ी भूमिका रही।

सोनम वांगचुक: आंदोलन को मिला नैतिक नेतृत्व
जब आंदोलन शुरू हुआ था, तब अलग-अलग समूह अपनी-अपनी तरह से विरोध कर रहे थे। बाद में शिक्षा सुधारक सोनम वांगचुक आंदोलन से जुड़े। सोनम वांगचुक देश के जाने-माने शिक्षा सुधारक, इंजीनियर और सामाजिक कार्यकर्ता हैं। लद्दाख में शिक्षा के क्षेत्र में उनके काम की देश-विदेश में सराहना हो चुकी है। वे SECMOL (Students' Educational and Cultural Movement of Ladakh) के संस्थापक भी हैं। उनकी सोच और काम से प्रेरित होकर फिल्म '3 Idiots' के मशहूर किरदार फुंसुख वांगड़ू को तैयार किए जाने की चर्चा भी होती रही है। छात्र आंदोलन के दौरान उन्होंने छात्रों की मांगों का समर्थन किया और अनशन के जरिए इस मुद्दे को राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा में लाने का प्रयास किया। आंदोलन से जुड़े लोगों का कहना है कि उनके जुड़ने के बाद आंदोलन को नई ऊर्जा और व्यापक पहचान मिली।

सौरव दास: आंदोलन की आवाज बने
किसी भी बड़े आंदोलन में सही जानकारी पहुंचाना सबसे बड़ी चुनौती होती है। इस जिम्मेदारी को सौरव दास ने संभाला। सौरव दास एक खोजी पत्रकार के रूप में जाने जाते हैं। आंदोलन के दौरान उन्होंने मीडिया और छात्रों के बीच संवाद की अहम जिम्मेदारी संभाली। प्रदर्शन की तारीख, मांगों और आंदोलन से जुड़ी जरूरी जानकारियां लोगों तक पहुंचाने में वे लगातार सक्रिय रहे। समर्थकों के अनुसार, उन्होंने सोशल मीडिया पर फैल रही अफवाहों का जवाब देने, प्रेस से संवाद करने और अलग-अलग राज्यों में जुड़े समर्थकों के बीच समन्वय बनाने का काम किया। उनकी भूमिका की वजह से आंदोलन की आधिकारिक जानकारी लगातार लोगों तक पहुंचती रही।

आशुतोष रांका: जिन्होंने आंदोलन को मुद्दे से भटकने नहीं दिया
कई बार बड़े आंदोलन समय के साथ अपने मूल उद्देश्य से दूर हो जाते हैं। लेकिन आशुतोष रांका ने ऐसा नहीं होने दिया। उन्होंने आंदोलन की मुख्य मांगों को लगातार सामने रखा। आशुतोष रांका के बारे में उपलब्ध जानकारी के अनुसार वे IIT से पढ़ाई कर चुके हैं और छात्र हितों से जुड़े मुद्दों पर सक्रिय रहे हैं। आंदोलन के दौरान उन्होंने इसकी रणनीति और मुख्य मांगों को स्पष्ट रखने का काम किया। समर्थकों का कहना है कि उन्होंने यह सुनिश्चित करने की कोशिश की कि आंदोलन का फोकस शिक्षा सुधार, छात्रों की मांगों और पेपर लीक जैसे मुद्दों पर ही बना रहे। साथ ही, आंदोलन को अन्य राजनीतिक बहसों से दूर रखते हुए एक स्पष्ट दिशा देने में भी उनकी महत्वपूर्ण भूमिका बताई जाती है।

डिजिटल से धरातल तक बना मजबूत नेटवर्क
इस आंदोलन की सबसे बड़ी ताकत इसकी डिजिटल रणनीति रही। ऑनलाइन प्लेटफॉर्म के जरिए देशभर के छात्रों को एक-दूसरे से जोड़ा गया। वेबसाइट और गूगल फॉर्म के माध्यम से स्वयंसेवकों का पंजीकरण किया गया। इसके बाद कॉलेज, शहर और राज्य के हिसाब से अलग-अलग टीमों का गठन किया गया। इससे किसी भी कार्यक्रम की जानकारी कुछ ही मिनटों में हजारों लोगों तक पहुंचने लगी।
सोशल मीडिया बना सबसे बड़ा हथियार
इंस्टाग्राम, एक्स और दूसरे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर लगातार वीडियो, पोस्ट और अभियान चलाए गए। हर प्रदर्शन से पहले जरूरी जानकारी साझा की जाती थी। युवाओं से अपील की जाती थी कि वे शांतिपूर्ण तरीके से आंदोलन में हिस्सा लें। सोशल मीडिया की वजह से देश के अलग-अलग राज्यों के छात्र एक-दूसरे से जुड़े रहे।
इंटरनेट बंद होने पर भी नहीं टूटा संपर्क
आंदोलन के दौरान कई जगह इंटरनेट सेवाएं प्रभावित होने की खबरें भी सामने आईं। ऐसी स्थिति में प्रदर्शनकारियों ने वैकल्पिक तकनीक का सहारा लिया। रिपोर्टों के अनुसार, इंटरनेट उपलब्ध न होने पर भी आपसी संपर्क बनाए रखने के लिए दूसरे संचार माध्यमों का इस्तेमाल किया गया। इससे प्रदर्शन के दौरान टीमों के बीच संवाद लगातार जारी रहा और कार्यक्रम प्रभावित नहीं हुए।
युवाओं की नाराजगी बनी सबसे बड़ी ताकत
इस पूरे आंदोलन की सबसे बड़ी ताकत देशभर के छात्र और युवा रहे। उन्होंने सोशल मीडिया पर अपनी बात रखी और फिर सड़कों पर उतरकर अपनी मांगों के समर्थन में आवाज उठाई। युवाओं की बड़ी भागीदारी ने इस अभियान को राष्ट्रीय चर्चा का विषय बना दिया।











