नई दिल्ली। देश की प्रतिष्ठित शिक्षा संस्था NCERT के सिलेबस में शामिल एक चैप्टर ने अचानक संवैधानिक बहस छेड़ दी है। 8वीं कक्षा की नई सोशल साइंस की किताब में न्यायपालिका से जुड़े विवादित टॉपिक को लेकर विवाद इतना बढ़ा कि सुप्रीम कोर्ट ने खुद संज्ञान लिया और कड़ा रुख अपनाया है। इसके बाद NCERT ने अपने फैसले पर अफसोस जताते हुए माफी मांगी है। साथ ही कहा कि, विवादित चैप्टर को फिर से लिखा जाएगा।
पढ़िए पूरा विवाद कैसे शुरू हुआ, क्यों मामला संवेदनशील है, क्या कहा गया, सुप्रीम कोर्ट की प्रतिक्रिया और अब आगे क्या होगा।
NCERT ने 24 फरवरी 2026 को क्लास 8 के लिए सोशल साइंस की नई टेक्स्टबुक “Exploring Society: India and Beyond - Volume II” को प्रिंट और वितरण के लिए जारी किया। इस किताब में चैप्टर 4- ‘हमारे समाज में न्यायपालिका की भूमिका’ के अंतर्गत ‘न्यायपालिका में भ्रष्टाचार’ (Judicial Corruption) को एक सेक्शन के रूप में शामिल किया गया। यानी ये न्यायपालिका में भ्रष्टाचार पर आधारित था।
इस सेक्शन में बताया गया कि-
आरोप लगा कि-
मुख्य रूप से विवाद इस बात को लेकर हुआ कि, केवल न्यायपालिका पर ही केंद्रित टिप्पणी को 8वीं कक्षा की किताब में शामिल किया गया, जबकि अन्य संवैधानिक संस्थाओं (जैसे कार्यपालिका और विधायिका) के बारे में सही जानकारी नहीं दी गई थी। 8वीं कक्षा के छात्रों के लिए विषय की संवेदनशीलता पर विचार नहीं किया गया।
1. न्यायपालिका का स्ट्रक्चर
किताब में बताया गया कि न्यायपालिकाई ढांचा कैसे काम करता है- सुप्रीम कोर्ट, हाई कोर्ट और जिला अदालतें और उनके बीच का पदानुक्रम (hierarchy)।
2. न्यायपालिका के सामने चुनौतियां
यह वह भाग था जिसने विवाद खड़ा कर दिया-
3. आंतरिक जवाबदेही और शिकायत प्रणाली
टेक्स्टबुक में CPGRAMS (Centralized Public Grievance Redress and Monitoring System) का उल्लेख था, जिसमें बताया गया कि, 2017 से 2021 के बीच 1600 से ज्यादा शिकायतें इसी सिस्टम के माध्यम से प्राप्त हुई थीं।
4. संवैधानिक प्रावधान
किताब में इस बात का भी जिक्र था कि, गंभीर मामलों में जजों को हटाने के संवैधानिक नियम पार्लियामेंट द्वारा अपनाए जा सकते हैं, लेकिन उचित जांच और प्रक्रिया के बाद ही ऐसा किया जाता है।
5. पूर्व CJI का उद्धरण
पुस्तक में भारत के पूर्व चीफ जस्टिस बी आर गवई का हवाला दिया गया, जिसमें उन्होंने कहा था कि, अगर न्यायपालिका के अंदर भ्रष्टाचार होता है तो इससे लोगों का भरोसा कम होता है। उन्होंने यह भी कहा कि, किसी भी लोकतंत्र में पारदर्शिता और जवाबदेही बहुत जरूरी होती है, क्योंकि इन्हीं से लोगों का सिस्टम पर विश्वास बना रहता है।
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जैसे ही विवाद बढ़ा, सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार (26 फरवरी 2026) को खुद संज्ञान ले लिया।
सीजेआई जस्टिस सूर्यकांत और उनकी बेंच ने कहा कि, यह एक गंभीर चिंता का विषय है। संविधान की रक्षक संस्था को बदनाम नहीं किया जा सकता। यह एक सोची-समझी कार्रवाई प्रतीत होती है, मैं किसी को भी संस्था को बदनाम करने की अनुमति नहीं दूंगा। CJI ने यह भी कहा कि, बच्चों को न्यायपालिका में भ्रष्टाचार के बारे में पढ़ाना अपमानजनक और अनुचित है। उन्होंने इसे संस्थागत अखंडता पर चोट और न्यायपालिका को बदनाम करने वाला प्रयास बताते हुए संज्ञान लिया।
सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी के बाद शिक्षा मंत्रालय के स्कूल शिक्षा एवं साक्षरता विभाग ने भी आपत्ति जताई। इसके बाद-
सुप्रीम कोर्ट की फटकार के कुछ ही घंटों बाद, NCERT ने आधी रात को आधिकारिक बयान जारी किया। NCERT ने कहा-
संस्था ने माफी भी मांगी और आश्वासन दिया कि आगे ऐसी गलती नहीं होगी।
NCERT ने साफ किया है कि नई किताब का मकसद किसी संस्था की आलोचना करना नहीं था। इस किताब का उद्देश्य बच्चों को संविधान और लोकतंत्र की सही समझ देना था। इसके जरिए यह बताया जाना था कि अलग-अलग संस्थाएं कैसे काम करती हैं और समाज में उनका क्या महत्व है। साथ ही, छात्रों को नागरिकों के अधिकारों और कर्तव्यों के बारे में जागरूक करना भी इसका लक्ष्य था।
NCERT के मुताबिक, किताब में दी गई बातों का उद्देश्य केवल यह समझाना था कि संवैधानिक संस्थाओं के सामने क्या-क्या चुनौतियां होती हैं, न कि किसी संस्था की छवि को नुकसान पहुंचाना।
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इस विवाद ने एक बड़ा सवाल उठाया है-
विशेषज्ञ मानते हैं कि, शिक्षा में आलोचनात्मक सोच और पारदर्शिता जरूरी है, लेकिन उम्र और संदर्भ का ध्यान रखते हुए सामग्री तैयार की जानी चाहिए।
अब NCERT ने घोषणा की है कि-