मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव और बदलते ग्लोबल तनाव के बीच नाटो को लेकर जर्मनी का एक बयान चर्चा में आ गया है। जर्मनी ने साफ बताया कि नाटो का मकसद केवल सदस्य देशों की सुरक्षा है, न कि किसी एक देश के आक्रामक युद्ध में शामिल होना। जर्मनी के इस रुख को अमेरिका के लिए एक तरह की ‘लक्ष्मण रेखा’ माना जा रहा है।
जर्मनी के चांसलर फ्रेडरिक मर्ज के प्रवक्ता स्टीफन कोर्नेलिअस ने एक प्रेस ब्रीफिंग में कहा कि अमेरिका और इजरायल द्वारा ईरान पर किए गए हमलों से शुरू हुए मध्य पूर्व संघर्ष का NATO से कोई संबंध नहीं है। उन्होंने कहा कि नाटो एक रक्षा गठबंधन है और इसका उद्देश्य केवल सदस्य देशों की सुरक्षा करना है। मौजूदा हालात में नाटो को युद्ध में उतारने का कोई अधिकार या जरूरत नहीं है। जर्मनी के इस बयान का साफ मतलब है कि अगर अमेरिका या नाटो का कोई सदस्य देश पहले हमला झेलता है तो सभी सदस्य देश मिलकर उसकी रक्षा करेंगे। लेकिन अगर नाटो में शामिल कोई देश खुद किसी दूसरे देश पर हमला करता है तो बाकी नाटो देश उसके लिए युद्ध में शामिल होने के लिए बाध्य नहीं होंगे।
दुनिया में अमेरिका को सुपरपावर माना जाता है, लेकिन उसकी ताकत तब और बढ़ जाती है जब उसके साथ नाटो के 32 सदस्य देशों का समर्थन होता है। पिछले कई दशकों में जब भी अमेरिका ने किसी युद्ध में कदम रखा, तब कई नाटो देश भी उसके साथ खड़े नजर आए। ऐसे में उन्हें अपने सैनिक, हथियार और संसाधन भी लगाने पड़े। इसके बदले इन देशों को सामूहिक सुरक्षा की गारंटी मिलती थी और वे दुनिया के सबसे शक्तिशाली सैन्य गठबंधन का हिस्सा बने रहते थे। हालांकि हाल के वर्षों में यह संतुलन बदलता हुआ दिखाई दे रहा है।
जब डोनाल्ड ट्रंप पहली बार अमेरिका के राष्ट्रपति बने थे तभी से उनका नाटो देशों के साथ विवाद शुरू हो गया था। ट्रंप का आरोप था कि नाटो में शामिल कई देश अपनी रक्षा पर पर्याप्त खर्च नहीं करते और सुरक्षा के लिए अमेरिका पर निर्भर रहते हैं। हालांकि बाद में जो बाइडेन के राष्ट्रपति बनने के बाद अमेरिका और नाटो सहयोगियों के बीच संबंध फिर से सामान्य हो गए थे। लेकिन ट्रंप के दोबारा सत्ता में आने के बाद यह तनाव फिर बढ़ गया। ट्रंप प्रशासन ने कई मौकों पर नाटो सहयोगियों की आलोचना की और कई अंतरराष्ट्रीय फैसले बिना उनसे चर्चा किए ही ले लिए।
इन घटनाओं के बाद यूरोप के कई देश अमेरिका पर पूरी तरह निर्भर रहने के बजाय अपनी सुरक्षा रणनीति मजबूत करने में जुट गए हैं। यूरोप में फ्रांस और जर्मनी इस दिशा में नेतृत्व करते नजर आ रहे हैं। इसके साथ ही यूनाइटेड किंगडम और कनाडा जैसे देश भी कई मामलों में यूरोपीय देशों के साथ अलग रणनीति बनाते दिखाई दे रहे हैं। अब ये देश अपनी विदेश नीति में भी अधिक स्वतंत्र रुख अपना रहे हैं और अलग-अलग देशों के साथ नए समझौते कर रहे हैं।
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जर्मनी का ताजा बयान यह दिखाता है कि नाटो के कई देश अब हर युद्ध में अमेरिका के साथ स्वतः शामिल होने के लिए तैयार नहीं हैं। वे साफ करना चाहते हैं कि नाटो एक रक्षा गठबंधन है, न कि किसी एक देश की सैन्य कार्रवाई का समर्थन करने वाला मंच। विश्लेषकों का मानना है कि अगर यह रुख आगे भी जारी रहता है तो वैश्विक राजनीति में अमेरिका की सैन्य ताकत पर असर पड़ सकता है, क्योंकि अब तक कई अंतरराष्ट्रीय संघर्षों में उसे नाटो देशों का सामूहिक समर्थन मिलता रहा है।