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सुप्रीम कोर्ट का फांसी पर बड़ा फैसला, मौजूदा व्यवस्था खत्म करने की ठुकराई याचिका, कहा- अभी बदलाव का आधार नहीं

सुप्रीम कोर्ट ने मौत की सजा देने के लिए फांसी की मौजूदा व्यवस्था खत्म करने की याचिका खारिज कर दी। कोर्ट ने कहा कि फिलहाल इसे असंवैधानिक घोषित करने का आधार नहीं है। हालांकि, केंद्र सरकार विशेषज्ञ समिति के जरिए फांसी के विकल्पों और कम पीड़ादायक तरीकों की जांच करा सकती है। जानिए याचिका में कौनसे विकल्प सुझाए गए थे।
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सुप्रीम कोर्ट का फांसी पर बड़ा फैसला, मौजूदा व्यवस्था खत्म करने की ठुकराई याचिका, कहा- अभी बदलाव का आधार नहीं
सुप्रीम कोर्ट ने मौत की सजा देने के लिए फांसी की मौजूदा व्यवस्था खत्म करने की याचिका खारिज कर दी।

सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को मौत की सजा देने के लिए इस्तेमाल होने वाली फांसी की मौजूदा व्यवस्था को खत्म करने की मांग वाली याचिका खारिज कर दी। जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की बेंच ने कहा कि फिलहाल फांसी की प्रक्रिया को असंवैधानिक घोषित करने के लिए पर्याप्त आधार नहीं है। हालांकि, कोर्ट ने यह भी साफ किया कि उसका फैसला केंद्र सरकार को फांसी के विकल्पों पर विचार करने से नहीं रोकता। सरकार चाहे तो विशेषज्ञों की समिति बनाकर मौत की सजा देने के कम पीड़ादायक तरीकों की जांच करा सकती है।

याचिका में फांसी को बताया गया था क्रूर

वरिष्ठ वकील ऋषि मल्होत्रा ने 2017 में यह याचिका दायर की थी। इसमें फांसी की प्रक्रिया को क्रूर, अमानवीय और दर्दनाक बताते हुए इसे खत्म करने की मांग की गई थी। याचिका में फांसी की जगह जहरीले इंजेक्शन, गोली मारने समेत चार वैकल्पिक तरीकों से मौत की सजा देने का सुझाव दिया गया था।

फांसी की जगह 4 ऑप्शन सुझाए गए थे:

  • जहरीला इंजेक्शन
  • गोली मारना
  • बिजली का करंट 
  • गैस चैंबर

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CrPC की धारा 354(5) को चुनौती

याचिका में CrPC की धारा 354(5) को भी असंवैधानिक घोषित करने की मांग की गई थी। इसी प्रावधान के तहत मौत की सजा पाए दोषी को गर्दन से तब तक फांसी पर लटकाने की व्यवस्था है, जब तक उसकी मौत न हो जाए। याचिकाकर्ता का कहना था कि यह तरीका संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत मिले जीवन और गरिमा के अधिकार के खिलाफ है।

कैदी को विकल्प देने की भी मांग

याचिकाकर्ता ने यह तर्क भी दिया था कि मौत की सजा पाए कैदी को फांसी और दूसरे विकल्पों में से किसी एक तरीके को चुनने का अधिकार मिलना चाहिए। याचिका में दावा किया गया था कि फांसी की प्रक्रिया में काफी समय लग सकता है, जबकि गोली मारने या जहरीले इंजेक्शन जैसे तरीकों में कम समय लगने की बात कही गई थी।

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केंद्र ने फांसी की व्यवस्था का बचाव किया था

2018 में केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में मौजूदा फांसी की व्यवस्था का बचाव किया था। गृह मंत्रालय ने अपने हलफनामे में कहा था कि फांसी से मौत जल्दी होती है और इससे कैदी की पीड़ा अनावश्यक रूप से नहीं बढ़ती। केंद्र ने जहरीले इंजेक्शन और गोली मारने जैसे तरीकों को भी फांसी से कम पीड़ादायक मानने से इनकार किया था।

2023 में सुप्रीम कोर्ट ने मांगा था डेटा

मार्च 2023 में सुप्रीम कोर्ट ने फांसी की प्रक्रिया से जुड़ी पीड़ा, मौत में लगने वाले समय और इससे संबंधित व्यवस्थाओं पर केंद्र से ज्यादा और बेहतर डेटा मांगा था।

कोर्ट ने इस मुद्दे की जांच के लिए विशेषज्ञ समिति बनाने पर भी विचार किया था।

इसके बाद मई 2023 में अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणी ने बताया था कि मौत की सजा देने के बेहतर विकल्प तलाशने के लिए विशेषज्ञ समिति बनाने की सिफारिश की गई है। केंद्र सरकार समिति के सदस्यों को लेकर विचार कर रही थी।

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भारत में फांसी से जुड़े चर्चित मामले

धनंजय चटर्जी केस

धनंजय चटर्जी को 18 साल की हेतल पारेख के रेप और हत्या के मामले में दोषी ठहराया गया था। ट्रायल कोर्ट ने उसे मौत की सजा सुनाई, जिसे कलकत्ता हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट ने भी बरकरार रखा। 14 अगस्त 2004 को कोलकाता की अलीपुर जेल में उसे फांसी दी गई। इस मामले में मानवाधिकार संगठनों और कुछ शिक्षाविदों ने फांसी का विरोध किया था।

अजमल कसाब केस

26/11 मुंबई आतंकी हमले के आरोपी अजमल कसाब को हत्या, आतंकवाद और देश के खिलाफ युद्ध जैसे गंभीर अपराधों में दोषी ठहराया गया था। सुप्रीम कोर्ट ने उसकी मौत की सजा बरकरार रखी। 21 नवंबर 2012 को पुणे की यरवदा जेल में उसे फांसी दी गई।

निर्भया केस

2012 के दिल्ली गैंगरेप और हत्या मामले में चार दोषियों-मुकेश सिंह, विनय शर्मा, पवन गुप्ता और अक्षय ठाकुर-को मौत की सजा सुनाई गई थी। सुप्रीम कोर्ट ने भी सजा बरकरार रखी। दया याचिकाओं, क्यूरेटिव याचिकाओं और डेथ वारंट से जुड़ी कानूनी प्रक्रिया के कारण उनकी फांसी कई बार टली। आखिरकार 20 मार्च 2020 को चारों दोषियों को तिहाड़ जेल में फांसी दी गई।

फांसी पर बहस जारी

सुप्रीम कोर्ट के ताजा फैसले के बाद फिलहाल भारत में मौत की सजा देने के लिए फांसी की मौजूदा व्यवस्था बनी रहेगी। हालांकि, कोर्ट ने केंद्र के लिए वैकल्पिक और कम पीड़ादायक तरीकों पर विशेषज्ञों के जरिए विचार करने का रास्ता खुला रखा है।

Dolly Wasvani
By Dolly Wasvani
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