दिवाली स्पेशल: ईद हो या दिवाली, मुनव्वर खान 5 साल से बांट रहे खुशियां; इस बार 200 से अधिक बच्चों को मिलेंगे नए कपड़े, मिठाई और फुलझड़ियां

भोपाल। दिवाली पर शहर रोशनी से जगमगाता है, घरों में पकवान बनते हैं और बच्चे नए कपड़े पहनकर आतिशबाजी करते हैं। लेकिन इसी शहर में कुछ बच्चे ऐसे भी हैं, जिनके लिए त्योहार दूसरों के घरों की रोशनी देखने तक सीमित है। किसी के सिर से पिता का साया उठ चुका है, किसी को मां बेसहारा छोड़ गई है, तो किसी के परिवार के पास दो वक्त की रोटी जुटाने तक के पैसे नहीं हैं।
ऐसे बच्चों की दिवाली रोशन करने का बीड़ा मुनव्वर खान ने उठाया है। वे पांच साल से जरूरतमंद बच्चों के साथ ईद और दिवाली मना रहे हैं। इस बार 200 से अधिक बच्चों को नए कपड़े, मिठाई और फुलझड़ियां देने की तैयारी है।
मुनव्वर भीमनगर, वल्लभ नगर और आसपास की झुग्गी बस्तियों में जरूरतमंद परिवारों के बीच काम करते हैं। उनकी टीम सड़क किनारे भीख मांगने वाले बच्चों को भी इस मुहिम से जोड़ती है। अलग-अलग इलाकों में जाकर परिवारों की स्थिति का सत्यापन किया जाता है, ताकि मदद वास्तविक जरूरतमंदों तक पहुंचे।
पहली बार क्रूज पर बैठे तो खिल उठे चेहरे
करीब पांच साल पहले 60 बच्चों को क्रूज की सैर कराई गई थी। इनमें 90 प्रतिशत बच्चे ऐसे थे, जिन्होंने पहली बार क्रूज में सफर किया था। बच्चों की खुशी देखकर यह सिलसिला आगे बढ़ा और दूसरी बार 90 बच्चों को क्रूज की सैर कराई गई।
क्राइम ब्रांच से महिला थाने तक पहुंची मुहिम
तीसरे आयोजन में क्राइम ब्रांच में तत्कालीन डीसीपी सूर्यकांत सोमवंशी की मौजूदगी में 140 बच्चों को नए कपड़े, मिठाई और फुलझड़ियां दी गईं। इसके बाद महिला थाने में एसीपी पंकज श्रीवास्तव के साथ 160 बच्चों ने दिवाली मनाई। इस बार कोतवाली में एसीपी संतोष कुमार पटेल के साथ 200 से अधिक बच्चों के लिए आयोजन की तैयारी है।
कोविड काल में शुरू हुआ समाजसेवा का सफर
मुनव्वर बताते हैं कि उन्होंने कोविड काल में समाजसेवा शुरू की थी। बस्तियों में काम करते हुए ऐसे बच्चों को देखा, जिनके परिवार त्योहार तक नहीं मना पाते थे। तभी तय किया कि ईद और दिवाली उनके साथ मनाएंगे, ताकि कोई बच्चा खुशियों से वंचित न रहे।
इस मुहिम में एकजुट संस्था और एक्सीलेंस कॉलेज के राष्ट्रीय सेवा योजना (एनएसएस) के विद्यार्थी भी सहयोग करते हैं। टीम बच्चों के माता-पिता और परिवारों से मिलती है। परिवहन और आयोजन का खर्च मुनव्वर स्वयं उठाते हैं।
वे बताते हैं कि नए कपड़े और मिठाई पाकर बच्चों के साथ उनके माता-पिता भी भावुक हो जाते हैं। कई परिवार कहते हैं कि उनके बच्चों के बारे में इस तरह कोई नहीं सोचता। मुनव्वर के लिए यही सबसे बड़ा सुकून है। उनकी कोशिश है कि दिवाली की रोशनी उन घरों तक भी पहुंचे, जहां अब तक त्योहार सिर्फ दूसरों की खुशियां देखने का नाम था।




















