कर्नल सोफिया कुरैशी पर विवादित बयान के मामले में आज विजय शाह की सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई, कैबिनेट ने रोकी मंजूरी, अब राज्यपाल के फैसले पर नजर

मध्य प्रदेश के जनजातीय कार्य मंत्री कुंवर विजय शाह से जुड़े मामले में आज सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई होगी। पिछली सुनवाई में कोर्ट ने मध्य प्रदेश सरकार के रवैये पर सख्त नाराजगी जताई थी और मामले में जल्द फैसला लेने का निर्देश दिया था। अब सरकार ने कैबिनेट के फैसले की जानकारी राज्यपाल को भेज दी है। ऐसे में आज की सुनवाई काफी अहम मानी जा रही है।
क्या है पूरा मामला?
यह मामला मई 2025 का है। इंदौर के महू में एक कार्यक्रम के दौरान मंत्री विजय शाह ने भारतीय सेना की अधिकारी कर्नल सोफिया कुरैशी को लेकर विवादित टिप्पणी की थी। मामला सामने आने के बाद मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने खुद संज्ञान लिया था। बाद में सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर मामले की जांच के लिए SIT बनाई गई।
SIT ने मांगी थी केस चलाने की मंजूरी
SIT ने जांच पूरी करने के बाद विजय शाह के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता यानी BNS की धाराओं के तहत केस चलाने की अनुमति मांगी थी। मौजूदा मंत्री के खिलाफ अभियोजन की कार्रवाई के लिए सरकार की मंजूरी जरूरी होने के कारण यह मामला आगे बढ़ा।
कैबिनेट ने क्या फैसला लिया?
25 अगस्त को मध्य प्रदेश कैबिनेट की बैठक में विजय शाह के खिलाफ अभियोजन की मंजूरी नहीं देने का प्रस्ताव रखा गया। बैठक के दौरान पांच वरिष्ठ अधिकारियों को छोड़कर बाकी अधिकारियों को बाहर भेज दिया गया। इसके बाद कैबिनेट ने केस चलाने की मंजूरी नहीं देने की सिफारिश राज्यपाल मंगू भाई पटेल के पास भेज दी।
मंत्रियों ने दिया माफी का तर्क
कैबिनेट में मंत्रियों की ओर से तर्क दिया गया कि विजय शाह सार्वजनिक मंचों और लिखित रूप में कई बार माफी मांग चुके हैं। ऐसे में उनके खिलाफ मुकदमा चलाने का अब कोई कानूनी और व्यावहारिक आधार नहीं बचता। हालांकि, राज्यपाल ने इस सिफारिश पर क्या फैसला लिया है, यह आज सुप्रीम कोर्ट में सरकार की ओर से दाखिल जानकारी से स्पष्ट हो सकता है।
सुप्रीम कोर्ट पहले जता चुका है नाराजगी
अभियोजन की मंजूरी में देरी को लेकर सुप्रीम कोर्ट मध्य प्रदेश सरकार को पहले ही फटकार लगा चुका है। पिछली सुनवाई में कोर्ट ने सख्त टिप्पणी करते हुए कहा था, ‘Enough is enough’, यानी अब बहुत हो चुका कोर्ट ने सरकार को फैसला लेने के लिए चार सप्ताह का समय दिया था। जब विजय शाह की ओर से बार-बार माफी मांगने की बात कही गई, तो सुप्रीम कोर्ट ने इसे स्वीकार नहीं किया। कोर्ट ने कहा था कि माफी काफी देर से मांगी गई और यह कानूनी कार्रवाई से बचने की कोशिश जैसी लगती है।
राज्यपाल के फैसले पर भी नजर
कैबिनेट की सिफारिश राज्यपाल के पास पहुंचने के बाद भी मामला खत्म नहीं हुआ है। कानूनी जानकारों के मुताबिक, पहले भी ऐसे मामलों में राज्यपाल कैबिनेट की सिफारिश से अलग फैसला ले चुके हैं। 2003 के एक मामले में भी कैबिनेट ने मंत्री के खिलाफ केस चलाने की मंजूरी नहीं दी थी, लेकिन तत्कालीन राज्यपाल ने इस फैसले को बदलते हुए अभियोजन की अनुमति दे दी थी। बाद में सुप्रीम कोर्ट ने भी माना था कि मंत्रियों के मामलों में कैबिनेट अपने साथी मंत्री के प्रति झुकाव रख सकती है। इसलिए ऐसे मामलों में राज्यपाल का स्वतंत्र निर्णय महत्वपूर्ण हो सकता है।
आज आगे क्या होगा?
अब सुप्रीम कोर्ट में राज्य सरकार को हलफनामा दाखिल कर अपने फैसले और उसके आधार की जानकारी देनी होगी। कोर्ट सरकार के फैसले से संतुष्ट होता है या नहीं, इस पर सबकी नजर रहेगी। अगर कोर्ट को सरकार का फैसला उचित नहीं लगता है, तो वह इसकी न्यायिक समीक्षा कर सकता है और जरूरत पड़ने पर फैसले को पलट भी सकता है।




















