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Peoples Update Special :सत्ता का ‘गृह’ दोष… मप्र में जो गृहमंत्री बना, उसका सियासी ग्राफ क्यों गिरा?

दतिया उपचुनाव के नतीजे सोमवार को आएंगे। इस चुनाव में मप्र के पूर्व गृह मंत्री डॉ. नरोत्तम मिश्रा को पार्टी ने उम्मीदवार नहीं बनाया। उपचुनाव के शुरुआती दौर में यह बड़ा मुद्दा बना। बाद में स्थितियां ठीक हुईं,  लेकिन सिर्फ वे अकेले ही ऐसे नहीं हैं, जिन्होंने गृह मंत्रालय संभालने के बाद सियासी बदलाव का ऐसा रूप देखा। मप्र के कई गृह मंत्री दोबारा सियासत में उस ऊंचाई पर नहीं खड़े हो सके।
मप्र में जो गृहमंत्री बना, उसका सियासी ग्राफ क्यों गिरा?
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डॉ. राजीव अग्निहोत्री, भोपाल। आज दतिया उपचुनाव का परिणाम आने वाला है, जहां पूर्व गृहमंत्री नरोत्तम मिश्रा को इस बार टिकट नहीं मिला। ऐसे में मध्यप्रदेश की राजनीति का अजब संयोग याद आ जाता है। पिछले कई दशकों से जिस नेता को प्रदेश में सीएम के बाद सबसे ताकतवर मानी जाने वाली कुर्सियों में से एक यानी गृह विभाग सौंपा गया, उसके बाद उसका सियासी ग्राफ चढ़ने की बजाय उतरता ही चला गया। किसी की अगले चुनाव में हार हुई, किसी का टिकट कटा, तो कोई सत्ता में रहते हुए भी हाशिए पर चला गया।

सबसे पहले पूर्व गृहमंत्री डॉ. नरोत्तम मिश्रा की ही बात करें। वह अप्रैल 2020 से दिसंबर 2023 तक गृहमंत्री रहे। मिश्रा शिवराज सरकार में नंबर दो की हैसियत रखते थे। एक समय तो मुख्यमंत्री पद के दावेदार तक माने जाने लगे थे। लेकिन 2023 में भाजपा की प्रचंड बहुमत के बावजूद वे दतिया से हार गए। फिर जब उसी दतिया में उपचुनाव हो रहा है, तो पार्टी ने उनकी जगह आशुतोष तिवारी को उम्मीदवार बनाया। टिकट कटने से नाराज समर्थकों ने झांसी हाईवे जाम किया, जिलाध्यक्ष समेत कई पार्षदों ने इस्तीफे दिए। खुद मिश्रा नामांकन के दौरान भावुक होते दिखे। अब उनका राजनीतिक भविष्य अनिश्चित दिख रहा है। आज पार्टी जीती तो यह सीट उनके हाथ से चली जाएगी, हारी तो ठीकरा उनके ऊपर भी फूटेगा।

किसी का टिकट कटा, तो किसी की जमानत हुई जब्त

गृहमंत्री से जुड़ा यह संयोग पहले भी इस पद पर रहे राजनीतिज्ञों के साथ जुड़ा रहा। कुछ को हटाया गया, कुछ का टिकट कटा और कुछ बुरी तरह हार गए। नागेंद्र सिंह, पटवा सरकार में गृहमंत्री रहे शीतला  सहाय, गौरीशंकर शेजवार, वहीं कांग्रेस के समय में गृहमंत्री रहे हजारीलाल रघुवंशी, चन्द्रभान सिंह, चरणदास महंत, भारत सिंह, कैप्टेन जयपाल सिंह, ब्रजकिशोर पटेरिया और नरसिंहराव दीक्षित फिर कभी इस मुकाम पर नहीं पहुंचे। कुछ ने इस पद पर रहते हुए चुनाव लड़ा और पराजय का सामना करना पड़ा। महेंद्र बौद्ध और सत्यदेव कटारे की तो जमानत भी जब्त हुई थी। नंदकुमार पटेल भी अविभाजित मध्यप्रदेश में गृहमंत्री रहे थे, जो छत्तीसगढ़ में नक्सली हमले में शहीद हो गए थे।

बीस साल का सफर...एक जैसी कहानी... 

हिम्मत कोठारी : कभी मंत्री रहे, आज वही पुलिस नहीं सुन रही

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भाजपा शासन में इस संयोग की शुरुआज हिम्मत कोठारी से होती है। शिवराज सिंह चौहान के पहले कायर्काल में वह गृहमंत्री बनाए गए। जो कोठारी 1977 से 2003 तक छह बार विधायक बने थे, वह गृहमंत्री रहने के बाद 2008 का चुनाव रतलाम शहर से हार गए और फिर कभी राजनीति में ऊपर नहीं आ सके। इसी साल मई में कोठारी रतलाम एसपी कार्यालय के बाहर धरने पर बैठे नजर आए। कारण, उनकी शिकायत पुलिस नहीं सुन रही।

उमाशंकर गुप्ता : चढ़ता राजनीतिक ग्राफ भी एकदम नीचे आ गया

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इसके बाद भी यह संयोग लगभग लगातार जारी रहा। कोठारी के बाद भोपाल के उमाशंकर गुप्ता गृहमंत्री बने। इसके पहले महापौर बनने से लेकर उनका राजनीतिक ग्राफ लगातार बढ़ता रहा। हालांकि उनका हश्र एकदम से तो कोठारी जैसा नहीं हुआ। लेकिन गृहमंत्री जैसे पद के बाद 2013 में उन्हें कम महत्व का राजस्व विभाग दे दिया गया। 2018 में वे भोपाल दक्षिण-पश्चिम से कांग्रेस के पीसी शर्मा से चुनाव हार गए। 2023 में पार्टी ने उन्हें टिकट भी नहीं दिया। तब से किसी पद पर नहीं रहे।

बाबूलाल गौर : शुरू में रहे अपवाद पर बाद में इन पर भी असर

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बाबूलाल गौर इस मामले में कुछ हद तक अपवाद रहे। वे पहली बार जब गृहमंत्री बने तो उसके बाद मुख्यमंत्री भी बने। उनका सीएम पद कायर्काल अगस्त 2004 से नवंबर 2005 तक रहा। इसके बाद वे कई विभागों के मंत्री रहे। लेकिन 2013 में जब गृह विभाग उन्हें मिला तो यह संयोग उनके साथ भी जुड़ गया। दस बार के विधायक और दिग्गज गौर को 2016 में उम्र का हवाला देते हुए मंत्री पद से हटा दिया गया। 2018 में उनका टिकट भी काट दिया गया। अगस्त 2019 में उनका निधन हो गया।

भूपेंद्र सिंह : सेकंड सीएम कहलाने वाले भी अब खामोश

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2016 के मंत्रिमंडल में फेरबदल में गौर की जगह गृह विभाग भूपेंद्र सिंह को मिला। उनका कद बढ़ा। वे इस पद पर 2018 तक रहे। शिवराज सरकार में सेकंड सीएम तक कहलाने वाले भूपेंद्र सिंह बाद में जुलाई 2020 से दिसंबर 2023 तक नगरीय विकास और आवास मंत्री रहे। 2023 में वह पुन: चुनाव जीते पर मोहन यादव सरकार में उन्हें मंत्री नहीं बनाया गया। इस कद्दावर नेता की सार्वजनिक मंचों से नाराजगी सुर्खियां बनती रहीं।

यह भी उल्लेखनीय… यह संयोग किसी एक पार्टी तक सीमित नहीं है। कमलनाथ सरकार में गृहमंत्री बने कांग्रेस के बाला बच्चन को यह विभाग महज 15 महीने ही नसीब हुआ। मार्च 2020 में सरकार गिर गई। अगले चुनाव में राजपुर से पुन: चुनाव जीते पर पार्टी के हारने के बाद मंत्री बनने का सवाल ही नहीं उठता।

सत्ता का सबसे जोखिम भरा महकमा

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सबसे दिलचस्प पहलू यह है कि दिसंबर 2023 में मोहन यादव सरकार बनने के बाद से प्रदेश में किसी को अलग से गृहमंत्री बनाया ही नहीं गया है। गृह विभाग मुख्यमंत्री ने अपने पास रखा है। सियासी गलियारों में इसे लेकर चुटकी भी ली जाती है कि जिस कुर्सी पर बैठने वाले हर नेता का ग्राफ गिरा हो, उस पर बैठने की जल्दी भला किसे होगी। राजनीति के जानकार इसे अंधविश्वास नहीं, बल्कि इस विभाग की प्रकृति से जोड़कर देखते हैं। गृहमंत्री का सीधा वास्ता पुलिस, कानून-व्यवस्था, ट्रांसफर-पोस्टिंग और विवादित फैसलों से पड़ता है। हर बड़ी घटना की जवाबदेही उसी के सिर आती है, जिससे जनता और संगठन, दोनों स्तरों पर नाराजगी जमा होती जाती है। यानी यह अपशकुन कम और सत्ता के सबसे जोखिम भरे विभाग की कीमत ज्यादा है। फिर भी संयोगों की यह लगातार कड़ी किसी को भी मजबूर कर देती है। आज 3 अगस्त को दतिया उपचुनाव का नतीजा आएगा। नतीजा जो भी हो, एक सवाल प्रदेश के सियासी गलियारों में तैरता रहेगा कि क्या मध्यप्रदेश में गृहमंत्री की कुर्सी वाकई अपने साथ कोई सियासी ग्रहण लेकर आती है, या यह महज संयोगों की एक लंबी शृंखला है जिसे तोड़ने वाला नेता अभी आना बाकी है।

संयोग ऐसे जिन्हें नजरअंदाज नहीं किया जा सकता

गृह विभाग के बाद क्या हुआ...

हिम्मत कोठारी, भाजपा : 2008 में रतलाम शहर सीट से हारे; फिर कभी विस नहीं लौटे। बाद में राज्य वित्त आयोग के अध्यक्ष बने। हाल में रतलाम एसपी कार्यालय के बाहर धरने पर बैठे।

उमाशंकर गुप्ता, भाजपा : 2013 में विभाग बदला (राजस्व); 2018 में भोपाल दक्षिण-पश्चिम से पीसी शर्मा से हार गए। 2023 में टिकट नहीं; सक्रिय चुनावी राजनीति से बाहर।

बाबूलाल गौर, भाजपा : 2016 में उम्र के हवाले से मंत्रिमंडल से हटाए गए; 2018 में टिकट कटा, सीट बहू कृष्णा गौर को मिली। अगस्त 2019 में निधन।

भूपेंद्र सिंह, भाजपा : 2020 में फिर मंत्री बने। 2023 में जीते पर मंत्री नहीं बनाए गए। कभी सेकंड सीएम कहलाने वाले नेता आज हाशिए पर; बयानों से नाराजगी जताते रहे हैं।

बाला बच्चन, कांग्रेस : 2018 से 2020, 15 महीने में सरकार गिरी; उसके बाद कभी मंत्री नहीं बने। राजपुर से विधायक, पर मंत्री पद दोबारा नसीब नहीं।

डॉ. नरोत्तम मिश्रा, भाजपा : 2020 से दिसंबर 2023, पार्टी को प्रचंड बहुमत पर यह दतिया से हार गए। हालिया उपचुनाव में पार्टी ने टिकट भी नहीं दिया; समर्थकों ने हाईवे जाम किया।

पूर्व गृहमंत्री बोले- बात सही, अब संयोग कहें या राजनीतिक अभिशाप..? 

'हां, यह बात बिल्कुल सही है। इसे महज संयोग कहें या राजनीतिक अभिशाप... लेकिन यह बात कांग्रेस और भाजपा दोनों ही दलों में गृहमंत्री रह चुके नेताओं पर लागू होती है। दोनों दलों की सरकार में ऐसे कई उदाहरण हैं जो गृहमंत्री रहे बाद में चुनाव हार गए। या फिर राजनीतिक उत्थान नहीं हो पाया। इनमें कांग्रेस के भारत सिंह और महेंद्र बौद्ध के नाम हैं। भाजपा की बात करें तो मेरा नाम भी है। उमा शंकर गुप्ता, भूपेंद्र सिंह और नरोत्तम मिश्रा के अलावा भी कुछ और नाम हैं।'

-हिम्मत कोठारी, पूर्व गृहमंत्री एवं वरिष्ठ भाजपा नेता

राजनीति को समझने वालों की नजर में ... आखिर क्या है यह संयोग

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'ऐसा नहीं है। बाबूलाल गौर गृहमंत्री बने और उसके बाद सीएम के पद तक पहुंचे। हालांकि फिर मंत्री रहे। जगदीश देवड़ा गृह राज्य मंत्री रहे, आज डिप्टी सीएम हैं। कुछ नेताओं में हो सकता है लगातार जीतते रहने से अहंकार आ गया हो और वो क्षेत्र से कट गए हों, इसलिए राजनीति में हाशिए पर गए, लेकिन मेरा यह मानना है कि एक ही नेता लगातार आगे रहे तो ऐसे में कार्यकर्ता भी भितरघात कर सकते हैं।'

 -रघुनंदन शर्मा, वरिष्ठ भाजपा नेता एवं पूर्व राज्यसभा सदस्य 

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'गृहमंत्री पद पर रहने के बाद हारने या राजनीतिक कद घटने का गृहमंत्री होने से कोई वास्ता नहीं है। कारण, गृहमंत्री के पास ज्यादा अधिकार नहीं होते। आईपीएस के ट्रांसफर सीएम करते हैं। डीजीपी सहित एडीजी लॉ एंड आर्डर, गुप्त वार्ता सीएम को रिपोर्ट करते हैं। दरअसल लोग अपने कारणों से चुनाव हारते हैं। कई क्षेत्र के लोग से  कट जाते हैं। तो दिक्कत होती है और व्यक्ति हाशिए पर चला जाता है।'

-गिरिजाशंकर, वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक समीक्षक

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'यह संयोग नहीं है। दरअसल इस विभाग की प्रवृत्ति ऐसी है कि शायद पावर का नशा आ जाता है। कई नेता इस पावर को डाइजेस्ट नहीं कर पाते और अपने ही कार्यकर्ताओं और यहां तक कि क्षेत्र से भी कट जाते हैं। इसीलिए ज्यादातर चुनाव हार जाते हैं या कहें राजनीति के हाशिए पर चले जाते हैं। हालांकि कई मामलों में ऐसा देखा गया है कि पार्टी के निर्णय भी उन्हें पीछे धकेल देते हैं।'    

-सुरेश मेहरोत्रा, वरिष्ठ पत्रकार

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By Naresh Bhagoria

नरेश भगोरिया। 27 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय हूं। माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विश्ववि...Read More

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