हाईकोर्ट के इस फैसले से साफ हो गया है कि बिना पुख्ता सबूत के किसी पर अवैध निर्माण का आरोप नहीं लगाया जा सकता। साथ ही यह फैसला आम लोगों को भी राहत देता है कि छोटी-मोटी मरम्मत के लिए बेवजह कार्रवाई नहीं की जा सकती।
बता दें कि यह मामला जबलपुर कैंट के अंग्रेजों के बंगला नंबर 5 से जुड़ा है। एस्टेट ऑफिसर ने साल 2000 में एक व्यक्ति को बेदखल करने का आदेश दिया था, जिसे अब हाईकोर्ट ने खारिज कर दिया है। कोर्ट की डिवीजन बेंच ने एस्टेट ऑफिसर और निचली अदालत दोनों के फैसलों को गलत ठहराया।
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यह मामला बंगला नं. 5 के परिसर में रहने वाले आईडी दवांडे ने दाखिल किया था। आवेदक का कहना था कि उन्होंने अंग्रेज कर्नल हिक्सन के बंगला नं. 5 के परिसर का एक हिस्सा खरीदा था। वहां पर उनके द्वारा किए जा रहे मरम्मत कार्य पर एस्टेट ऑफिसर ने वर्ष 1999 में आपत्ति जताई और फिर याचिकाकर्ता द्वारा दिए गए जवाब के मद्देनजर एस्टेट ऑफिसर ने 12 जुलाई 2000 को बेदखली का आदेश जारी कर दिया। इस आदेश के खिलाफ याचिकाकर्ता ने एक मामला निचली अदालत में दाखिल किया, जिसके 5 मार्च 2002 को खारिज होने पर वर्ष 2002 में यह मामला हाईकोर्ट में दाखिल किया गया था। मामले पर हुई सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता गिरीश श्रीवास्तव व सार्थक श्रीवास्तव ने दलीलें रखीं।
कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि घर की मरम्मत के लिए अनुमति लेने की जरूरत नहीं होती। इजाजत तब जरूरी होती है जब कोई बड़ा बदलाव या नया निर्माण किया जा रहा हो। इस केस में एस्टेट ऑफिसर यह साबित ही नहीं कर पाए कि कोई अवैध निर्माण हो रहा था।
इस मामले को आईडी दवांडे ने कोर्ट में चुनौती दी थी। उन्होंने बताया कि उन्होंने बंगले का हिस्सा खरीदा था और सिर्फ मरम्मत का काम कर रहे थे। कोर्ट ने माना कि उनके खिलाफ की गई कार्रवाई गलत थी और पूरी प्रक्रिया को रद्द कर दिया।