
योगेश सोनी, जबलपुर। प्रदेश की 5 नदियों को आपस में जोड़कर जल गुणवत्ता में सुधार की रणनीति विकसित करने का ठेका पाने वाली ऑस्ट्रेलिया की कंपनी को मप्र हाईकोर्ट से झटका लगा है। जस्टिस विवेक रूसिया और जस्टिस प्रदीप मित्तल की डिवीजन बेंच ने मप्र सरकार को बड़ी राहत देते हुए करीब 40 करोड़ का ऑर्बिट्रेशन अवार्ड को निरस्त कर दिया है।
डिवीजन बेंच ने माना है कि सिर्फ भारत में एक ऑफिस खोल देने से कंपनी की नागरिकता नहीं बदल जाती। चूंकि कंपनी ऑस्ट्रेलिया में रजिस्टर्ड है, इसलिए यह इंटरनेशनल कमर्शियल ऑर्बिट्रेशन का मामला है। ऐसे मामलों में मध्यस्थ की नियुक्ति का अधिकार केवल सुप्रीम कोर्ट को है, न कि हाईकोर्ट को। इस कारण डिवीजन बेंच ने हाईकोर्ट द्वारा की गई ऑर्बिट्रेशन की नियुक्ति को अधिकार क्षेत्र से बाहर मानते हुए पूरी मध्यस्थता की पूरी कार्यवाही को शून्य घोषित कर दिया गया।
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मप्र सरकार के प्रोजेक्ट इम्प्लीमेन्टेशन कोऑर्डिनेशन यूनिट (पीआईसीयू) की ओर से दाखिल इस ऑर्बिट्रेशन अपील में कहा गया था कि सिंध, केन, टोंस, चंबल और बेतवा नदियों को जोड़कर उसके पानी की गुणवत्ता को बढ़ाने के संबंध में वर्ल्ड बैंक का एक प्रोजेक्ट था। वर्ष 2007 में विभाग और ऑस्ट्रेलिया की कंपनी में. एसएमईसी के बीच अनुबंध हुआ था। काम में लापरवाही के आरोप लगाकर विभाग ने कॉन्ट्रैक्ट खत्म किया गया और उसकी बैंक गारंटी जब्त कर ली।
विवाद मध्यस्थता में पहुंचा, जहां 2018 में कंपनी के पक्ष में करीब 8.17 करोड़, विदेशी मुद्रा, ब्याज और 20 लाख लागत (कुल 40 करोड़) देने का अवार्ड पारित किया था। सरकार की अपील पर हुई सुनवाई में उपमहाधिवक्ता अभिजीत अवस्थी ने कहा कि यह अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता का मामला है। कोर्ट ने इसे सही मानते हुए कहा कि पक्षकारों की सहमति से भी अधिकार क्षेत्र की कमी दूर नहीं की जा सकती। बेंच ने वर्ष 2018 का पूरा ऑर्बिट्रेशन अवॉर्ड रद्द करके मप्र सरकार की अपील मंजूर कर ली।
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भोपाल की यूनियन कार्बाइड फैक्ट्री परिसर के जहरीले कचरे को लेकर वर्ष 2004 में दाखिल हुई जनहित याचिका पर गुरुवार को हाईकोर्ट में सुनवाई टल गई। जस्टिस विवेक कुमार सिंह और जस्टिस अजय कुमार निरंकारी की डिवीजन बेंच ने मामले पर सरकार को जवाब पेश करने के लिए समय दिया है। अगली सुनवाई 22 जून को होगी।
गौरतलब है कि यह जनहित याचिका भोपाल के आलोक प्रताप सिंह (अब स्वर्गीय) की ओर से वर्ष 2004 में दाखिल करके यूका फैक्ट्री परिसर में मौजूद जहरीले कचरे के विनष्टीकरण करने के निर्देश दिए जाने की प्रार्थना की गई थी। हाईकोर्ट के सख्त निर्देश पर फैक्ट्री परिसर के जहरीले कचरे को पीथमपुर में जलाकर उसकी राख को जमीन में दबा दिया गया। इस मामले पर सरकार को अगले चरण का ब्यौरा पेश करना है। गुरुवार को सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता खालिद नूर फखरुद्दीन व राज्य सरकार की ओर से अतिरिक्त महाधिवक्ता हरप्रीत रूपराह हाजिर हुए।