
बिलासपुर। 21 साल पुराने मामले में हाई कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के फैसले में आंशिक बदलाव करते हुए छह महीने की सजा खत्म कर दी, लेकिन जुर्माना 500 से बढ़ाकर 2 हजार रुपये कर दिया। इसके साथ ही कोर्ट ने सबूतों की मजबूती को जरूरी बताया।
हाई कोर्ट ने मामले की सुनवाई के दौरान साक्ष्यों की गहन जांच की। कोर्ट को लगा कि ट्रायल कोर्ट ने कुछ महत्वपूर्ण पहलुओं पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया। खासतौर पर जाति प्रमाणपत्र की वैधता को लेकर गंभीर कमी पाई गई। कोर्ट ने कहा कि कानूनी प्रक्रिया में हर दस्तावेज का प्रमाणिक होना जरूरी है। बिना ठोस आधार के सजा देना न्याय नहीं माना जा सकता। इसी कारण छह महीने की सजा को खत्म कर दिया गया। हालांकि अदालत ने जुर्माने की राशि बढ़ाकर दो हजार रुपये कर दी और इसे प्रत्येक याचिकाकर्ता द्वारा जमा करने का निर्देश दिया।
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यह मामला सरकारी जमीन पर दुकान निर्माण को लेकर हुए विवाद से जुड़ा था। शिकायतकर्ता ने आरोप लगाया कि विवाद के दौरान उसे जातिसूचक शब्द कहकर अपमानित किया गया। इसके साथ मारपीट और जान से मारने की धमकी देने की बात भी सामने आई। पुलिस ने आईपीसी की कई धाराओं के तहत मामला दर्ज किया। साथ ही एससी-एसटी एक्ट की धारा 3(1)(आर) भी जोड़ी गई। ट्रायल कोर्ट ने सुनवाई के बाद आरोपियों को दोषी मानते हुए सजा सुनाई थी। बाद में आरोपियों ने इस फैसले को हाई कोर्ट में चुनौती दी।
बचाव पक्ष ने तर्क दिया कि प्रस्तुत जाति प्रमाणपत्र वैध नहीं था। यह केवल तहसीलदार द्वारा जारी अस्थायी दस्तावेज था, जिसे सक्षम प्राधिकारी का प्रमाण नहीं माना जा सकता। कोर्ट ने इस दलील को स्वीकार किया और इसे मामले का अहम बिंदु माना। अदालत ने स्पष्ट कहा कि केवल मौखिक दावे पर्याप्त नहीं होते। किसी भी अपराध को साबित करने के लिए ठोस और विश्वसनीय साक्ष्य जरूरी होते हैं। वैध जाति प्रमाणपत्र ना होने से एससी-एसटी एक्ट की संबंधित धारा लागू नहीं हो सकती।