MP में SIR को लेकर कांग्रेस का बड़ा आंदोलन, सोमवार को चुनाव आयोग कार्यालय घेरेगी; 34.25 लाख नामों का मांगा हिसाब

मध्यप्रदेश में विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR के बाद मतदाता सूची में हुए बदलाव को लेकर कांग्रेस ने आंदोलन का ऐलान किया है। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष जीतू पटवारी ने कहा है कि कांग्रेस सोमवार को मध्यप्रदेश के मुख्य निर्वाचन पदाधिकारी कार्यालय यानी चुनाव आयोग के कार्यालय का घेराव करेगी। उन्होंने कहा कि मतदाता सूची से हटाए गए नामों और निर्वाचन प्रक्रिया से जुड़े सवालों को लेकर पार्टी अपना आंदोलन आगे भी जारी रखेगी। पटवारी ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ कार्रवाई और उनके इस्तीफे की मांग भी दोहराई। उन्होंने कहा कि जब तक इन मांगों पर कार्रवाई नहीं होती, कांग्रेस कार्यकर्ता आंदोलन करते रहेंगे। हालांकि ये कांग्रेस की राजनीतिक मांगें हैं और इन पर चुनाव आयोग की ओर से अलग पक्ष सामने आना बाकी है।
जिला निर्वाचन अधिकारियों के कार्यालयों पर भी आंदोलन
पटवारी ने कहा कि प्रदेश स्तर के आंदोलन के बाद कांग्रेस जिला स्तर पर भी प्रदर्शन करेगी। उन्होंने बताया कि प्रदेशभर में जिला निर्वाचन अधिकारियों के कार्यालयों का घेराव किया जाएगा। उन्होंने कहा कि कलेक्टर ही जिला निर्वाचन अधिकारी की भूमिका में होते हैं इसलिए मतदाता सूची में नाम जुड़ने, हटने और बहाल होने से जुड़े सवालों को जिला स्तर पर भी उठाया जाएगा। कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष ने कहा कि यह मुद्दा केवल किसी राजनीतिक दल तक सीमित नहीं है बल्कि मतदाता सूची में पारदर्शिता और मतदाताओं के अधिकार से जुड़ा हुआ है।
चुनाव आयोग के भीतर आपत्तियों का मुद्दा भी उठाया
पटवारी ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में चुनाव आयोग के भीतर दर्ज की गई कथित लिखित आपत्तियों का भी मुद्दा उठाया। उन्होंने द इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट का हवाला देते हुए कहा कि चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले 10 महीनों में कम से कम 14 बार कुछ फैसलों और प्रक्रियाओं पर लिखित आपत्तियां दर्ज की थीं। रिपोर्ट के अनुसार, इन आपत्तियों का संबंध नए मतदाताओं के पंजीकरण, मतदाता सूची से नाम हटाने और बहाली, Form-6 तथा चुनावी सूचना प्रौद्योगिकी व्यवस्था से जुड़े मामलों से था। पटवारी ने कहा कि कांग्रेस इन दस्तावेजों के आधार पर सवाल उठा रही है और चुनाव आयोग पर अप्रमाणित आरोप लगाने का दावा नहीं कर रही। उन्होंने मांग की कि चुनाव आयुक्तों ने किन फैसलों पर आपत्ति जताई, उनकी आपत्तियों में क्या कहा गया और उन आपत्तियों का निपटारा किस तरह किया गया इसकी जानकारी सार्वजनिक की जाए।
Form-6 में SIR से जुड़े सवाल पर सवाल
कांग्रेस ने नए मतदाताओं के पंजीकरण के लिए इस्तेमाल होने वाले Form-6 में SIR से संबंधित घोषणा जोड़े जाने पर भी सवाल उठाए हैं। द इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, Form-6 के ऑनलाइन संस्करण में आवेदक से यह जानकारी मांगी गई थी कि उसका नाम या उसके माता-पिता अथवा दादा-दादी का नाम पिछली SIR की मतदाता सूची में था या नहीं। रिपोर्ट के मुताबिक, चुनाव आयुक्त विवेक जोशी ने मई में इस बदलाव पर आपत्ति दर्ज की थी और कहा था कि वैधानिक Form-6 में बदलाव के लिए संबंधित नियमों में संशोधन जरूरी होगा। बाद में चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू ने भी इस मुद्दे पर आपत्ति जताई। पटवारी ने मांग की कि यह स्पष्ट किया जाए कि Form-6 में बदलाव किस प्रक्रिया और कानूनी प्रावधान के तहत किया गया।
SIR से पहले MP में 5.74 करोड़ मतदाता थे
मध्यप्रदेश में SIR शुरू होने से पहले 27 अक्टूबर 2025 को मतदाताओं की संख्या 5,74,06,143 थी। SIR के बाद दिसंबर 2025 में जारी प्रारूप मतदाता सूची में 5,31,31,983 मतदाता दर्ज थे। प्रारूप सूची में 42,74,160 नाम कम हुए थे। चुनाव अधिकारियों के मुताबिक इनमें बड़ी संख्या में स्थानांतरित या अनुपस्थित, मृत और दोहराव वाले नाम शामिल थे। पटवारी ने कहा कि प्रारूप सूची में हटाए गए 42.74 लाख नामों को अंतिम रूप से हटाए गए नामों की संख्या नहीं माना जाना चाहिए, क्योंकि इसके बाद दावे और आपत्तियों की प्रक्रिया हुई थी।
अंतिम सूची में 34.25 लाख नाम हटे
21 फरवरी 2026 को जारी अंतिम मतदाता सूची में मध्यप्रदेश में कुल 5,39,81,065 मतदाता दर्ज हुए। चुनाव आयोग के आंकड़ों के अनुसार SIR से पहले की सूची की तुलना में अंतिम सूची में 34,25,078 नाम हटाए गए। वहीं प्रारूप सूची जारी होने के बाद दावे-आपत्तियों की प्रक्रिया के दौरान नए नाम जुड़ने से मतदाताओं की संख्या में 8,49,082 की शुद्ध बढ़ोतरी हुई। पटवारी ने इसी आंकड़े को लेकर सवाल उठाते हुए मांग की कि अंतिम सूची से हटाए गए 34.25 लाख नामों का विधानसभा, जिला और कारणवार पूरा विवरण सार्वजनिक किया जाए। उन्होंने यह भी मांग की कि प्रारूप सूची से बाहर हुए 42.74 लाख नामों में से दावे-आपत्तियों के बाद कितने नाम वापस जोड़े गए, इसकी जानकारी भी जारी की जाए।
नाम जोड़ने और हटाने के आवेदनों का विवरण मांगा
कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष ने दावा किया कि दावे और आपत्तियों की प्रक्रिया के दौरान मध्यप्रदेश में करीब 7.17 लाख नाम जोड़ने के आवेदन और लगभग 83 हजार नाम हटाने से संबंधित आपत्तियां प्राप्त हुईं। पटवारी ने सवाल किया कि नाम जुड़वाने के लिए आए आवेदनों में कितने स्वीकार और कितने खारिज हुए। उन्होंने यह भी पूछा कि यदि किसी पात्र मतदाता का नाम गलती से हट गया था तो उसकी जिम्मेदारी किसकी तय की जाएगी। कांग्रेस ने नाम बहाली से जुड़े आवेदनों की स्वीकृति और अस्वीकृति का कारणवार विवरण सार्वजनिक करने की मांग की है।
ERO और BLO की भूमिका का ऑडिट ट्रेल जारी करने की मांग
पटवारी ने मतदाता सूची तैयार करने वाले डिजिटल तंत्र को लेकर भी जानकारी सार्वजनिक करने की मांग की। उन्होंने कहा कि ERO और BLO की डिजिटल प्रणाली में क्या भूमिका है, किस स्तर पर नाम जोड़े या हटाए जाते हैं और पूरी प्रक्रिया का ऑडिट ट्रेल किस तरह उपलब्ध है, इसकी जानकारी सार्वजनिक होनी चाहिए। द इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट में भी चुनावी मतदाता सूची के डिजिटल तंत्र और ERO स्तर की प्रक्रिया को लेकर चुनाव आयुक्तों की आपत्तियों का उल्लेख किया गया है।
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ज्ञानेश कुमार के खिलाफ कार्रवाई की मांग दोहराई
पटवारी ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे और उनके खिलाफ राजद्रोह का मामला दर्ज करने की मांग दोहराई। उन्होंने कहा कि कांग्रेस इस मांग को लेकर अपना आंदोलन जारी रखेगी। यह मांग कांग्रेस की ओर से की गई है। उपलब्ध रिपोर्टों में चुनाव आयोग के भीतर Form-6, मतदाता पंजीकरण, नाम हटाने और डिजिटल व्यवस्था को लेकर दो चुनाव आयुक्तों की आपत्तियों का उल्लेख है लेकिन पटवारी द्वारा लगाए गए राजनीतिक आरोपों को अलग से कांग्रेस का पक्ष मानकर देखा जाना चाहिए।
CWC बैठक में देशव्यापी आंदोलन की रणनीति
पटवारी ने कहा कि तीन दिन बाद कांग्रेस कार्यसमिति यानी CWC की बैठक होगी। इसमें पूरे देश में आंदोलन और कार्यक्रमों की रणनीति पर चर्चा की जाएगी। उन्होंने कहा कि मध्यप्रदेश में चुनाव आयोग कार्यालय के घेराव के बाद जिला स्तर पर भी आंदोलन किया जाएगा और मतदाता सूची से जुड़े सवालों को लेकर कांग्रेस अपनी मांग उठाती रहेगी।
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चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति प्रक्रिया पर भी निशाना
पटवारी ने केंद्र सरकार पर चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति प्रक्रिया में बदलाव करने का आरोप भी लगाया। उन्होंने कहा कि पहले चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति से जुड़ी चयन प्रक्रिया में सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश की भूमिका थी, जिसे बाद में बदला गया और केंद्रीय गृहमंत्री को चयन समिति में शामिल किया गया।




















