इंटरनेशनल डे ऑफ क्लीन एयर  7 साल, 7 शहर, 743 करोड़ खर्च...आंकड़े सुधरे, हवा नहीं, कागजों में साफ हवा…सड़कों पर धूल धुआं

मध्य प्रदेश के सात शहरों में राष्ट्रीय स्वच्छ वायु कार्यक्रम के तहत 2019 से अब तक 743.84 करोड़ रुपये खर्च होने के बावजूद कई शहरों में पीएम10 का स्तर बढ़ा है। भोपाल, इंदौर, ग्वालियर और देवास में प्रदूषणकारी कणों में वृद्धि के आंकड़ों ने हवा की गुणवत्ता सुधारने के सरकारी दावों पर हकीकत पेश की है। इंटरनेशनल डे ऑफ क्लीन एयर ऑफ ब्लू स्काई के मौके पर पढ़िए पीपुल्स समाचार टीम की खास रिपोर्ट।
  7 साल, 7 शहर, 743 करोड़ खर्च...आंकड़े सुधरे, हवा नहीं, कागजों में साफ हवा…सड़कों पर धूल धुआं
तस्वीर भोपाल के अयोध्या बायपास रोड की है। पहली तस्वीर 2 सितंबर 2026 को दोपहर 4:34 बजे की है। दूसरी तस्वीर 12 दिसंबर 2025 को दोपहर 3 :05 बजे की है।

पीपुल्स टीम, भोपाल साफ हवा का संदेश देने वाले इंटरनेशनल डे ऑफ क्लीन एयर ऑफ ब्लू स्काई के मौके पर मध्य प्रदेश में हवा की गुणवत्ता सुधारने के दावों पर सवाल खड़े हो रहे हैं। राष्ट्रीय स्वच्छ वायु कार्यक्रम (NCAP) के तहत प्रदेश के सात शहरों में 20019 से अब तक 743.84 करोड़ रुपये खर्च किए जा चुके हैं, लेकिन केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के आंकड़े ही बताते हैं कि 2017-18 से 2023-24 के बीच भोपाल में पीएम 10 की मात्रा 112 से बढ़कर 113 माइक्रोग्राम हो गया। इंदौर में पीएम10 82 से बढ़कर 99, ग्वालियर में 126 से 136 और देवास में 83 से 99 माइक्रोग्राम प्रति घनमीटर हो गया। हालांकि इसी दौरान शहरों में औसत एक्यूआई भी मामूली सुधार हुआ है। यानी करोड़ों रुपए खर्च करने के बावजूद इन शहरों की हवा में प्रदूषणकारी कण कम होने के बजाय और बढ़े। इस दौरान अस्पतालों की सांस संबंधी ओपीडी में प्रदूषण से जुड़ी समस्याओं वाले मरीजों की संख्या भी करीब डेढ़ गुना तक बढ़ी है। आज भोपाल, जबलपुर, इंदौर को वायु गुणवत्ता सुधार के लिए सम्मान मिलेगा, पर हकीकत जानने पढ़िए शहरों के वायु प्रदूषण की ग्राउंड रिपोर्ट…

सबसे पहले तीन ग्राफ से समझें प्रदूषण, पैमाना और खर्च

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कब शुरू हुआ NCAP

भारत सरकार ने वायु प्रदूषण को नियंत्रित करने के लिए साल 2019 में राष्ट्रीय स्वच्छ वायु कार्यक्रम (NCAP) शुरू किया था। इसका उद्देश्य साल 2026 तक शहरों के AQI स्तर को कम करना है। इसके तहत हर साल केंद्र सरकार की ओर से राशि जारी की जाती है। जिससे शहर की सडकों के गड्ढे भरना, सडकों से धूल साफ करना, चौक-चौराहों पर फाउंटेन लगाना, ज्यादा प्रदूषण वाले इलाकों में पानी का छिड़काव करना जैसे काम होते हैं।

हवा का हिसाब: डेडलाइन निकल गई, जवाब बाकी है 

मध्यप्रदेश के सात बड़े शहर अब भी 'दमघोंटू' सूची में हैं

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 रुचि विजयवर्गीय, डायरेक्टर, पीपुल्स समूह

समयसीमा खत्म हो चुकी है। राष्ट्रीय स्वच्छ वायु कार्यक्रम ने 2019 में वादा किया था कि 2025-26 तक शहरों की हवा में पीएम10 का स्तर 40 प्रतिशत तक घटेगा या राष्ट्रीय मानक, 60 माइक्रोग्राम प्रति घनमीटर, हासिल होगा। नतीजा 10 अगस्त को संसद में रखे सरकारी आंकड़ों में सामने आया, मध्यप्रदेश के सातों एनकैप शहर, भोपाल, इंदौर, ग्वालियर, जबलपुर, उज्जैन, देवास और सागर, लगातार तीन साल से तय सीमा से ऊपर हैं।

  सवाल पैसे का नहीं है। एनकैप डैशबोर्ड के अनुसार फरवरी 2026 तक अकेले भोपाल को 242 करोड़ रुपये से अधिक मिले, जिनमें से करीब 196 करोड़ खर्च भी हो चुके हैं। फिर भी शहर का औसत पीएम10 बीते वर्षों में 110 से 140 माइक्रोग्राम के बीच रहा, यानी राष्ट्रीय मानक का लगभग दोगुना और विश्व स्वास्थ्य संगठन की अनुशंसा का कई गुना। इसीलिए राष्ट्रीय हरित अधिकरण ने इस साल कलेक्टर और निगमायुक्त से सीधा सवाल पूछा, यह पैसा गया कहां?

 इससे भी अधिक चिंताजनक एक और तथ्य है। प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने अप्रैल में अधिकरण को बताया कि स्रोतों की पहचान करने वाला अध्ययन अब तक केवल भोपाल और ग्वालियर में पूरा हुआ है, बाकी शहरों में या तो मसौदा अटका है या काम चल रहा है। यानी कार्यक्रम शुरू होने के सात साल बाद भी यह तय नहीं कि किस शहर की हवा कौन बिगाड़ रहा है, और बिना निदान के इलाज पर करोड़ों खर्च होते रहे।

विरोधाभास देखिए, देश का सबसे स्वच्छ शहर कहलाने वाला इंदौर भी 1 नवंबर 2024 को, दिवाली के अगले दिन, 404 के एक्यूआई के साथ 'गंभीर' श्रेणी छू चुका है। साफ सड़कें और साफ हवा एक ही चीज नहीं हैं।

स्वच्छ वायु दिवस पर समारोह नहीं, सफाई चाहिए। हर शहर सार्वजनिक रूप से बताए कि बेसलाइन से हवा कितनी सुधरी और आने वाली सर्दी के लिए आपात योजना कहां है। हवा सबकी है। फिर हिसाब सिर्फ अदालत क्यों मांगे?

मप्र के सात शहरों से पीपुल्स समाचार की ग्राउंड रिपोर्ट

भोपाल : 195 करोड़ खर्च, सुधार न के बराबर

भोपाल की हवा साफ करने के लिए सात साल में केंद्र ने 242.56 करोड़ रुपए निगम को दिए। इसमें से 195.01 करोड़ रुपए खर्च भी हो गए। लेकिन नतीजा शून्य रहा। साल 2017-18 में शहर का पीएम-10 स्तर 112 था, जो 2025 में 110 है।  डीआईजी बंगला में पीएम 10 का यह आंकड़ा सबसे ज्यादा मिलने के बाद हमने इसी इलाके की हकीकत सड़क पर जाकर देखने की कोशिश की। सिंधी कॉलोनी से बैरसिया रोड होते हुए काजीकैंप, डीआईजी बंगला और फिर आरिफ नगर आरओबी तक पहुंचे। जो तस्वीर सामने आई, उसमें सड़क कम और धूल ज्यादा नजर आई। सिंधी कॉलोनी से आगे बढ़ते ही बैरसिया रोड की हालत बदल जाती है। मेट्रो निर्माण के कारण सड़क का बड़ा हिस्सा खुदाई और निर्माण क्षेत्र में चला गया है। सड़क के बीचोंबीच मेट्रो का काम चल रहा है और खुदाई से निकली मिट्टी जगह-जगह जमा है।  काजीकैंप में दोपहिया वाहन चालक सबसे ज्यादा प्रभावित नजर आते हैं।  एआरएआई की स्टडी में पीएम 10 सबसे ज्यादा 225 यही मिला था, वहां सड़क की धूल को रोकने के इंतजाम आखिर कितने प्रभावी हैं।  यहां समस्या सिर्फ वाहनों के धुएं की नहीं दिखती। सड़क की धूल खुद हवा में घुलती दिखाई देती है।

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जबलपुर, महाराजपुर : ट्रांसपोर्ट नगर

जबलपुर के महाराजपुर में लगातार जारी निर्माण कार्य के अलावा प्रदूषण फैलने की सबसे बड़ी वजह यहां स्थित ट्रांसपोर्ट नगर है। यहां करीब एक हजार से अधिक ट्रकों की आवाजाही सुबह से लेकर रात तक होती है। यहां पर मुख्य बायपास भी है जहां वाहनों से उड़ती धूल पर्यावरण के लिए  खतरा बनी हुई है। पीपुल्स टीम यहां पहुंची तो ट्रकों के साइलेंसर से निकलता धुआं और सड़क  किनारे  जमा कीचड़ से हालात बदतर दिखे।  शहर में 4 स्थलों पर प्रदूषण मापी संयंत्र लगाया हुआ है जो कि महाराजपुर में भी है। यहां पर अब समय के साथ कई छोटे-छोटे उद्योग स्थापित हो चुके हैं जो निर्माण कार्य के दौरान चिमनियों से धुआं फेंकते हैं। इसके अलावा इनका वेस्ट वाटर भी जल प्रदूषण में सहायक होता है। इसके अलावा महाराजपुर बायपास के आसपास बड़ी संख्या में मोटर मैकेनिकों का भी जमावड़ा हो गया है जो फुटपाथ किनारे अपनी दुकानें सजाए रहते हैं। इनके द्वारा भी वाहन मरम्मत के दौरान वाहन धुलाई और साइलेंसर की जलाकर सफाई करने से प्रदूषण फैलता है।

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इंदौर, विजयनगर चौराहा: वाहनों की भीड़ से बढ़ रहा प्रदूषण

समय : दोपहर 12 बजे

वायु प्रदूषण के हॉटस्पॉट क्षेत्रों में विजयनगर चौराहा भी प्रमुख स्थान है। दोपहर 12 बजे यहां वाहनों की आवाजाही लगातार बनी रहती है। पलासिया की ओर से आने वाले जिन वाहन चालकों को उज्जैन रोड, बायपास या देवास नाका की ओर जाना होता है, उनके लिए यह सबसे आसान और सीधा मार्ग है। यही वजह है कि चौराहे पर दिनभर वाहनों का दबाव रहता है। विजयनगर क्षेत्र में बड़ी संख्या में व्यावसायिक प्रतिष्ठान और कार्यालय भी हैं। इनमें हजारों कर्मचारी काम करते हैं, जिनमें बड़ी संख्या में लोग निजी कार और दोपहिया वाहनों से कार्यालय पहुंचते हैं। कार्यालयीन समय में इन वाहनों की संख्या और बढ़ जाती है। चौराहे पर लगातार चलते वाहनों से निकलने वाला धुआं यहां के प्रदूषण को बढ़ाने वाले प्रमुख कारणों में शामिल हैं। दोपहर के समय भी यातायात का दबाव कम नहीं होने से प्रदूषण का असर साफ महसूस किया जा सकता है।

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देवास- हॉट स्पॉट : भोपाल चौराहा, ट्रैफिक का दबाव, धूल भी चुनौती

समय : दोपहर 1.30 बजे

देवास का भोपाल चौराहा शहर के प्रमुख वायु प्रदूषण हॉटस्पॉट में शामिल है। यहां दिनभर वाहनों का भारी दबाव रहता है। भोपाल, इंदौर और उज्जैन की ओर जाने वाले वाहनों की आवाजाही इसी मार्ग से होने के कारण चौराहे पर लगातार यातायात बना रहता है। इसके साथ ही आसपास की व्यावसायिक गतिविधियां और सड़कों से उड़ने वाली धूल प्रदूषण की स्थिति को और गंभीर बनाती हैं। प्रदूषण और धूल को नियंत्रित करने के लिए नगर निगम ने यहां कबाड़ से तैयार करीब 20 फीट ऊंचे विशेष ‘मिस्ट फाउंटेन टावर’ लगाए हैं। इनका उद्देश्य हवा में मौजूद धूल के कणों को नियंत्रित करना है। हालांकि, वाहनों की लगातार आवाजाही और सड़क पर उड़ती धूल के कारण चौराहे पर प्रदूषण का दबाव बना रहता है। दोपहर 1.30 बजे भी यहां यातायात की आवाजाही तेज नजर आती है। व्यावसायिक गतिविधियों के साथ गुजरने वाले भारी और निजी वाहनों की संख्या इस क्षेत्र को प्रदूषण की दृष्टि से संवेदनशील बनाती है।

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सागर- हॉट स्पॉट : दीनदयाल नगर, मकरोनिया और सदर क्षेत्र 

सागर शहर में बढ़ते ट्रैफिक, निर्माण गतिविधियों और व्यावसायिक विस्तार के कारण कुछ इलाके वायु प्रदूषण के हॉट स्पॉट के रूप में चिन्हित किए गए हैं। पर्यावरण विशेषज्ञों के अनुसार इन क्षेत्रों में पार्टिकुलेट मैटर (PM10 और PM2.5) का स्तर अन्य क्षेत्रों की तुलना में अधिक दर्ज किया जाता है, जिससे स्थानीय लोगों के स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है। दीनदयाल नगर को शहर का प्रमुख प्रदूषण हॉट स्पॉट माना जा रहा है। यहां लगातार चल रहे निर्माण कार्यों, सड़कों पर उड़ने वाली धूल तथा घरेलू कचरे और ईंधन जलाने जैसी गतिविधियों के कारण प्रदूषण का स्तर बढ़ा हुआ रहता है। वहीं मकरोनिया क्षेत्र, जो शहर का प्रमुख व्यावसायिक एवं परिवहन केंद्र है, वाहनों की भारी आवाजाही और ट्रैफिक जाम के कारण प्रदूषण की समस्या से जूझ रहा है। यहां निकलने वाला धुआं वायु गुणवत्ता को प्रभावित कर रहा है। सदर बाजार और रविदास वार्ड जैसे घनी आबादी वाले क्षेत्रों में संकरी सड़कों, भीड़भाड़ और वाहनों की धीमी गति से आवाजाही के कारण प्रदूषक तत्व वातावरण में अधिक समय तक  बना रहता है।

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उज्जैन- हॉटस्पॉट : चामुंडा माता मंदिर चौराहा

समय: दोपहर 12.30 बजे

प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड द्वारा उज्जैन शहर में चिन्हित हॉटस्पॉट में से एक स्थान चामुंडा माता मंदिर चौराहा है, जहाँ हवा सबसे ज्यादा प्रदूषित रहती है। परिवहन के नजरिए से यह शहर का मेन जंक्शन है। चौराहे से कुछ ही मीटर दूर बस स्टैंड और रेलवे स्टेशन हैं। बस स्टैंड से दिनभर में इस चौराहा से डीजल संचालित 550 से अधिक बसों का आवागमन आगर,मक्सी, रतलाम की और होता है, शहरों से आकर उज्जैन होते हुए इंदौर और देवास के लिए बसें चलती है। बस स्टैंड और रेलवे स्टेशन होने से बडी संख्या में लोक परिवहन ऑटो रिक्शा, मैजिक स्वाभाविक तौर पर यहीं आते है। सवारी उतारने और बैठाने के दौरान वाहनों के चालू रखें जाने से इनके धुएं के कारण प्रदूषण बना ही रहता है। पुराने और नए शहर को मिलाने वाले इस चौराहे पर यातायात का दबाव ज्यादा रहता है। रही सही कसर ट्रैफिक सिग्नल पर चालू वाहनों का धुआं पूरी कर देता है। वर्तमान में इस हॉटस्पॉट पर प्रदूषण का एक और बडा कारण निर्माण कार्यों का होना है। यहाँ और आसपास मेडिसिटी, फ्रीगंज समांतर ओवर ब्रिज और एलिवेटेड ब्रिज का काम चल रहा है। इसके लिए कई बडे पेड़ों की कटाई तो हुई है, निर्माण स्थलों को कवर नहीं किया गया है। पानी का छिड़काव भी नहीं होता है। इससे उडने वाले धूल के गुबार,धुएं के साथ मिलकर प्रदूषण को बढा रहे है। चौराहे और इसके दायरे में आने वाले क्षेत्रों की होटल, रेस्टोरेंट, छोटे फूड यूनिट्स में एलपीजी , लकड़ी और बायोमास जलाने से भी वायु प्रदूषण हो रहा है।

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ग्वालियर- हॉट स्पॉट : तेंदुलकर मार्ग पर धूल का गुबार

ग्वालियर के सचिन तेंदुलकर मार्ग पर स्मार्ट सिटी कंपनी द्वारा 3.50 किमी सड़क निर्माण का आधा-अधूरा काम राहगीरों व रहवासियों के लिए जी का जंजाल बन गया है। हालत यह है कि सड़क से डामर की परत हटाने के बाद दिन-रात दोपहिया व चार पहिया वाहन चलने से धूल के गुबार उड़ रहे हैं। हवा के साथ उड़ने वाली धूल घरों में परतों के रूप में जमा दिख रही है, तो सांस की बीमारियों से पीड़ित लोग परेशान देखे जा रहे हैं, लेकिन इसके बाद भी सड़क के दूसरे हिस्से में निर्माण कार्य में तेजी नहीं लाई जा रही है।

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 रिपोर्टों में शहर

 भोपाल : एआरएआई, पुणे की स्टडी

ऑटोमोटिव रिसर्च एसोसिएशन ऑफ इंडिया (एआरएआई), पुणे की स्टडी में सामने आ चुकी है। शहर के पांच स्थानों पर किए गए अध्ययन में पीएम 2.5 सबसे कम भौंरी में 25 और सबसे अधिक एमपी नगर में 75 मिला था। वहीं पीएम 10 भौंरी में 77 और डीआईजी बंगला क्षेत्र में 225 तक पहुंचा था। एआरएआई ने इन स्थानों को शहर के अलग-अलग भू-उपयोग और ट्रैफिक स्थितियों को प्रतिनिधित्व करने के लिए चुना था।

NGT : राजधानी में वायु प्रदूषण रोकने के सरकारी दावों पर नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) ने हाल ही में सिटीजन फोरम की याचिका पर सुनवाई करते हुए नगर निगम और प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को कड़ी फटकार लगाई। एनकेप के तहत करोड़ों रुपए खर्च होने के बावजूद शहर की हवा में सुधार नहीं दिखने पर एनजीटी ने दोनों एजेंसियों को ह्यपेपर टाइगरह्ण यानी कागजी शेर तक कह दिया। सुनवाई में सामने आया कि निगम ने एनकेप की राशि से वर्टिकल गार्डन, सड़क सौंदर्यीकरण सहित कई काम कराए हैं। इस पर एनजीटी ने दो टूक कहा था कि सिर्फ दीवारों पर पौधे लगाने से शहर की हवा साफ नहीं होगी। एनजीटी ने सवाल किया कि इन कामों का वायु प्रदूषण कम करने से सीधा संबंध क्या है? इनसे प्रदूषण कितना घटा और इसका वैज्ञानिक आधार क्या है?

जबलपुर : NGT 

नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) ने जबलपुर सहित मध्य प्रदेश के अधिक प्रदूषण वाले (नॉन-अटेनमेंट) शहरों में वायु गुणवत्ता (एक्यूआई) में सुधार लाने के लिए सख्त निर्देश जारी किए हैं। एनजीटी के मुख्य निर्देशों में जीआरएपी (ग्रैप) लागू करना है। एनजीटी ने राज्य शासन को दिल्ली की तर्ज पर एक व्यापक 'ग्रेडेड रिस्पांस एक्शन प्लान' (जीआरपी) तैयार करने का निर्देश दिया है, जिससे वायु प्रदूषण के स्तर को नियंत्रित किया जा सके। शहर और जिले के स्तर पर वायु प्रदूषण के प्रमुख स्रोतों (जैसे धूल, वाहन, निर्माण कार्य और कचरा जलाना) की पहचान कर उनकी रिपोर्ट तैयार करने को कहा गया है। प्रदूषण नियंत्रण के लिए अलग-अलग विभागों और अधिकारियों की स्पष्ट जिम्मेदारी तय करने और समय-सीमा के भीतर कार्रवाई करने कहा गया है। पूर्व में खराब एयर क्वालिटी इंडेक्स पर दीपावली या अन्य अवसरों पर पटाखों के उपयोग पर रोक और निगरानी के आदेश दिए गए हैं। प्रदूषण के स्तर (एक्यूआई) को नियंत्रित रखने के लिए स्थानीय प्रशासन और मध्य प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को निरंतर मॉनिटरिंग करने के सख्त निर्देश दिए गए हैं।

आगे की प्लानिंग : एमपीपीसीबी की नॉन-अटेनमेंट सिटी एक्शन प्लान

एमपीपीसीबी ने प्रदेश के नॉन-अटेनमेंट शहरों के लिए वायु प्रदूषण नियंत्रण की कार्ययोजना तैयार की है। इसमें पीएम 10 और पीएम 2.5 को नियंत्रित करना मुख्य लक्ष्य है। भोपाल समेत इन शहरों में प्रदूषण के स्रोतों की पहचान कर सड़क की धूल, वाहनों और अन्य उत्सर्जन पर नियंत्रण के उपाय तय किए गए हैं। एमपीपीसीबी  की वेबसाइट पर इस योजना के साथ जनवरी-मार्च 2024 की तिमाही रिपोर्ट भी दर्ज है, जिससे कार्रवाई की प्रगति की निगरानी की जाती है

सबसे कम वायु प्रदूषण वाले दस देश 

  • फ्रेंच पोलिनेशिया 
  • मॉरिशस
  • आइसलैंड
  • ग्रेनाडा
  • बरमूडा
  • न्यूजीलैंड
  • ऑस्ट्रेलिया
  • प्यूर्टो रिको
  • एस्टोनिया
  • फिनलैंड 

दुनिया के दस सबसे प्रदूषित देश 

  • पाकिस्तान
  • बांग्लादेश
  • ताजिकिस्तान
  • चाड
  • डेमोक्रेटिक रिपब्लिक ऑफ द कांगो
  • भारत
  • कुवैत
  • युगांडा
  • मिस्र
  • उज्बेकिस्तान
    (स्रोत: आईक्यूएयर 2025)

भारत की स्थिति : पीएम2.5 का स्तर

भारत में बारीक कणों (पीएम2.5) की औसत मात्रा 48.9 मइक्रोग्राम/क्यूबिकमीटर तक पहुंच गई। यह डब्ल्यूएचओ द्वारा तय की गई 5 मइक्रोग्राम/क्यूबिकमीटर की सुरक्षित सीमा से लगभग दस गुना ज्यादा है। (source iqair)

इतने प्रदूषण के कारण

  • इंडस्ट्रियल एमिशन-हवा में मौजूद पार्टिकुलेट प्रदूषण में लगभग 51% हिस्सा फैक्ट्रियों और इंडस्ट्रियल प्लांट का होता है। 
  • गाड़ियों से निकलने वाला धुआं- शहरी इलाकों में हवा के प्रदूषण में कारों, ट्रकों और दो-पहिया वाहनों का योगदान लगभग 27% है।
  • फसल के अवशेष जलाना- उत्तरी कृषि क्षेत्रों में मौसम के हिसाब से फसल के अवशेष (पराली) जलाने से प्रदूषण में 17% और बढ़ोतरी होती है।
  • अन्य स्रोत-कोयले से चलने वाले पावर प्लांट, खुले में कचरा जलाना, निर्माण कार्य से उड़ने वाली धूल और खाना पकाने के लिए पारंपरिक बायोमास ईंधन इस संकट को और गंभीर बनाते हैं।

जनप्रतिनिधि, डॉक्टर और पर्यावरणविद बोले- आत्म मंथन की जरूरत, खर्च की समीक्षा हो

प्रदूषण रोकने के हरसंभव प्रयास

शहर में होने वाला प्रदूषण रोकने के हर संभव प्रयास किए जा रहे हैं,  चूंकि पर्यावरण और प्रदूषण जनता से जुड़े हुए मामले हैं इसलिए इसे बेहतर करने के लिए हम हमेशा प्रतिबद्ध हैं, शहर में विकास लगातार जारी है और हमारी सरकार इस पर भी ध्यान देती है कि यदि पर्यावरण बेहतर करने के लिए पौधा रोपण करने की आवश्यकता है तो वह भी बड़े पैमाने पर किया जा रहा है। साथ ही एयर क्वालिटी इंडेक्स भी सुधार के लिए कार्य किया जा रहे हैं।

तुलसी सिलावट, जल संसाधन, मंत्री मध्यप्रदेश शासन 

परिणाम जमीन पर दिखना चाहिए

भोपाल की वायु गुणवत्ता को लेकर गंभीरता से आत्ममंथन की जरूरत है। प्रदूषण नियंत्रण के लिए केंद्र और राज्य सरकार से राशि मिलने के बावजूद यदि हवा की गुणवत्ता में अपेक्षित सुधार नहीं हो रहा है, तो खर्च की समीक्षा जरूरी है। नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल द्वारा भी राशि के उपयोग पर सवाल उठाए गए हैं। उन्होंने कहा कि धूल, निर्माण कार्य, सड़कों की स्थिति, यातायात और खुले में कचरा जलाने जैसी समस्याओं पर स्रोत आधारित और परिणाम आधारित कार्रवाई हो। जनता के पैसे का उपयोग स्वच्छ हवा उपलब्ध कराने में प्रभावी रूप से हो, यही प्राथमिकता होनी चाहिए।

आलोक शर्मा, सांसद, भोपाल

लगातार प्रयासों की जरूरत

शहर में वायु प्रदूषण की दिशा में किए जा रहे कामों में और सुधार लाने की जरूरत है। यदि वायु गुणवत्ता पूरी तरह से काबू में है तो वेरी पुअर की श्रेणी में क्यों क्षेत्र आ रहे हैं। एक्यूआई में सुधार के लिए केन्द्र से मिली अरबों की राशि का सदुपयोग होना चाहिए,जिसमें कमी नजर आ रही है।

विवेक कृष्ण तन्खा,सांसद राज्यसभा

केंद्र और राज्य की राशि से लगातार काम

ग्वालियर की वायु गुणवत्ता सुधार के लिए केन्द्रीय व राज्य सरकारों की राशि से लगातार काम हुए हैं और अब ठोस प्रयासों के सुखद परिणाम भी सामने आने शुरू होंगे।

भारत सिंह कुशवाह, सांसद ग्वालियर

दो बार पुरस्कार मिलना जबलपुर की उपलब्धि

नगर निगम ने वायु प्रदूषण की दिशा में उल्लेखनीय उपलब्धि हासिल की है जिससे समझ में आता है कि शहर की वायु गुणवत्ता में सुधार आया है। देश में दूसरे नंबर का सम्मान 2024 व 2025 में प्राप्त कर अतिरिक्त राशि भी मिली है। निस्संदेह एक्यूआई की दिशा में अच्छा काम हुआ है।

सुमित्रा वाल्मीकि, सांसद राज्यसभा

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प्रदेश में सबसे अच्छी वायु गुणवत्ता शहर की

प्रदेश में जबलपुर की वायु गुणवत्ता सबसे अच्छी है ऐसा रिकॉर्ड कहता है। इस दिशा में नगर निगम ने काफी काम किया है। जहां कमियां हैं उन्हें पूरा करने का भी प्रयास हो रहा है। शहर में 4 स्थानों पर प्रदूषण मापी संयंत्र ऐसी जगहों पर लगे हैं जहां सबसे अधिक प्रदूषण होता है जिससे  वास्तविक स्थिति पता होती है।

डॉ.अभिलाष पाण्डेय, विधायक उत्तर-मध्य क्षेत्र

पौधारोपण अभियान से शहर को हरा-भरा करे

शहर को प्रदूषणमुक्त और स्वस्थ बनाने के लिए बड़े पैमाने पर पौधारोपण अभियान चलाया जाना चाहिए। इसके अंतर्गत पीपल, नीम और बरगद जैसे अधिक आॅक्सीजन देने वाले पेड़ लगाए जाएं। शहर के प्रत्येक वार्ड में खाली स्थानों को चिन्हित कर ग्रीन बेल्ट विकसित की जाए। सड़कों के किनारे, पार्कों और सार्वजनिक स्थलों पर पौधे लगाकर उनकी नियमित देखभाल की व्यवस्था भी हो। नागरिकों, विद्यार्थियों और सामाजिक संस्थाओं को अभियान से जोड़ा जाए। अधिक पेड़ लगाने से वायु प्रदूषण कम होगा, तापमान नियंत्रित रहेगा और शहर का वातावरण स्वच्छ एवं सुंदर बनेगा। पेड़ लगाएं, जीवन बचाएं।

प्रवीण पाठक, पूर्व विधायक ग्वालियर

प्रदूषण रोकने निरंतर काम हो रहा

भोपाल की वायु गुणवत्ता में सुधार के लिए निगम लगातार काम कर रहा है। सड़कों पर जमा मिट्टी और निर्माण कार्यों के कारण धूल की समस्या कुछ क्षेत्रों में बढ़ती है, इसे नियंत्रित करने के लिए संबंधित अमले को आवश्यक कार्रवाई के निर्देश दिए गए हैं। हमारा फोकस सिर्फ सफाई तक सीमित नहीं है, बल्कि ऐसे स्थानों पर स्थायी समाधान करने पर है, जहां बार-बार धूल की समस्या सामने आती है। नागरिकों को स्वच्छ और बेहतर वातावरण देना निगम की जिम्मेदारी है।
मालती राय, महापौर भोपाल

ग्वालियर स्वस्थ हवा, बेहतर भविष्य के लिए जनभागीदारी जरूरी

स्वच्छ और स्वस्थ ग्वालियर के लिए वायु गुणवत्ता का ध्यान रखना हम सभी की जिम्मेदारी है। बढ़ता एक्यूआई हमारे स्वास्थ्य और पर्यावरण के लिए चिंता का विषय है। नागरिक अनावश्यक वाहन चलाने से बचें, सार्वजनिक परिवहन का उपयोग करें और खुले में कचरा व अन्य सामग्री जलाने से पूरी तरह परहेज करें। अधिक से अधिक पौधे लगाएं और हरित क्षेत्र बढ़ाने में सहयोग दें।

शोभा सिकरवार, महापौर, ग्वालियर

इंदौर में ‘नो कार डे’ जैसी पहल

शहर में वायु गुणवत्ता सुधार के लिए नगर निगम ने ट्रैफिक सिग्नलों पर वाहन बंद रखने की अपील, ‘नो कार डे’ जैसी पहल की, मैं सप्ताह में एक दिन शुक्रवार को नो कार डे मना रहा हूं, इस दिन दो पहिया ईवी वाहन से यात्रा पूरी करता हूं। नागरिकों को सार्वजनिक परिवहन, साइकिल तथा ई-वाहनों के उपयोग के लिए प्रेरित करने जैसे प्रयास किए जा रहे हैं। साथ ही कचरा और बायोमास जलाने पर नियंत्रण, सड़क की धूल कम करने तथा शहर में हरित क्षेत्र बढ़ाने पर भी जोर दिया जा रहा है।

पुष्यमित्र भार्गव, महापौर इंदौर

जबलपुर में चौतरफा हो रहे हैं एक्यूआई के काम

हमने देश में दूसरे नंबर का पुरस्कार लगातार 2 साल लिया है और इस साल भी हमें पूरी संभावना है कि जबलपुर वायु गुणवत्ता में अव्वल आएगा। एक्यूआई से प्राप्त फंड का उपयोग त्रिस्तरीय किया जाता है जिसमें लोक निर्माण कार्य,उद्यानिक कार्य तथा वर्कशाप के तहत किए जाने वाले काम हैं।

जगत बहादुर सिंह अन्नू, महापौर, जबलपुर

वाटर स्प्रिंकलिंग सिस्टम का उपयोग हो

वायु प्रदूषण और धूल की समस्या को कम करने के लिए मुख्य सड़कों तथा धूल भरे क्षेत्रों में नियमित रूप से पानी का छिड़काव किया जाना चाहिए। इसके लिए वाटर स्प्रिंकलिंग सिस्टम का प्रभावी उपयोग किया जा सकता है। पानी के छिड़काव से सड़क पर जमा धूल के कण हवा में उड़ने से रुकेंगे और वातावरण में प्रदूषण का स्तर कम होगा। विशेष रूप से निर्माण स्थलों, व्यस्त चौराहों और कच्ची सड़कों के आसपास नियमित छिड़काव जरूरी है। प्रशासन को इसके लिए निश्चित समय-सारणी बनाकर निगरानी करनी चाहिए। साथ ही, पानी की बबार्दी रोकने के लिए आधुनिक और नियंत्रित स्प्रिंकलर लगाए जाने चाहिए। इससे स्वच्छ हवा और स्वस्थ वातावरण सुनिश्चित करने में सहायता मिलेगी।

प्रवीण अग्रवाल, अध्यक्ष, मप्र चैंबर ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री, ग्वालियर

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हवा प्रदूषित तो फेफड़ों की क्षमता प्रभावित

वायु प्रदूषण में मौजूद महीन कण सांस के साथ फेफड़ों की गहराई तक पहुंचते हैं और वायुमार्ग में सूजन पैदा कर सकते हैं। इससे अस्थमा के मरीजों में सांस फूलना, खांसी और सीने में जकड़न बढ़ सकती है। लंबे समय तक प्रदूषित हवा में रहने से फेफड़ों की कार्यक्षमता प्रभावित होने और उडढऊ जैसी बीमारियों का खतरा बढ़ता है।

डॉ. पराग शर्मा, श्वास रोग विशेषज्ञ, भोपाल

फेफड़ों में सूजन और संक्रमण की संभावना बढ़ सकती है

लगातार प्रदूषित हवा में रहने का असर केवल तत्काल सांस की परेशानी तक सीमित नहीं रहता। पीएम2.5 जैसे महीन कण फेफड़ों में गहराई तक पहुंचकर सूजन और संक्रमण की संभावना बढ़ा सकते हैं। बच्चों, बुजुर्गों और पहले से सांस की बीमारी वाले मरीजों में इसका असर अधिक गंभीर हो सकता है और बीमारी के दौरे बढ़ सकते हैं।

डॉ. लोकेंद्र दवे, श्वास रोग विशेषज्ञ

जनभागीदारी के बिना प्रदूषण नियंत्रण मुश्किल

पर्यावरण के सेवानिवृत्तका कहना है कि वायु प्रदूषण कम करने के लिए वर्तमान में किए जा रहे प्रयास पर्याप्त नहीं हैं। इनका सीधा असर आम नागरिकों पर दिखाई नहीं दे रहा है। नागरिकों में भी वायु प्रदूषण को कम करने के प्रति गंभीरता और चिंता नजर आनी चाहिए। विदेशों में लोग स्वयं प्रेरित होकर अपनी दैनिक जीवनशैली में ऐसे बदलाव करते हैं, जिससे प्रदूषण कम हो। उदाहरण के तौर पर लोग लोक परिवहन का अधिक इस्तेमाल करते हैं। उन्होंने कहा कि सरकार को भी नागरिकों की जरूरत के अनुसार बेहतर और पर्याप्त लोक परिवहन की सुविधा उपलब्ध करानी चाहिए। अधिक से अधिक पेड़ लगाने के लिए लोगों को प्रेरित किया जाए और इस दिशा में काम करने वाले लोगों को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए। साथ ही नदियों और तालाबों को साफ-सुथरा रखने के प्रयास भी तेज किए जाने की जरूरत है। उन्होंने कहा कि इंदौर में वर्षों से नदी नाले में परिवर्तित हो चुकी है। करोड़ों रुपये खर्च किए जाने के बावजूद नदी की स्थिति में अपेक्षित सुधार नहीं हुआ है। इसके अलावा निर्माण कार्यों से उड़ने वाली धूल को नियंत्रित करने के लिए भी प्रभावी कदम उठाए जाने चाहिए। ओ.पी. ने कहा कि इंदौर नगर निगम ने वायु प्रदूषण नियंत्रण की दिशा में अब तक करीब 50 प्रतिशत काम किया है, जबकि अभी 50 प्रतिशत और काम किए जाने की जरूरत है। हालांकि यह काम चुनौतीपूर्ण और कठिन है, लेकिन सरकार, नगर निगम और नागरिकों की संयुक्त भागीदारी से इसे बेहतर तरीके से किया जा सकता है।

ओपी जोशी, रिटायर्ड प्रोफेसर, पर्यावरणविद, इंदौर

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प्रदूषण से बढ़ी सांस की बीमारियां, मरीजों की संख्या में इजाफा 

शहर में बढ़ते वायु प्रदूषण और बदलते मौसम के बीच सांस संबंधी बीमारियों के मरीजों की संख्या में लगातार इजाफा हो रहा है। पिछले पांच वर्षों में सांस लेने में तकलीफ, अस्थमा, एलर्जी और सीओपीडी से जुड़े मरीजों की संख्या में करीब 20 प्रतिशत तक वृद्धि देखी गई है। हवा में मौजूद धूल, धुआं और सूक्ष्म प्रदूषक कण सांस के साथ फेफड़ों तक पहुंचकर श्वसन तंत्र को प्रभावित करते हैं। लंबे समय तक प्रदूषित हवा के संपर्क में रहने से खांसी, सांस फूलना, सीने में जकड़न और एलर्जी जैसी समस्याएं बढ़ सकती हैं। जिन लोगों को पहले से अस्थमा या सीओपीडी जैसी बीमारी है, उनमें प्रदूषण के कारण लक्षण और गंभीर हो सकते हैं। बच्चों, बुजुर्गों और पहले से सांस संबंधी बीमारी से पीड़ित लोगों को प्रदूषण के दौरान विशेष सावधानी बरतनी चाहिए। प्रदूषण का स्तर अधिक होने पर अनावश्यक रूप से खुले में रहने से बचना और चिकित्सकीय सलाह के अनुसार सावधानी रखना जरूरी है

डॉ. विजय छजलानी, श्वसन रोग विशेषज्ञ, इंदौर 

एलर्जी, अस्थमा के मरीज बढ़ रहे हैं

वायु प्रदूषण बढ़ने के साथ श्वसन संबंधी मरीजों की संख्या में स्पष्ट रूप से वृद्धि देखने को मिल रही है। पिछले कुछ दिनों में सांस लेने में तकलीफ, लगातार खांसी, गले में खराश, एलर्जी और अस्थमा की शिकायत लेकर मरीज 10 सें 20 प्रतिशत अधिक संख्या में अस्पताल पहुंच रहे हैं। प्रदूषण में मौजूद सूक्ष्म कण फेफड़ों को प्रभावित करते हैं, जिससे पहले से श्वसन रोग से पीड़ित मरीजों की परेशानी बढ़ जाती है। आईएलडी, सीओपीडी, दमा जैसी बीमारियों से ग्रसित मरीजों में ये और ज्यादा नुकसानदायक हो जाता है। बच्चों और बुजुर्गों में भी इसका असर अधिक देखा जा रहा है। लोगों को धूल से, धुएं से, प्रदूषण से सावधानी बरतने और सांस संबंधी लक्षण होने पर समय पर चिकित्सकीय परामर्श लेने की जरूरत है।

डॉ. संजय भारती, प्रोफेसर एवं विभागाध्यक्ष, रेस्पिरेटरी मेडिसिन, मेडिकल कॉलेज, जबलपुर

अनफिट वाहनों के कारण प्रदूषण बढ़ रहा

जबलपुर में बहुत बड़ी संख्या में उद्योग नहीं होने के बाद भी यहां की एयर इंडेक्स क्वॉलिटी वर्ष में 250 तक पहुंच जाती है। जबकि यह 50 से नीचे होना चाहिए। दूषित हवा से श्वांस संबंधित बीमारियां बढ़ रही है। अनफिट वाहनों के कारण प्रदूषण तेजी से बढ़ रहा है, जिसका सीधा असर स्वास्थ्य पर पड़ रहा है। श्वंसन की समस्या से पीड़ित मरीजों की संख्या में इजाफा हो रहा है। बच्चों और बुजुर्गों में भी इसका असर अधिक देखा जा रहा है। इसके लिए प्रशासन के साथ आम नागरिकों में भी जागरुकता आनी चाहिए। जिन क्षेत्रों में प्रदूषण अधिक हैं, वहां के नागरिक मास्क लगाएं।

डॉ. ऋषि डावर, चिकित्सक विशेषज्ञ, रेस्पिरेटरी मेडिसिन, जबलपुर

कार्बन डाइऑक्साइड का उत्सर्जन कम करना जरूरी

वायु प्रदूषण के लिए वाहनों से निकलने वाला धुआं, कचरा जलाने से होने वाला उत्सर्जन और फैक्ट्रियों से निकलने वाला धुआं प्रमुख कारण हैं। इससे मानव स्वास्थ्य के साथ पर्यावरण पर भी गंभीर असर पड़ता है। ग्लोबल वार्मिंग को नियंत्रित करने के लिए कार्बन डाइऑक्साइड का उत्सर्जन कम करना जरूरी है। बड़े पैमाने पर पौधरोपण के साथ बड़े वृक्षों की कटाई पर रोक लगनी चाहिए। आज काटे जा रहे वृक्षों का वास्तविक लाभ आने वाली पीढ़ियों को 30-40 वर्ष बाद मिलेगा। ईको-फ्रेंडली सिस्टम विकसित किया जाए। स्कूल बसों की नियमित मॉनीटरिंग कर प्रदूषण नियंत्रण के प्रभावी उपाय सुनिश्चित किए जाएं।

आरके श्रीवास्तव, पर्यावरणविद, जबलपुर

पर्यावरणी नियमों की जानकारी और पालन जरूरी

लोगों को पर्यावरण संरक्षण से जुड़े नियमों और कानूनों की पर्याप्त जानकारी नहीं है। इसी वजह से कई बार संबंधित एजेंसियां मनमानी करती हैं और नियमों का प्रभावी पालन नहीं हो पाता। जब तक पर्यावरणीय नियमों की जानकारी और उनके पालन की जिम्मेदारी तय नहीं होगी, तब तक प्रदूषण की समस्या लगातार बढ़ती रहेगी।

डॉ. सुभाष सी. पांडे, पर्यावरणविद् भोपाल

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हर व्यक्ति को निभानी होगी अपनी भूमिका

पर्यावरण को बचाने की जिम्मेदारी केवल सरकार या प्रशासन की नहीं है, बल्कि हर व्यक्ति को इसमें अपनी भूमिका निभानी होगी। यदि हर व्यक्ति अपने जन्मदिन पर एक पौधा लगाए और उसे बड़ा होने तक उसकी देखभाल करे, तो सामूहिक प्रयास से हर साल लाखों पौधे तैयार किए जा सकते हैं और पर्यावरण संरक्षण को मजबूती मिलेगी।

सुनील दुबे, वृक्ष मित्र-पर्यावरणविद् भोपाल

प्रदूषण की निगरानी आबादी वाले और निर्माण प्रभावित क्षेत्रों में की जाए

मध्यप्रदेश में वायु प्रदूषण कम करने के नाम पर करोड़ों रुपए खर्च किए जा चुके हैं, लेकिन जमीनी स्थिति में अपेक्षित सुधार दिखाई नहीं दे रहा है। भोपाल में प्रदूषण की निगरानी के लिए तीन प्रमुख स्थानों पर उपकरण लगे हैं, लेकिन इनकी रीडिंग पूरे शहर की वास्तविक स्थिति को नहीं दर्शाती। आबादी वाले इलाकों, मेट्रो प्रोजेक्ट और सड़कों की खुदाई के कारण धूल और वाहनों से निकलने वाला प्रदूषण लगातार बढ़ रहा है। जरूरत है कि प्रदूषण की निगरानी आबादी वाले और निर्माण प्रभावित क्षेत्रों में भी की जाए, ताकि वास्तविक प्रदूषण स्तर सामने आ सके।

राशिद नूर खान, पर्यावरणविद् भोपाल

Naresh Bhagoria
By Naresh Bhagoria

नरेश भगोरिया। 27 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय हूं। माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विश्ववि...Read More

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