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गुजराती में मोहनथाल मिठाई, उड़िया परिवार में छेना पुड़ा बनाने की परंपरा

दिवाली: भोपाल में रहने वाले अलग-अलग प्रांत के लोगों ने साझा किए अपने रिवाज
गुजराती में मोहनथाल मिठाई, उड़िया परिवार में छेना पुड़ा बनाने की परंपरा

प्रीति जैन- दिवाली का त्योहार देशभर में धूमधाम से मनाया जाता है और सभी प्रांतों में इसकी परंपरा में कुछ मान्यताओं व जायकों के स्तर पर बदलाव होते हैं। कहीं दिवाली के दिन पितरों की सद्गति की प्रार्थना मुख्य होती है तो कहीं दिवाली के दीयों को सूर्योदय से पहले उठाने की परंपरा। कहीं गुजिया गुजा बनती है तो कहीं संजोरी का रूप लेती है। भोपाल में रहने वाले अलग-अलग समुदाय के लोग अपनी परंपरा के मुताबिक दिवाली सेलिब्रेट करते हैं।

घेवर और खाजा मिठाई होगी खास

राजस्थानी कल्चर में हमारे यहां दिवाली वाले दिन घेवर का विशेष महत्व होता है। महिलाएं राजपूती पोशाक पहनती हैं। वहीं, खाजा मिठाई दिवाली के लिए तैयार की जाती है। यह मैदे से लेयर में तैयार होने वाली चाशनी वाली मिठाई है। बेसन के मोटे लौंग के सेव इसके साथ नमकीन के तौर पर खाए जाते हैं। दिवाली वाले दिन रात को जो दीपक लगाए जाते हैं, उन्हें सूर्योदय से पहले उठाने की परंपरा रहती है। - सुचेता सिंह, मेंबर, रॉयल राजस्थान ग्रुप

निमाड़ में बनाते हैं मावे की संजोरी

निमाड़ में पांच दिन तक घी का दीया जलता रहता है। दिवाली पर तिल गुड़ का गुजा बनाया जाता है। वहीं, मावे की संजोरी बनाई जाती है, जो कि फुल सर्किल में होती है। दिवाली वाले दिन नदी, बावड़ियों पर जाकर दीपक रखा जाता है। दिवाली के दूसरे दिन हम सुहाग पड़वा मनाते हैं और बुजुर्गों का आशीर्वाद लेते हैं। - डॉ. साधना बलवटे, निदेशक, निराला सृजन पीठ

फर्सीपूड़ी और मोहनथार बनता है

गुजरात में दिवाली वाले दिन हम जलेबी-फाफड़ा सुबह के समय जरूर खाते हैं। फिर मोनथार (मोहनथाल) यानी बेसन, मावा, घी, मेवे से बनी बर्फी पूजा में शामिल की जाती है। गुगरा यानी गुजिया जैसा आइटम बनाया जाता है। फर्सीपूड़ी मैदे की खस्ता पपड़ी होती है, इसे भी खाते हैे। रंगोली हमारे यहां जमीन को लिपकर फिर सफेद डॉट्स को जोड़कर बनाई जाती है। हमारे यहां दिवाली के दीये तिल के तेल में लगाए जाते हैं। वहीं, पूजा के समय चांदी-सोना रखा जाता है और व्यापार की वृद्धि व सुख-शांति की कामना की जाती है। - निशा दोशी, आंत्रप्रेन्योर

पितरों की सद्गति की करते हैं प्रार्थना

ओडिशा की परंपरा में दिवाली अलग तरह से मनाई जाती है। इस दिन हम कौरिया काठई उत्सव मनाते हैं, जिसमें जूट के पेड़ के तने की लकड़ी जलाकर पूर्वजों की आत्मा की सद्गति के लिए प्रार्थना की जाती है। इस दौरान उड़िया भाषा का लोकगीत गाया जाता है। वहीं, व्यंजन में छेना पुड़ा ताजे पनीर, चीनी व सूजी के साथ बनाया जाता है। - गुरु विजयानंद नायक, क्लासिकल वोकलिस्ट

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