तेल अवीव/तेहरान। मिडिल ईस्ट इस समय दशकों के सबसे बड़े संकट से गुजर रहा है। अमेरिका और इजरायल के संयुक्त सैन्य अभियान के बाद ईरान के साथ शुरू हुआ संघर्ष अब तेजी से एक बड़े क्षेत्रीय युद्ध में बदलता दिख रहा है। तीन दिनों से जारी हमलों और जवाबी हमलों ने पूरे पश्चिम एशिया को युद्ध के मुहाने पर खड़ा कर दिया है।
ईरान पर अमेरिका और इजरायल के बड़े हमले, ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्ला अली खामेनेई की मौत, ईरान की जवाबी कार्रवाई, खाड़ी देशों में अमेरिकी सैन्य ठिकानों पर मिसाइल हमले और हिज्बुल्लाह का युद्ध में शामिल होना इन सब घटनाओं ने मिडिल ईस्ट को युद्ध के नए दौर में धकेल दिया है।
मिसाइल, ड्रोन और बमबारी के बीच खाड़ी देशों ने अपने एयरस्पेस बंद कर दिए हैं, कई एयरलाइनों ने उड़ानें रोक दी हैं और दुनिया भर के देश अपने नागरिकों को सावधानी बरतने की सलाह दे रहे हैं। इस संघर्ष का प्रभाव खाड़ी देशों, यूरोप, एशिया और वैश्विक अर्थव्यवस्था तक पहुंच चुका है। तेल आपूर्ति, समुद्री व्यापार, वैश्विक सुरक्षा और अंतरराष्ट्रीय राजनीति हर स्तर पर इसके परिणाम दिखाई देने लगे हैं।
इस पूरे संघर्ष की शुरुआत उस समय हुई जब अमेरिका और इजरायल ने ईरान के कई रणनीतिक सैन्य ठिकानों पर बड़े पैमाने पर हमले शुरू किए। इन हमलों में ईरान की राजधानी तेहरान समेत कई शहरों को निशाना बनाया गया।
रिपोर्ट्स के मुताबिक, शुरुआती 30 घंटों में ही हजारों बम गिराए गए और सैकड़ों फाइटर जेट्स ने मिशन उड़ानें भरीं। 1000 से ज्यादा सैन्य ठिकानों को निशाना बनाया गया। 30 घंटों में 2000 से ज्यादा बम गिराए गए। 700 से ज्यादा फाइटर जेट उड़ानें भरी गईं। इस ऑपरेशन का मुख्य लक्ष्य ईरान की मिसाइल क्षमताओं, परमाणु कार्यक्रम से जुड़े ठिकानों और सैन्य नेतृत्व को कमजोर करना बताया गया।
इजरायल का कहना था कि, ईरान की बढ़ती सैन्य शक्ति और परमाणु महत्वाकांक्षाएं उसके अस्तित्व के लिए खतरा बन चुकी थीं। इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने कहा है कि, यह अभियान तब तक जारी रहेगा जब तक ईरान की सैन्य क्षमता को पूरी तरह खत्म नहीं कर दिया जाता।
अमेरिका ने भी इस अभियान को क्षेत्रीय सुरक्षा के लिए आवश्यक कार्रवाई बताया। लेकिन इन हमलों का सबसे बड़ा असर तब हुआ जब ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई की मौत की खबर सामने आई।
इस संघर्ष का सबसे बड़ा मोड़ तब आया जब ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई की मौत की खबर सामने आई। इजरायल ने दावा किया कि, सैन्य हमलों के दौरान खामेनेई मारे गए। इसके बाद ईरान में सत्ता संकट पैदा हो गया।
अयातुल्ला अली खामेनेई केवल ईरान के सर्वोच्च नेता नहीं थे, बल्कि पिछले तीन दशकों से अधिक समय से ईरान की राजनीतिक और रणनीतिक दिशा तय करने वाले व्यक्ति थे। उनकी मौत केवल एक राजनीतिक घटना नहीं बल्कि ईरान की सत्ता संरचना के लिए एक बड़ा झटका है। खामेनेई के नेतृत्व में ही ईरान ने अमेरिका और इजरायल के खिलाफ प्रतिरोध की नीति अपनाई थी और क्षेत्र में अपने प्रभाव को बढ़ाया था।
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उनकी मौत के बाद ईरान की सत्ता में अस्थिरता पैदा हो गई है। हालांकि, ईरान ने तुरंत एक अंतरिम नेतृत्व समिति का गठन कर दिया, लेकिन स्थायी नेतृत्व को लेकर अनिश्चितता बनी हुई है। यह भी चर्चा तेज हो गई है कि खामेनेई के बेटे मुजतबा खामेनेई को नया सुप्रीम लीडर बनाया जा सकता है।
अगर ऐसा होता है तो यह ईरान के इतिहास में एक तरह का राजनीतिक वंशवाद माना जाएगा, क्योंकि सुप्रीम लीडर का पद अब तक धार्मिक प्रतिष्ठा और राजनीतिक प्रभाव के आधार पर तय होता रहा है।
खामेनेई की मौत के बाद ईरान ने इसे सीधे युद्ध की घोषणा जैसा माना और तुरंत जवाबी कार्रवाई शुरू कर दी। ईरान ने इजरायल के अलावा कई खाड़ी देशों में मौजूद अमेरिकी सैन्य ठिकानों को निशाना बनाया। मिसाइल और ड्रोन हमलों की यह श्रृंखला कई देशों तक फैल गई।
ईरान ने जिन देशों में अमेरिकी ठिकानों को निशाना बनाया उनमें शामिल हैं
कुछ जगहों पर एयर डिफेंस सिस्टम ने मिसाइलों को हवा में ही मार गिराया, लेकिन कई हमलों से भारी नुकसान की खबरें भी सामने आई हैं।
ईरान का दावा था कि इन देशों में अमेरिकी सैन्य ठिकानों का इस्तेमाल ईरान पर हमले के लिए किया गया था, इसलिए उन्हें निशाना बनाया गया। यह कदम बेहद जोखिम भरा था क्योंकि इससे पूरे मिडिल ईस्ट में युद्ध फैलने का खतरा पैदा हो गया।
ईरानी हमलों में कुछ अमेरिकी सैनिकों की मौत भी हुई है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, 3 अमेरिकी सैनिक मारे गए और कई घायल हुए। इसके बाद अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने साफ कहा कि, हमले तब तक जारी रहेंगे जब तक इन मौतों का बदला नहीं लिया जाता। ट्रंप ने कहा कि, यह सैन्य अभियान चार सप्ताह तक चल सकता है।
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अमेरिका और इजरायल ने हाल ही में ईरान के कई बड़े शहरों पर बड़े पैमाने पर सैन्य हमले किए हैं, जिससे पूरे क्षेत्र में तनाव बेहद बढ़ गया है। इन हमलों में ईरान की राजधानी तेहरान, इस्फहान, कोम और करमन जैसे महत्वपूर्ण शहरों को निशाना बनाया गया। शुरुआती रिपोर्टों के मुताबिक, इन हमलों में 200 से ज्यादा लोगों की मौत हो चुकी है, जबकि 700 से अधिक लोग घायल बताए जा रहे हैं। सबसे दर्दनाक खबर उस समय सामने आई जब एक स्कूल पर मिसाइल गिरने से बड़ी संख्या में छात्राओं की मौत की सूचना मिली। इस घटना ने पूरी दुनिया को झकझोर कर रख दिया है और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर गहरी चिंता और आक्रोश की स्थिति पैदा कर दी है। इन हमलों के बाद ईरान और पश्चिमी देशों के बीच तनाव और ज्यादा बढ़ गया है, जबकि मध्य पूर्व में हालात तेजी से बिगड़ते नजर आ रहे हैं। कई देशों और अंतरराष्ट्रीय संगठनों ने इस घटना पर चिंता जताते हुए शांति और संयम की अपील की है। वहीं ईरान ने इन हमलों को गंभीर आक्रामक कार्रवाई बताते हुए कड़ी प्रतिक्रिया देने की चेतावनी दी है। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर हालात जल्द नहीं संभले तो यह संघर्ष पूरे क्षेत्र को एक बड़े युद्ध की ओर धकेल सकता है।
ईरान अकेला नहीं है। मध्य पूर्व में कई ऐसे सशस्त्र संगठन हैं जो ईरान के करीबी सहयोगी माने जाते हैं। इनमें सबसे प्रमुख लेबनान का संगठन हिज्बुल्लाह है। खामेनेई की मौत के बाद हिज्बुल्लाह ने भी इजरायल पर रॉकेट हमले शुरू कर दिए। इससे उत्तरी इजरायल में हालात और तनावपूर्ण हो गए। हिज्बुल्लाह के अलावा इराक और सीरिया में मौजूद कई शिया मिलिशिया समूह भी इस संघर्ष में सक्रिय हो सकते हैं। अगर ऐसा होता है तो यह युद्ध केवल तीन देशों तक सीमित नहीं रहेगा बल्कि पूरे क्षेत्र में फैल सकता है।
इजरायल ने लेबनान में हिज्बुल्लाह के ठिकानों पर भी हमले किए हैं। लेबनान के कई शहरों से लोगों को खाली कराने के आदेश जारी किए गए हैं। हजारों लोग अपने घर छोड़कर सुरक्षित स्थानों की ओर जा रहे हैं।
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कहा है कि, यह सैन्य अभियान तब तक जारी रहेगा जब तक ईरान खतरा बनना बंद नहीं करता। कुछ विश्लेषकों का मानना है कि ,अमेरिका का लक्ष्य केवल सैन्य कार्रवाई नहीं बल्कि ईरान की राजनीतिक व्यवस्था को कमजोर करना भी हो सकता है।
ट्रंप ने अपने बयान में ईरानी सैनिकों से सरेंडर करने की अपील भी की है। यह बयान संकेत देता है कि, अमेरिका ईरान के भीतर राजनीतिक बदलाव की उम्मीद भी कर रहा है। हालांकि यह रणनीति जोखिम भरी हो सकती है क्योंकि ईरान में राष्ट्रीय भावना बहुत मजबूत है और बाहरी हमले अक्सर जनता को सरकार के पीछे एकजुट कर देते हैं।
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इस संघर्ष में खाड़ी देशों की भूमिका भी महत्वपूर्ण है। सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात और बहरीन जैसे देश लंबे समय से ईरान के क्षेत्रीय प्रभाव को लेकर चिंतित रहे हैं। हालांकि, इन देशों ने सीधे युद्ध में शामिल होने से बचने की कोशिश की है, लेकिन उनके क्षेत्रों में अमेरिकी सैन्य ठिकाने मौजूद हैं। ईरान के हमलों ने इन देशों को भी सीधे खतरे में डाल दिया है।
ईरान ने दुबई के पास ड्रोन हमला भी किया। बुर्ज खलीफा और पाम होटल क्षेत्र के पास ड्रोन देखे जाने की खबर सामने आई। इसके बाद कई खाड़ी देशों ने अपने एयरस्पेस बंद कर दिए। कुवैत, कतर और बहरीन में एयर डिफेंस सिस्टम को सक्रिय कर दिया गया।
अगर यह संघर्ष लंबा चलता है तो खाड़ी देशों को अपनी सुरक्षा नीति पर नए सिरे से विचार करना पड़ सकता है।
मिडिल ईस्ट दुनिया के सबसे बड़े तेल उत्पादन क्षेत्रों में से एक है। इस क्षेत्र में युद्ध का मतलब है कि, वैश्विक ऊर्जा बाजार पर तुरंत असर पड़ेगा। विशेष रूप से होर्मुज जलडमरूमध्य बेहद महत्वपूर्ण है। दुनिया के लगभग 20 से 30 प्रतिशत तेल टैंकर इसी मार्ग से गुजरते हैं। अगर ईरान इस मार्ग को बंद करने की कोशिश करता है तो वैश्विक तेल कीमतों में भारी उछाल आ सकता है। इसका असर पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा।
इस संघर्ष का असर अंतरराष्ट्रीय विमान सेवाओं पर भी पड़ा है। कई एयरलाइनों ने खाड़ी देशों के लिए उड़ानें रोक दी हैं।
इन कंपनियों ने दुबई, अबू धाबी, दोहा, जेद्दाह और कुवैत के लिए उड़ानें अस्थायी रूप से निलंबित कर दी हैं।
भारत के लिए यह संकट कई कारणों से महत्वपूर्ण है।
पहला कारण है- ऊर्जा सुरक्षा। भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा मिडिल ईस्ट से आयात करता है। अगर तेल आपूर्ति प्रभावित होती है तो भारत की अर्थव्यवस्था पर असर पड़ सकता है।
दूसरा कारण है- भारतीय नागरिकों की सुरक्षा। खाड़ी देशों में लाखों भारतीय रहते हैं। संघर्ष बढ़ने की स्थिति में उनकी सुरक्षा और निकासी एक बड़ी चुनौती बन सकती है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में कैबिनेट कमेटी ऑन सिक्योरिटी (CCS) की बैठक हुई, जिसमें हालात की समीक्षा की गई। सरकार की सबसे बड़ी चिंता है-
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इस युद्ध का असर अंतरराष्ट्रीय राजनीति पर भी पड़ सकता है। अमेरिका और उसके सहयोगी देश एक तरफ हैं, जबकि ईरान के साथ रूस और चीन जैसे देशों के संबंध भी मजबूत होते जा रहे हैं। हालांकि, अभी तक रूस और चीन सीधे इस संघर्ष में शामिल नहीं हुए हैं, लेकिन वे कूटनीतिक स्तर पर ईरान का समर्थन कर सकते हैं। अगर ऐसा होता है तो यह संघर्ष एक बड़े भू-राजनीतिक टकराव में बदल सकता है।
इतने तनावपूर्ण हालात के बावजूद कूटनीति की संभावना पूरी तरह खत्म नहीं हुई है। कुछ देशों ने मध्यस्थता की कोशिश शुरू कर दी है। ओमान और कतर जैसे देश पहले भी अमेरिका और ईरान के बीच बातचीत कराने में भूमिका निभा चुके हैं। अगर दोनों पक्ष बातचीत के लिए तैयार होते हैं तो तनाव कम हो सकता है।
यह सवाल कई विशेषज्ञों के मन में है कि क्या यह संघर्ष एक बड़े वैश्विक युद्ध में बदल सकता है। फिलहाल ऐसा कहना जल्दबाजी होगा, लेकिन यह जरूर कहा जा सकता है कि यह संकट बेहद खतरनाक है। अगर और देश इसमें शामिल हो जाते हैं तो हालात तेजी से बिगड़ सकते हैं।
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28 फरवरी:
अमेरिका और इजरायल ने ईरान के कई सैन्य ठिकानों और बड़े शहरों पर हवाई और मिसाइल हमले शुरू किए। तेहरान, इस्फहान, कोम और करमन में धमाकों की खबरें सामने आईं।
पहला दिन:
हमलों के बीच ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई की मौत की खबर सामने आई, जिससे पूरे क्षेत्र में सनसनी फैल गई।
दूसरा दिन:
ईरान ने जवाबी कार्रवाई करते हुए इराक, सीरिया और खाड़ी क्षेत्र में मौजूद अमेरिकी ठिकानों पर मिसाइल हमले किए।
तीसरा दिन:
तेहरान समेत कई शहरों में बमबारी जारी रही। एक स्कूल पर मिसाइल गिरने से 150 से ज्यादा छात्राओं की मौत की खबर ने दुनिया को झकझोर दिया।