ईरान और इजराइल के बीच हालिया हमलों के बाद मध्य पूर्व की स्थिति गंभीर हो गई है। अमेरिका और इजराइल ने ईरान के सैन्य ठिकानों पर हमला किया, जबकि ईरान ने भी स्पष्ट कर दिया है कि वह अपनी लड़ाई खुद तय करेगा। ऐसे में सवाल यह उठता है कि इस टकराव का भारत पर क्या असर होगा।
भारत और ईरान के बीच रिश्ते सिर्फ कुछ दशक पुराने नहीं हैं। दोनों देशों का सांस्कृतिक और व्यापारिक जुड़ाव सदियों पुराना है। भारत ईरान के लिए जरूरी सामान और सेवाएं मुहैया कराता है, जबकि ईरान से भारत कच्चा तेल और अन्य उत्पाद आयात करता है।
भारत और ईरान के बीच व्यापार केवल कूटनीति तक सीमित नहीं है, बल्कि यह आम लोगों की जिंदगी में भी झलकता है। ईरान में भारत से दवाइयां, बासमती चावल, चीनी, सूती कपड़े और ऑटो पार्ट्स बड़ी मात्रा में जाते हैं। वहीं, भारत ईरान से मुख्य रूप से कच्चा तेल, सूखे मेवे जैसे पिस्ता और खजूर, केमिकल्स और ग्लासवेयर आयात करता है।
अमेरिकी प्रतिबंधों के बावजूद भारत और ईरान के बीच संपर्क कभी बंद नहीं हुआ। अब दोनों देश डॉलर की बजाय रुपए-रियाल में भी व्यापार करते हैं। ऊर्जा, फार्मास्यूटिकल्स, सूचना प्रौद्योगिकी और खनन जैसे क्षेत्र में दोनों देशों का सहयोग लगातार बढ़ रहा है।
भारत ने ईरान के चाबहार बंदरगाह में भारी निवेश किया है। यह प्रोजेक्ट मध्य एशिया और अफगानिस्तान तक माल पहुंचाने का अहम रास्ता है। इससे व्यापार को सुगम बनाने के साथ-साथ आतंकवाद के खिलाफ दोनों देशों की साझा रणनीति भी मजबूत होती है।
1. कच्चा तेल- ईरान भारत का महत्वपूर्ण तेल आपूर्तिकर्ता रहा है। अगर ईरान से सप्लाई रुकती है, तो अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतें बढ़ सकती हैं, जिसका असर सीधे भारत के पेट्रोल और डीजल के दाम पर पड़ता है।
2. पेट्रोकेमिकल और केमिकल उत्पाद- भारत ईरान से कुछ खास पेट्रोकेमिकल्स और औद्योगिक केमिकल्स भी मंगाता है, जिनका इस्तेमाल प्लास्टिक, उर्वरक और दवाइयों में होता है। सप्लाई रुकने पर उत्पादन लागत बढ़ सकती है।
3. सूखे मेवे और फल- पिस्ता, खजूर, केसर और सेब-कीवी जैसे फल ईरान से आते हैं। अगर सप्लाई रुकती है, तो इनकी कीमतें बढ़ सकती हैं।
4. ग्लास और औद्योगिक सामान- कुछ खास ग्लासवेयर और औद्योगिक उत्पाद भी ईरान से आते हैं। सप्लाई में बाधा से छोटे उद्योग प्रभावित हो सकते हैं।
भारत की ऊर्जा का बड़ा हिस्सा खाड़ी क्षेत्र पर निर्भर है। होर्मुज जलडमरूमध्य दुनिया के सबसे अहम तेल मार्गों में से एक है। अगर इस मार्ग में कोई रुकावट आती है, तो भारत के कुल तेल आयात का करीब 50% प्रभावित हो सकता है। इसका असर अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतों और भारत के आयात बिल पर पड़ता है।
मिडिल ईस्ट में तनाव बढ़ने से समुद्री मार्गों पर जोखिम बढ़ जाता है। जहाजों का बीमा महंगा हो जाता है और माल ढुलाई की लागत बढ़ जाती है। इससे सिर्फ तेल ही नहीं, बल्कि अन्य आयात-निर्यात पर भी असर पड़ता है।
अगर तनाव लंबा खिंचता है तो आम लोगों को पेट्रोल-डीजल, रसोई गैस, हवाई किराया, ट्रांसपोर्ट, खाद्य तेल, पैकेज्ड सामान और आयातित फल व सूखे मेवे महंगे पड़ सकते हैं। ऊर्जा महंगी होने से लगभग हर सेक्टर की लागत बढ़ती है और महंगाई बढ़ सकती है।