मिडिल ईस्ट में बढ़ते वैश्विक तनाव का असर अब भारत की अर्थव्यवस्था पर साफ नजर आने लगा है। भारत की मुद्रा भारतीय रुपया एशिया की सबसे कमजोर प्रदर्शन करने वाली करेंसी बन गई है। ब्लूमबर्ग के जारी आंकड़ों के मुताबिक, हफ्ते के आखिरी कारोबारी दिन शुक्रवार सुबह रुपया 64 पैसे टूटकर पहली बार अमेरिकी डॉलर के मुकाबले 93.28 के रिकॉर्ड निचले स्तर पर पहुंच गया।
इससे पहले गुरुवार को यह 92.63 पर बंद हुआ था। साल 2026 की शुरुआत से अब तक रुपये में करीब 3.64 फीसदी की गिरावट दर्ज की जा चुकी है।
इस गिरावट के पीछे सबसे बड़ी वजह क्रूड ऑयल की कीमतों में तेज उछाल को माना जा रहा है। ब्रेंट क्रूड ऑयल की कीमतों में गुरुवार को जबरदस्त तेजी देखी गई और यह एक समय 10.9 फीसदी उछलकर 119.1 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गया। हालांकि बाद में इसमें कुछ नरमी आई और शुक्रवार सुबह यह 107.2 डॉलर प्रति बैरल के आसपास कारोबार करता दिखा। तेल की कीमतों में यह उछाल उस समय आया जब इजरायल ने ईरान के साउथ पार्स गैस फील्ड पर हमला किया।
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हमले के बाद ईरान ने खाड़ी देशों को सख्त चेतावनी देते हुए कहा कि अब कई ऊर्जा ठिकाने टारगेट हो सकते हैं। हालांकि बाद में बेंजामिन नेतन्याहू ने संकेत दिया कि आगे ऊर्जा ढांचे को निशाना बनाने से बचा जाएगा। वहीं अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भी स्पष्ट किया कि फिलहाल पश्चिम एशिया में अमेरिकी सैनिकों की तैनाती की कोई योजना नहीं है।
विशेषज्ञों की मानें तो हालात अभी और चुनौतीपूर्ण हो सकते हैं। फिनरेक्स ट्रेजरी एडवाइजर्स एलएलपी के हेड ऑफ ट्रेजरी और एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर अनिल कुमार भंसाली का कहना है कि रुपये पर दबाव बना रहेगा।
उनके अनुसार, जब तक कच्चे तेल की कीमतें घटकर करीब 80 डॉलर प्रति बैरल तक नहीं आतीं, तब तक विदेशी निवेश का बहिर्वाह उम्मीद से ज्यादा रह सकता है। इसका सीधा असर भारत के चालू खाता घाटे और राजकोषीय संतुलन पर पड़ेगा।
आगे एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर अनिल कुमार भंसाली ने यह भी बताया कि बाजार अब भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के कदमों पर नजर बनाए हुए है। अगर केंद्रीय बैंक जल्द कोई ठोस हस्तक्षेप नहीं करता, तो रुपए में और कमजोरी देखी जा सकती है। वहीं निर्यातक भी फिलहाल डॉलर बेचने से बच रहे हैं, क्योंकि वे तेल की कीमतों में स्थिरता का इंतजार कर रहे हैं।
कुल मिलाकर, रुपए में गिरावट का सीधा असर आम लोगों पर महंगाई के रूप में पड़ता है। अगर यह ट्रेंड जारी रहता है, तो भारतीय रिजर्व बैंक को रेपो रेट समेत अन्य मौद्रिक नीतियों में बदलाव करने के लिए मजबूर होना पड़ सकता है, जिससे आने वाले समय में कर्ज और महंगा हो सकता है।