मध्यप्रदेश के बासमती को GI टैग की मांग तेज, बासमती उत्पादक किसानों से दिग्विजय सिंह ने किया संवाद

बाड़ी। मध्यप्रदेश में उत्पादित बासमती धान को भौगोलिक संकेतक यानी GI टैग दिलाने की मांग को लेकर सोमवार को बकतरा रोड स्थित अटलाल रिसोर्ट में बासमती उत्पादक किसान संवाद कार्यक्रम आयोजित किया गया। इसमें बाड़ी, बारना कमांड क्षेत्र और आसपास के इलाकों से बड़ी संख्या में बासमती उत्पादक किसान शामिल हुए। कार्यक्रम में किसानों ने बासमती की पहचान, फसल के उचित दाम और GI टैग मिलने से जुड़े मुद्दों को प्रमुखता से उठाया। किसानों ने कहा कि मध्यप्रदेश में बासमती का उत्पादन लंबे समय से हो रहा है लेकिन इसके उत्पादन क्षेत्र को मिलने वाली पहचान और आर्थिक लाभ को लेकर अभी भी कई सवाल बने हुए हैं।
दिग्विजय सिंह ने किसानों की मांग संसद तक ले जाने की बात कही
किसान संवाद में पूर्व मुख्यमंत्री और राज्यसभा सांसद दिग्विजय सिंह ने किसानों से चर्चा की। उन्होंने कहा कि मध्यप्रदेश के बासमती उत्पादक किसानों को उनकी फसल की पहचान और उचित मूल्य का लाभ मिलना चाहिए। उन्होंने कहा कि जब प्रदेश के किसान बासमती की खेती कर रहे हैं, बाजार में यह चावल बिक रहा है और इसका निर्यात भी हो रहा है, तो इससे मिलने वाला लाभ उत्पादक किसानों तक भी पहुंचना चाहिए। दिग्विजय सिंह ने किसानों को भरोसा दिलाया कि बासमती के GI टैग का मुद्दा संसद से लेकर सड़क तक उठाया जाएगा और किसानों की मांग को आगे बढ़ाने के लिए प्रयास जारी रहेंगे।
18 साल पुराने मुद्दे के समाधान की मांग
किसान संवाद में मध्यप्रदेश के बासमती को GI टैग दिलाने की प्रक्रिया को समयबद्ध तरीके से आगे बढ़ाने की मांग रखी गई। किसानों और आयोजकों की ओर से कहा गया कि राज्य में उत्पादित बासमती की गुणवत्ता और उत्पादन को लेकर स्वतंत्र वैज्ञानिक सर्वे कराया जाना चाहिए। इसके साथ ही APEDA और संबंधित संस्थाओं के स्तर पर मध्यप्रदेश में होने वाले बासमती उत्पादन और निर्यात से जुड़े आंकड़े स्पष्ट रूप से दर्ज करने की मांग की गई। किसान संगठनों ने यह भी कहा कि GI प्रक्रिया में किसानों और उनके संगठनों की भागीदारी सुनिश्चित होनी चाहिए। बासमती की पूरी वैल्यू चेन में उत्पादक किसानों को बेहतर कीमत और उनकी हिस्सेदारी मिलना भी जरूरी है। APEDA की वर्तमान वेबसाइट पर बासमती के GI क्षेत्र में पंजाब, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, दिल्ली, पश्चिमी उत्तर प्रदेश के 30 जिले और जम्मू-कश्मीर के 3 जिले शामिल बताए गए हैं, जबकि मध्यप्रदेश इस सूची में शामिल नहीं है।
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प्रधानमंत्री और केंद्रीय मंत्री को पत्र भेज चुके हैं दिग्विजय सिंह
मध्यप्रदेश के बासमती को GI टैग दिलाने का मुद्दा दिग्विजय सिंह पहले भी उठा चुके हैं। मार्च 2026 में उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिखकर मध्यप्रदेश में पैदा होने वाले बासमती चावल को GI टैग दिए जाने की मांग की थी। इसके बाद उन्होंने केंद्रीय वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री को भी इस विषय में पत्र भेजे जाने की जानकारी दी थी। इससे पहले भी वह इस मुद्दे को किसानों से जुड़े महत्वपूर्ण विषय के रूप में उठाते रहे हैं। मार्च 2026 में दिग्विजय सिंह ने सार्वजनिक रूप से कहा था कि मध्यप्रदेश के कई जिलों में किसान बासमती का उत्पादन करते हैं और इसके लिए GI पहचान की मांग लंबे समय से चली आ रही है।
किसानों ने एकजुट होकर मांग आगे बढ़ाने का संकल्प लिया
किसान संवाद के दौरान बासमती उत्पादक किसानों ने कहा कि यह फसल केवल उनकी आय का साधन नहीं बल्कि क्षेत्र की कृषि पहचान से भी जुड़ी है। किसानों ने GI टैग सहित दूसरी मांगों को संगठित तरीके से आगे ले जाने और अपने अधिकारों के लिए एकजुट रहने का संकल्प लिया। किसानों का कहना था कि बासमती की गुणवत्ता और बाजार में इसकी मांग का लाभ उत्पादन करने वाले किसानों तक पहुंचना जरूरी है। इसके लिए फसल की पहचान के साथ बाजार व्यवस्था और कीमत से जुड़े मुद्दों पर भी ध्यान दिए जाने की जरूरत है।
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स्थानीय कांग्रेस नेताओं ने भी रखी बात
कार्यक्रम में जिला कांग्रेस अध्यक्ष देवेंद्र पटेल सिलवानी और उदयपुरा विधानसभा क्षेत्र के पूर्व विधायक देवेंद्र पटेल ने भी किसानों को संबोधित किया। उन्होंने कहा कि किसानों को उनकी मांगों और अधिकारों का लाभ दिलाने के लिए हर स्तर पर प्रयास किए जाएंगे। किसान संवाद में बड़ी संख्या में स्थानीय कांग्रेस पदाधिकारी, कार्यकर्ता और बासमती उत्पादक किसान मौजूद रहे। कार्यक्रम के दौरान किसानों की ओर से GI टैग, उत्पादन की वैज्ञानिक पहचान, उचित मूल्य और बासमती की पूरी वैल्यू चेन में किसानों की भागीदारी को लेकर अपनी मांगें सामने रखी गईं। मध्यप्रदेश के बासमती को GI टैग दिलाने की मांग अब लंबे समय से चले आ रहे मुद्दे के रूप में सामने है। किसान संगठनों का कहना है कि इस प्रक्रिया में उत्पादन क्षेत्र, गुणवत्ता, बाजार और किसानों के आर्थिक हित को साथ लेकर आगे बढ़ने की जरूरत है।




















