दमोह की डीआई लैब में लाखों की मशीनें बेकार, तकनीकी स्टाफ की कमी से पशुपालकों को परेशानी
दमोह। जिला मुख्यालय स्थित जिला पशु चिकित्सालय परिसर की जिला पशु रोग अनुसंधान प्रयोगशाला (डीआई लैब) में लाखों रुपये की लागत से उपलब्ध कराए गए आधुनिक उपकरणों का पूरा लाभ पशुपालकों को नहीं मिल पा रहा है। लैब में जांच के लिए जरूरी मशीनें मौजूद होने के बावजूद एक्स-रे टेक्नीशियन और लैब टेक्नीशियन जैसे तकनीकी कर्मचारियों की कमी के कारण इनके नियमित संचालन में दिक्कत बताई जा रही है। कुछ उपकरण लंबे समय से बंद हैं, जबकि कुछ का जरूरत के हिसाब से ही इस्तेमाल होने की बात सामने आई है। इस स्थिति का असर गंभीर रूप से बीमार पशुओं की जांच और समय पर उपचार पर पड़ने की बात पशुपालकों की ओर से कही जा रही है। उनका कहना है कि सरकारी स्तर पर जांच की सुविधा नियमित रूप से उपलब्ध नहीं होने पर उन्हें निजी केंद्रों का रुख करना पड़ता है।
करीब 20 लाख रुपये की लागत से तैयार हुई थी लैब
शासकीय डीआई लैब को पशुओं की गंभीर बीमारियों की जांच की सुविधा बेहतर बनाने के उद्देश्य से तैयार किया गया था। इसके निर्माण और सुविधाओं पर करीब 20 लाख रुपये खर्च होने की जानकारी दी गई है। लैब का शिलान्यास मार्च 2016 में हुआ था। यहां विभिन्न प्रकार की जांच के लिए जरूरी उपकरण और आधुनिक मशीनें उपलब्ध कराई गई थीं। उद्देश्य यह था कि पशुओं की बीमारी की पहचान के लिए स्थानीय स्तर पर जांच की सुविधा उपलब्ध हो और उपचार में अनावश्यक देरी न हो। हालांकि मौजूदा स्थिति में मशीनों की उपलब्धता और उनके नियमित उपयोग के बीच अंतर दिखाई दे रहा है।
मशीनें मौजूद लेकिन तकनीकी ऑपरेटरों की कमी
डीआई लैब में उपलब्ध उपकरणों को चलाने के लिए प्रशिक्षित तकनीकी कर्मचारियों की जरूरत होती है। लेकिन लैब में पर्याप्त लैब टेक्नीशियन और एक्स-रे टेक्नीशियन उपलब्ध नहीं होने की बात सामने आई है। जानकारी के मुताबिक कुछ मशीनों के संचालन के लिए कर्मचारियों को पर्याप्त प्रशिक्षण नहीं मिल पाया है। ऐसे में उपकरण मौजूद होने के बावजूद उनका व्यापक और नियमित उपयोग नहीं हो पा रहा है। पशु चिकित्सा क्षेत्र से जुड़े लोगों का कहना है कि महंगे उपकरणों का प्रभावी उपयोग तभी संभव है, जब उन्हें चलाने के लिए प्रशिक्षित स्टाफ भी उपलब्ध हो। तकनीकी कर्मचारियों की कमी के कारण सरकारी जांच सुविधा अपनी पूरी क्षमता से काम नहीं कर पा रही है।
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डॉक्टर और मैदानी कर्मचारियों के पद भी खाली
डीआई लैब की समस्या को जिले में पशु चिकित्सा विभाग के मानव संसाधन की कमी से भी जोड़कर देखा जा रहा है। दमोह जिले में 29 पशु चिकित्सालय और 22 औषधालय संचालित हैं। विभाग में सहायक पशु चिकित्सा क्षेत्र अधिकारी के 99 पद स्वीकृत बताए गए हैं, लेकिन इनमें करीब 50 पदों पर ही कर्मचारी उपलब्ध हैं। इसी तरह डॉक्टरों के 42 स्वीकृत पदों के मुकाबले करीब 25 डॉक्टर कार्यरत बताए जा रहे हैं। स्टाफ की यह कमी केवल अस्पतालों और औषधालयों तक सीमित नहीं रहती, बल्कि जांच, नमूना परीक्षण और अन्य तकनीकी सेवाओं पर भी इसका असर पड़ सकता है।
जांच के लिए निजी केंद्रों पर निर्भरता बढ़ने की आशंका
खून, मल-मूत्र और एक्स-रे जैसी जांच पशुओं में कई गंभीर बीमारियों की पहचान के लिए जरूरी होती हैं। जब सरकारी स्तर पर यह सुविधा नियमित रूप से उपलब्ध नहीं होती तो पशुपालकों को निजी जांच केंद्रों की ओर जाना पड़ता है। पशुपालकों का कहना है कि गंभीर रूप से बीमार पशुओं के मामले में जांच में होने वाली देरी उपचार शुरू करने में भी बाधा बन सकती है। विशेष रूप से दूरदराज के ग्रामीण क्षेत्रों से पशुओं को जिला मुख्यालय लाने वाले लोगों के लिए बार-बार निजी केंद्रों पर जाना अतिरिक्त समय और खर्च का कारण बनता है।
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अस्पताल तक पहुंचने वाला रास्ता भी परेशानी का कारण
जिला पशु चिकित्सालय की परेशानी केवल लैब और स्टाफ की कमी तक सीमित नहीं बताई जा रही है। अस्पताल तक पहुंचने वाला मुख्य मार्ग पक्का नहीं होने के कारण बारिश के मौसम में कीचड़ की स्थिति बन जाती है। बीमार या घायल पशुओं को लेकर अस्पताल पहुंचने वाले पशुपालकों को ऐसे रास्ते से गुजरने में काफी दिक्कत होती है। रास्ते पर फिसलन के कारण पशुओं के गिरने या उनकी चोट बढ़ने की आशंका भी रहती है। बारिश के दौरान कीचड़ के कारण वाहनों की आवाजाही प्रभावित होने के साथ आपात स्थिति में आने-जाने वाले वाहनों और एंबुलेंस को भी परेशानी होने की बात कही जा रही है।
परिसर की व्यवस्थाओं पर भी उठ रहे सवाल
अस्पताल परिसर की साफ-सफाई और व्यवस्थाओं को लेकर भी सवाल सामने आए हैं। परिसर में सिरिंज, ब्लड सैंपल, आइस पैड और अन्य चिकित्सकीय सामग्री दिखाई देने की बात कही गई है। वहीं परिसर में मौजूद एक कुएं में गंदगी भरी होने की जानकारी भी सामने आई है। इससे साफ-सफाई और परिसर के रखरखाव को लेकर सवाल उठ रहे हैं। लैब की नियमित गतिविधियों को लेकर भी स्थिति स्पष्ट नहीं होने की बात कही जा रही है। लैब कक्ष की दीवार पर प्रभारी डॉ. संजय पाण्डेय और सहायक राजेंद्र खरे के नाम लिखे हुए दिखाई देने की जानकारी है। वहीं, विभाग की ओर से वर्तमान में लैब में आने वाले डॉक्टर और सहायक के नाम अलग बताए जाने की बात सामने आई है।
पशुपालकों ने सुविधाएं दुरुस्त करने की मांग उठाई
पशुपालकों का कहना है कि पशुधन के बेहतर इलाज के लिए केवल डॉक्टरों की उपलब्धता पर्याप्त नहीं है। अस्पताल में जांच की आधुनिक सुविधाएं, प्रशिक्षित तकनीकी स्टाफ और सुगम आवागमन की व्यवस्था भी जरूरी है। उनके मुताबिक यदि सरकारी लैब में उपलब्ध मशीनों का नियमित संचालन हो और जांच की सुविधाएं एक ही जगह मिलें तो पशुओं के इलाज में तेजी आ सकती है। साथ ही अस्पताल तक पहुंचने वाले रास्ते की स्थिति में सुधार से ग्रामीण क्षेत्रों से आने वाले पशुपालकों को भी राहत मिलेगी।
जरूरत के अनुसार उपकरणों का उपयोग हो रहा
मामले में उप संचालक पशुपालन एवं डेयरी विभाग केपी कुर्मी ने बताया कि डीआई लैब में अतिरिक्त रूप से एक डॉक्टर कार्य कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि उपलब्ध इंस्ट्रूमेंट का आवश्यकतानुसार समय-समय पर उपयोग किया जाता है। विभाग के इस पक्ष के बीच सवाल यह बना हुआ है कि लैब में उपलब्ध आधुनिक मशीनों का नियमित और व्यापक उपयोग किस स्तर तक हो पा रहा है और तकनीकी स्टाफ की कमी को दूर करने के लिए क्या व्यवस्था की जा रही है। डीआई लैब की स्थापना का उद्देश्य पशुओं की गंभीर बीमारियों की जांच को जिला स्तर पर सुविधाजनक बनाना था। ऐसे में आधुनिक उपकरणों के साथ पर्याप्त तकनीकी मानव संसाधन उपलब्ध होना इस सुविधा के प्रभावी संचालन के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है।























