पितृ पक्ष में कौओं का इंतजार: थाली सजाकर छत पर बैठे लोग, घंटों बाद भी नहीं पहुंचे ‘मेहमान’

ग्वालियर। पितृ पक्ष चल रहा है। घरों में पुरखों को याद कर भोग तैयार हो रहा है और छतों पर थालियां सजाई जा रही हैं। लेकिन शहर के कई इलाकों में लोग उस ‘मेहमान’ का इंतजार कर रहे हैं, जिसे श्राद्ध का भोजन कराने की परंपरा है।
ग्वालियर के कई हिस्सों में लोग थाली में भोजन रखकर घंटों तक कौए के आने का इंतजार कर रहे हैं। फूलबाग, लश्कर, मुरार, थाटीपुर, गोला का मंदिर और सिटी सेंटर के रहवासियों का कहना है कि पहले छत पर खाना रखते ही कुछ देर में कौए पहुंच जाते थे। अब कई बार घंटों इंतजार के बाद भी कौए नजर नहीं आते।
धार्मिक मान्यता में कौए का खास महत्व
पितृ पक्ष में कौए को भोजन कराने की पुरानी परंपरा है। धार्मिक मान्यता के अनुसार कौए के रूप में पितर भोजन ग्रहण करने आते हैं। श्राद्ध के दिन पुरखों के नाम से निकाला गया भोजन कौए को खिलाने से पितरों की तृप्ति और उनका आशीर्वाद मिलने की मान्यता है। इसी वजह से जब कौआ काफी देर तक भोजन करने नहीं आता तो कई परिवार चिंतित हो जाते हैं।

कौए नहीं मिले तो लक्ष्मीगंज और जलविहार पहुंच रहे लोग
शहर में कौओं की कमी महसूस होने के बीच लक्ष्मीगंज श्मशान घाट और जलविहार पार्क ऐसे स्थान बताए जा रहे हैं, जहां अभी भी लोगों को कौए दिखाई दे रहे हैं। पितृ पक्ष में कुछ लोग दूर-दूर से लक्ष्मीगंज पहुंच रहे हैं। यहां कौओं की संख्या अपेक्षाकृत ज्यादा होने के कारण लोग पितरों के नाम का भोजन उन्हें खिला रहे हैं। जलविहार पार्क में भी कुछ संख्या में कौए नजर आ रहे हैं।
कौए को क्यों खिलाया जाता है भोग?
ज्योतिषाचार्य हेमंत शर्मा के अनुसार धार्मिक मान्यता में कौए को देवपुत्र माना गया है। मान्यता है कि इंद्रपुत्र जयंत ने कौए का रूप धारण किया था। इसी से जुड़ी कथा में भगवान राम द्वारा उसे दंड देने और बाद में वरदान दिए जाने का उल्लेख मिलता है। मान्यता के अनुसार कौए को अर्पित किया गया भोजन पितरों तक पहुंचता है। इसी विश्वास के चलते श्राद्ध में सबसे पहले कौए को भोजन कराने की परंपरा चली आ रही है।
पेड़ कम हुए, शहर बढ़ा... क्या इससे भी घटे कौए?
पर्यावरण से जुड़े लोगों के मुताबिक, पेड़ों की कटाई, बढ़ता शहरीकरण, प्रदूषण, प्लास्टिक कचरा और लगातार बढ़ता शोर पक्षियों के प्राकृतिक आवास और भोजन की उपलब्धता को प्रभावित कर सकते हैं। शहर में पुराने पेड़ों और खुले स्थानों की संख्या कम होने से पक्षियों के रहने और घोंसला बनाने के स्थान भी प्रभावित हो सकते हैं। मोबाइल टावरों के रेडिएशन को लेकर भी समय-समय पर चिंता जताई जाती रही है, हालांकि कौओं की संख्या में कमी के लिए किसी एक कारण को जिम्मेदार ठहराने से पहले वैज्ञानिक अध्ययन जरूरी है।
कौआ न आए तो गाय या श्वान को भोजन कराने की मान्यता
हेमंत शर्मा के मुताबिक, श्राद्ध का भोजन कौए को कराने की विशेष धार्मिक परंपरा है। यदि कौआ भोजन ग्रहण करने नहीं आता तो गाय या श्वान को भोजन कराने की परंपरा भी निभाई जा सकती है। इसका उद्देश्य पितरों के प्रति श्रद्धा व्यक्त करना और अन्नदान की परंपरा को आगे बढ़ाना माना जाता है।
‘पहले सुबह होते ही सुनाई देती थी कौओं की आवाज’
व्यापारी अनिल केसवानी बताते हैं कि कुछ साल पहले सुबह होते ही घरों और मोहल्लों में कौओं की आवाज सुनाई देती थी। छतों और पेड़ों पर बड़ी संख्या में कौए दिखाई देते थे। उनके मुताबिक, अब धीरे-धीरे कौए कम नजर आते हैं और पितृ पक्ष के दौरान यह कमी ज्यादा महसूस होती है। उन्होंने बताया कि घर की छत पर काफी देर इंतजार करने के बाद भी जब कौआ नहीं आया तो वे लक्ष्मीगंज श्मशान घाट पहुंचे और वहां कौए को भोग खिलाया।




















