1986 से 2026 तक कावेरी इंजन की पूरी कहानी: 81 kN के सपने से 70 kN की नाकामी तक, कैसे फेल हुआ तेजस का स्वदेशी इंजन

नई दिल्ली। भारत के स्वदेशी जेट इंजन के सफर की कहानी साल 1986 से शुरू होती है, जब लाइट कॉम्बैट एयरक्राफ्ट तेजस को देसी पावर देने के लिए कावेरी प्रोग्राम का आइडिया रखा गया था। इस महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट को 1989 में आधिकारिक मंजूरी मिली और उस वक्त लक्ष्य रखा गया कि इसे 1996 तक पूरा कर लिया जाएगा। योजना के तहत एक आफ्टरबर्नर वाले लो-बाईपास टर्बोफैन इंजन को पूरी तरह भारत में बनाना था, जिसमें कंप्रेसर से लेकर कंबशन चैंबर, टरबाइन और एडवांस कंट्रोल सिस्टम तक सब कुछ स्वदेशी होना था। लेकिन शुरुआत से ही कावेरी को टेक्निकल चुनौतियों ने घेर लिया। ज्यादा तापमान झेलने वाले मटेरियल की कमी, टरबाइन ब्लेड्स को अत्यधिक प्रेशर और हीट में टिकाए रखने की मुश्किल और कंप्रेसर डिजाइन जैसी दिक्कतों ने प्रोजेक्ट को बार-बार पीछे धकेला। सबसे बड़ी चुनौती थ्रस्ट-टू-वेट रेश्यो को हासिल करना था।
कम थ्रस्ट और ज्यादा वजन बने दिक्कत
ओरिजिनल डिजाइन में कावेरी से करीब 81 किलोन्यूटन थ्रस्ट की उम्मीद थी, लेकिन शुरुआती टेस्टिंग में यह सिर्फ 70 किलोन्यूटन तक ही पहुंच पाया। वहीं इसका वजन तय सीमा 1100 किलोग्राम से भी ज्यादा निकल गया। इस परफॉर्मेंस गैप, देश में हाई-ऑल्टीट्यूड टेस्टिंग फैसिलिटी की कमी और विदेशी एडवांस्ड टेक्नोलॉजी तक पहुंच न होने के कारण यह इंजन कभी भी तेजस की जरूरतों पर खरा नहीं उतर पाया और आखिरकार फाइटर जेट के लिए विदेशी इंजन का रास्ता चुनना पड़ा।
हार नहीं मानी, जारी रखा प्रोग्राम
DRDO ने हार मानने की जगह इस प्रोग्राम को नया मोड़ दे दिया। टीम ने आफ्टरबर्नर के बिना चलने वाले इंजन पर फोकस किया, जो अलग-अलग प्रोपल्शन जरूरतों के हिसाब से फिट बैठता था। इसी बदली हुई सोच ने आखिर में कावेरी को घातक UCAV के लिए परफेक्ट बना दिया।इस पूरे सफर में कावेरी प्रोग्राम ने भले ही तेजस को पावर न दिया हो, लेकिन भारत को कई बड़ी उपलब्धियां दे दीं।
कई प्रोटोटाइप तैयार किए
स्वदेशी जेट टेक्नोलॉजी में गहरी समझ बनी, कई प्रोटोटाइप तैयार हुए, 3200 घंटे से ज्यादा की ग्राउंड और फ्लाइट टेस्टिंग पूरी हुई। साथ ही देश को अपना पहला सर्टिफाइड फुल अथॉरिटी डिजिटल इंजन कंट्रोल सिस्टम यानी FADEC और हाई-टेम्परेचर झेलने वाले स्पेशल मटेरियल्स मिले। इन सभी सिस्टम्स को IL-76 एयरक्राफ्ट पर लगे फ्लाइंग टेस्ट बेड पर परखा गया, जिसने भारतीय इंजीनियरों को असली उड़ान में स्वदेशी गैस-टर्बाइन इंजन ऑपरेट करने का दुर्लभ अनुभव दिया।
जाना क्या-क्या जरूरी है जेट इंजन के लिए
दरअसल इस पूरी कवायद का असली मकसद यही समझना था कि फाइटर जेट का इंजन बनाना सिर्फ ज्यादा थ्रस्ट पैदा करने का खेल नहीं है। इसके लिए कंप्रेसर, टरबाइन, कंबशन सिस्टम, मटेरियल साइंस, कंट्रोल सिस्टम और प्रिसिजन मैन्युफैक्चरिंग में एक साथ महारत चाहिए होती है। कावेरी प्रोग्राम की वजह से भारत को ये सारी चीजें जीरो से बनानी पड़ीं और यही वजह है कि तेजस को पावर देने के लिए शुरू हुआ ये प्रोजेक्ट आज भविष्य के भारतीय एयरो-इंजनों के लिए एक मजबूत नींव बन चुका है।




















