PU Special :महिलाओं की 'नो किड्स' की चाहत बन रही रिश्ते में विवाद की वजह, भोपाल में 4 और इंदौर में 7 मामले विचाराधीन

पल्लवी वाघेला, भोपाल। भोपाल और इंदौर के फैमिली कोर्ट में ऐसे मामले सामने आ रहे हैं, जहां पति-पत्नी के बीच बच्चे को लेकर मतभेद विवाद की वजह बन रहे हैं। कई महिलाएं करियर, आर्थिक स्थिति, घर और बच्चे की परवरिश की जिम्मेदारी को देखते हुए मां नहीं बनना चाहतीं। फैमिली कोर्ट में ऐसे मामलों को काउंसलिंग के जरिए सुलझाने का प्रयास किया जा रहा है, जबकि कुछ मामलों में विवाद तलाक तक पहुंच चुका है।
करियर की चिंता से मां नहीं बनना चाहती महिलाएं
मध्यप्रदेश के फैमिली कोर्ट में सामने आ रहे मामलों में कई महिलाएं बच्चे की जिम्मेदारी को अपने करियर से जोड़कर देख रही हैं। उनका कहना है कि बच्चे के जन्म और परवरिश के बाद नौकरी और करियर पर असर पड़ सकता है। इसके अलावा आर्थिक दबाव, जिम्मेदारी का बोझ और बच्चों के भविष्य को लेकर चिंता भी उनके फैसले को प्रभावित कर रही है। ऐसे मामलों में पति-पत्नी के बीच मतभेद बढ़ने के बाद फैमिली कोर्ट में मामला पहुंच रहा है और काउंसलिंग के जरिए समाधान निकालने का प्रयास किया जा रहा है।
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भोपाल में लव मैरिज के बाद बढ़ा विवाद
भोपाल में एनजीओ में कार्यरत महिला और बैंकर पति ने 2015 में लव मैरिज की थी। महिला ने शादी के समय बच्चा न करने की शर्त रखी थी। पति ने तब हां कर दी, लेकिन बाद में बच्चे की इच्छा जताने लगा। 2022 में विवाद इतना बढ़ गया कि दोनों अलग रहने लगे और बीते हफ्ते तलाक ले लिया। काउंसलिंग में महिला ने कहा कि भारत में बच्चा पालना आसान नहीं है। महिला का तर्क था कि देश में प्रदूषण, शिक्षा व्यवस्था की कमियां और रोजगार की चुनौतियां हैं।
अपना घर और पर्याप्त सेविंग नहीं, इसलिए बच्चा नहीं
इंदौर में अपना घर न होने के कारण पत्नी ने कंसीव करने से इंकार कर दिया। यह विवाद कोर्ट में विचाराधीन है। मामले में महिला ने कहा कि वह ‘बच्चे पल ही जाते हैं’ और ‘भगवान सबकी व्यवस्था करके भेजता है’ जैसे जुमलों में यकीन नहीं करती। उसने कहा कि न खुद का घर है और न बच्चे के लिए पर्याप्त सेविंग, इसलिए वह तैयार नहीं है। इस मामले में आर्थिक सुरक्षा और भविष्य की चिंता बच्चे की योजना को लेकर विवाद की वजह बनी है।
प्रमोशन के बीच बच्चे की जिम्मेदारी नहीं चाहती
दमोह जिले में निजी बैंक में कार्यरत पत्नी ने भरण-पोषण का केस लगाया है। उसने कहा कि शादी को चार साल हुए हैं और ससुराल पक्ष बच्चे के लिए दबाव बना रहा है। वह अभी अपने करियर पर फोकस करना चाहती है। उसने बताया कि उसका प्रमोशन हो रहा है और ऐसे में वह बच्चे की जिम्मेदारी नहीं चाहती। इंदौर के अन्य मामले में पत्नी सोसायटी के बच्चों की हुड़दंग से परेशान होकर बच्चे नहीं चाहती। उसने कहा कि शाम को पार्क में जब मदर्स अपने अनुभव बताती हैं तो उसे घबराहट होने लगती है।
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आर्थिक बोझ और जिम्मेदारी भी कारण
विवाद सिर्फ ‘बच्चा चाहिए या नहीं’ तक सीमित नहीं रहता। यह दंपती की भविष्य की प्राथमिकताओं और जीवन जीने के तरीके के बीच अंतर का मामला है। कुछ महिलाएं बच्चे की परवरिश को आर्थिक जिम्मेदारी से जोड़कर देख रही हैं। करियर, महंगी शिक्षा, स्वास्थ्य सुविधाएं, घर खरीदने की चिंता और नौकरी के साथ बच्चे की देखभाल का दबाव भी उनके फैसले को प्रभावित कर रहा है। ऐसे में प्रयास होता है कि काउंसलिंग के जरिए हल निकाला जाए। शैल अवस्थी, काउंसलर, फैमिली कोर्ट के अनुसार, ऐसे मामलों में दोनों पक्षों की बात समझकर समाधान निकालने का प्रयास किया जाता है। तीन साल पहले ऐसा ही मामला भोपाल फैमिली कोर्ट में भी आया था, जहां प्राइवेट स्कूल टीचर ने बच्चों से परेशान होकर बच्चा नहीं चाहिए का प्रण ले लिया था। बाद में इस मामले में दंपति का तलाक हो चुका है।












