100% टैरिफ से बचा भारत? ट्रंप की टैरिफ चाल फंसी, अमेरिकी सीनेट का रूस बिल अब हाउस में अटका

वॉशिंगटन। अमेरिका में रूस से तेल खरीदने वाले देशों पर भारी टैरिफ लगाने की योजना फिलहाल धीमी पड़ती दिखाई दे रही है। जिस बिल को अमेरिकी सीनेट में जोरदार समर्थन मिला था, उसके प्रतिनिधि सभा में आगे बढ़ने को लेकर अब सवाल खड़े हो गए हैं। बिल में रूस के बड़े तेल खरीदारों पर 100 प्रतिशत तक अतिरिक्त टैरिफ लगाने का प्रावधान है। भारत भी रूस से बड़ी मात्रा में कच्चा तेल खरीदता है, इसलिए इस प्रस्ताव को लेकर नई दिल्ली की चिंता बढ़ी हुई थी। अब अमेरिकी सांसदों के बीच मतभेद बढ़ने से भारत को कुछ समय की राहत मिलने की उम्मीद है।
भारत पर 100% टैरिफ की तलवार क्यों लटकी थी?
प्रस्तावित अमेरिकी कानून का मकसद रूस पर आर्थिक दबाव बढ़ाना है। इसके तहत अमेरिकी राष्ट्रपति को रूस से कच्चा तेल और प्राकृतिक गैस खरीदने वाले पांच बड़े देशों पर 100 प्रतिशत तक टैरिफ लगाने की ताकत मिल सकती है। इसके अलावा रूस को पश्चिमी प्रतिबंधों से बचने में मदद करने वाले प्रमुख देशों को भी इसके दायरे में लाने की बात कही गई है। भारत, चीन और तुर्किये रूस के बड़े ऊर्जा खरीदारों में शामिल हैं। ऐसे में बिल लागू होने पर भारत से अमेरिका जाने वाले सामान पर भारी अतिरिक्त शुल्क लगने का खतरा पैदा हो सकता था।
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सीनेट से पास, लेकिन हाउस में फंसा बिल
इस बिल को अमेरिकी सीनेट में 86-11 के भारी बहुमत से मंजूरी मिल चुकी है। हालांकि, प्रतिनिधि सभा में इसकी राह आसान नहीं दिखाई दे रही। हाउस स्पीकर माइक जॉनसन ने संकेत दिया है कि नवंबर में होने वाले मध्यावधि चुनाव से पहले इस पर मतदान मुश्किल हो सकता है, सांसदों के बीच सबसे बड़ी चिंता यह है कि कानून राष्ट्रपति को टैरिफ लगाने की बहुत व्यापक शक्ति दे सकता है। कुछ डेमोक्रेट सांसद इस तरह की शक्ति देने के खिलाफ हैं। रिपब्लिकन खेमे में भी बिल के कुछ प्रावधानों को लेकर पूरी सहमति नहीं है।
अमेरिका में तेल महंगा होने का भी डर
बिल को लेकर सिर्फ भारत और चीन की चिंता नहीं है। अमेरिकी सांसदों को आशंका है कि रूस से तेल खरीदने वाले देशों पर दबाव बढ़ने से वैश्विक तेल बाजार में कीमतें ऊपर जा सकती हैं। अगर भारत जैसे बड़े खरीदार अचानक रूस से तेल लेना कम करते हैं, तो उन्हें दूसरे देशों से कच्चा तेल खरीदना पड़ेगा। इससे अंतरराष्ट्रीय बाजार में मांग और कीमत दोनों पर असर पड़ सकता है। अमेरिका में पेट्रोल की कीमतों का मुद्दा मध्यावधि चुनाव से पहले राजनीतिक रूप से भी अहम है।
भारत के आयात खर्च और महंगाई
विदेश मंत्री एस. जयशंकर पहले ही कह चुके हैं कि भारत की प्राथमिकता अपने 1.4 अरब लोगों के लिए ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करना है। उनका कहना है कि रूस-यूक्रेन संघर्ष का समाधान तेल या दूसरे सामान की खरीद रोकने से नहीं बल्कि बातचीत और कूटनीति से होना चाहिए। आंकड़ों के मुताबिक, वित्त वर्ष 2025-26 में भारत ने करीब 134.7 अरब डॉलर का कच्चा तेल आयात किया। इसमें रूस की हिस्सेदारी लगभग 30.3 प्रतिशत रही। रूस से मिलने वाले अपेक्षाकृत सस्ते तेल ने भारत के आयात खर्च और महंगाई को नियंत्रित रखने में मदद की है।
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नवंबर चुनाव तक मिल सकती है राहत
फिलहाल सबसे अहम बात यह है कि बिल अमेरिकी प्रतिनिधि सभा में अटक सकता है। अगर नवंबर के मध्यावधि चुनाव तक इस पर फैसला नहीं होता, तो भारत पर 100 प्रतिशत टैरिफ का तत्काल खतरा टल जाएगा। हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि मामला पूरी तरह खत्म हो गया है। चुनाव के बाद अमेरिकी सांसद इस प्रस्ताव को नए बदलावों के साथ फिर आगे बढ़ा सकते हैं।



















