होर्मुज स्ट्रेट खुलना राहत की शुरुआत जरूर है, लेकिन तुरंत समाधान नहीं। सप्लाई चेन को पूरी तरह सामान्य होने में समय लगेगा, इसलिए आने वाले दिनों में भी उपभोक्ताओं को और की जरूरत होगी।
भारत की एलपीजी जरूरत का बड़ा हिस्सा विदेशों से आता है, जिससे सप्लाई पूरी तरह अंतरराष्ट्रीय हालात पर निर्भर रहती है। खास बात यह है कि आयात का अधिकांश हिस्सा होर्मुज स्ट्रेट के जरिए ही भारत पहुंचता है। यही वजह है कि इस समुद्री मार्ग में जरा सी भी बाधा देशभर में गैस की उपलब्धता को प्रभावित कर देती है। जैसे ही तनाव बढ़ा, सप्लाई चेन पर दबाव दिखने लगा और इसका असर सीधे उपभोक्ताओं पर पड़ा।
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होर्मुज स्ट्रेट के खुलने से जहाजों की आवाजाही जरूर आसान हो जाएगी, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि तुरंत गैस की कमी खत्म हो जाएगी। एलपीजी की सप्लाई एक लंबी प्रक्रिया से गुजरती है। जहाज बंदरगाह पर पहुंचने के बाद गैस को बॉटलिंग प्लांट तक ले जाया जाता है, फिर सिलेंडरों में भरकर डिस्ट्रीब्यूटर्स तक भेजा जाता है। इस पूरी प्रक्रिया में हर खेप को तैयार होने में 2 से 3 दिन का समय लग जाता है।
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विशेषज्ञों का मानना है कि सप्लाई पूरी तरह पटरी पर आने में कुछ दिन से लेकर दो हफ्ते तक का समय लग सकता है। यह इस बात पर निर्भर करेगा कि जहाज कितनी तेजी से पहुंचते हैं और वितरण तंत्र कितनी कुशलता से काम करता है।स्थिति को संभालने के लिए सरकार ने कुछ कदम भी उठाए हैं। शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों में सिलेंडर बुकिंग के बीच समय बढ़ाया गया है, वहीं रिफाइनरियों को उत्पादन बढ़ाने के निर्देश दिए गए हैं ताकि मांग और सप्लाई के बीच संतुलन बनाया जा सके।