Hope Diamond History ; 45.52 कैरेट का मशहूर हीरा डाक से पहुंचा था Smithsonian! 1 मिलियन डॉलर के हीरे को भूरे कागज में लपेटकर भेजा गया था

वॉशिंगटन। दुनिया के सबसे कीमती और प्रसिद्ध हीरों में शामिल होप डायमंड (Hope Diamond) की कहानी किसी रोमांचक फिल्म से कम नहीं है। इस हीरे को एक समय शाही खजानों की शोभा माना जाता था, इसके साथ करोड़ों की संपत्ति जुड़ी रही और इसके कथित श्राप की कहानियां भी काफी मशहूर हुईं। लेकिन इस बेशकीमती रत्न को एक बार बेहद साधारण तरीके से एक जगह से दूसरी जगह पहुंचाया गया था। साल 1958 में अमेरिकी जौहरी हैरी विंस्टन ने 45.52 कैरेट के इस दुर्लभ हीरे को किसी विशेष सुरक्षा काफिले या भारी सुरक्षा व्यवस्था के बिना अमेरिकी डाक सेवा (US Postal Service) के जरिए भेज दिया था। उन्होंने इसे रजिस्टर्ड मेल के माध्यम से न्यूयॉर्क से वाशिंगटन DC स्थित स्मिथसोनियन इंस्टीट्यूशन तक पहुंचाया। स्मिथसोनियन के नेशनल पोस्टल म्यूजियम और स्मिथसोनियन इंस्टीट्यूशन आर्काइव्स के दस्तावेजों के मुताबिक, इस पार्सल को भेजने में कुल 145.29 डॉलर खर्च हुए थे। इस रकम में हीरे का बीमा भी शामिल था। हीरे की कीमत करीब 1 मिलियन डॉलर थी।
छोटे सा पैकेट बना कर भेज दिया था हीरा
सबसे हैरान करने वाली बात यह थी कि इतने कीमती रत्न को भूरे रंग के साधारण कागज में लपेटकर एक सामान्य पार्सल की तरह भेजा गया था। बाहर से देखने पर किसी को भी अंदाजा नहीं हो सकता था कि इस छोटे से पैकेट में दुनिया के सबसे चर्चित हीरों में से एक मौजूद है।
भारत की खदानों से शुरू हुआ सफर
होप डायमंड का इतिहास भारत से जुड़ा हुआ है। उपलब्ध ऐतिहासिक दस्तावेजों के अनुसार, इस हीरे की खोज 1668 से पहले भारत में हुई थी। इसके बाद यह कई महत्वपूर्ण शाही और निजी संग्रहों का हिस्सा बना। बाद में फ्रांस के राजा लुई XIV ने इस हीरे को खरीद लिया और इसे फ्रांसीसी शाही खजाने में शामिल कर लिया गया। उस समय इसका वजन लगभग 112 कैरेट था और इसे 'फ्रेंच ब्लू' (French Blue) के नाम से पहचाना जाता था। इसकी खूबसूरती और दुर्लभता के कारण यह फ्रांस के शाही संग्रह का एक बेहद खास हिस्सा बन गया था। हालांकि, फ्रांसीसी क्रांति के दौरान शाही खजाने की कई दूसरी कीमती वस्तुओं के साथ यह हीरा भी रहस्यमय तरीके से गायब हो गया।
फ्रांस से लंदन पहुंचा हीरा, फिर मिला Hope परिवार का नाम
हीरे के इतिहास में अगला महत्वपूर्ण मोड़ 19वीं सदी की शुरुआत में आया, जब यह लंदन में दोबारा दिखाई दिया। हालांकि, तब तक इसके मूल आकार में बदलाव हो चुका था और इसे पहले की तुलना में छोटा तराश दिया गया था। साल 1830 तक यह ब्रिटिश बैंकर और कीमती रत्नों के संग्रहकर्ता हेनरी फिलिप होप के पास पहुंच गया। उनके परिवार के नाम के कारण ही इस प्रसिद्ध रत्न को आगे चलकर 'Hope Diamond' के नाम से जाना जाने लगा। इसके बाद भी यह हीरा अलग-अलग मालिकों के हाथों से गुजरता रहा और इसकी प्रसिद्धि लगातार बढ़ती गई।
एवलिन मैक्लीन के पास आने के बाद क्यों चर्चा में आया श्राप
साल 1912 में अमेरिकी सोशलाइट एवलिन वॉल्श मैक्लीन ने इस हीरे को खरीद लिया। उनके पास पहुंचने के बाद होप डायमंड की चर्चा सिर्फ इसकी कीमत और खूबसूरती तक सीमित नहीं रही, बल्कि इससे जुड़ी बदकिस्मती और श्राप की कहानियां भी लोकप्रिय होने लगीं। कई लोगों ने इस रत्न को दुर्भाग्य से जोड़कर देखना शुरू कर दिया। हालांकि, हीरे के श्राप से जुड़ी इन कहानियों की कभी कोई ठोस पुष्टि नहीं हुई। इसके बावजूद यह रहस्यमय किस्सों और चर्चाओं का हिस्सा बना रहा।
Harry Winston ने खरीदा और फिर Smithsonian को कर दिया दान
एवलिन वॉल्श मैक्लीन की मृत्यु के कई साल बाद, 1949 में प्रसिद्ध अमेरिकी जौहरी हैरी विंस्टन ने उनकी संपत्ति से यह दुर्लभ हीरा हासिल किया। करीब एक दशक बाद, 1958 में हैरी विंस्टन ने इसे स्मिथसोनियन इंस्टीट्यूशन को दान करने का फैसला किया। उनका उद्देश्य अमेरिका में कीमती रत्नों का एक राष्ट्रीय संग्रह तैयार करने में योगदान देना था। इसी फैसले के बाद 45.52 कैरेट का होप डायमंड न्यूयॉर्क से वाशिंगटन DC तक रजिस्टर्ड डाक के जरिए पहुंचा। जिस रत्न ने भारतीय खदानों से निकलकर फ्रांस के शाही खजाने, ब्रिटिश संग्रहकर्ताओं और अमेरिकी अमीर परिवारों तक का सफर तय किया था, वह आखिरकार स्मिथसोनियन के संग्रह का हिस्सा बन गया। आज Hope Diamond की पहचान केवल एक बेशकीमती हीरे के रूप में नहीं, बल्कि सदियों पुराने इतिहास, शाही विरासत और रहस्यमयी कहानियों से जुड़े एक अनमोल रत्न के तौर पर भी है।




















