RedAlert Tomato; नाइट्रोजन की कमी होते ही रंग बदलेंगे टमाटर के पौधे! कॉर्नेल यूनिवर्सिटी ने किया विकसित

न्यूयॉर्क। खेती में फसलों को सही मात्रा में पोषक तत्व उपलब्ध कराना किसानों के लिए हमेशा एक बड़ी चुनौती रहा है। खासतौर पर मिट्टी में नाइट्रोजन की कमी का समय रहते पता लगाना जरूरी होता है। इसी समस्या का समाधान खोजने के लिए अमेरिका की कॉर्नेल यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों ने एक अनोखी तकनीक विकसित की है। उन्होंने ऐसे आनुवंशिक रूप से संशोधित (जेनेटिकली मॉडिफाइड) टमाटर के पौधे तैयार किए हैं, जो मिट्टी में नाइट्रोजन की कमी होने पर अपना रंग बदलकर लाल-बैंगनी कर लेते हैं। RedAlert नाम दिए गए इन टमाटर के पौधों को एक तरह के 'लिविंग सेंसर' यानी जीवित जैविक सेंसर के रूप में विकसित किया गया है। इनका रंग बदलना किसानों के लिए संकेत होगा कि पौधों को पर्याप्त नाइट्रोजन नहीं मिल रही है और खेत में खाद डालने की जरूरत पड़ सकती है।
वास्तविक खेतों में आजमाया जा रहा
अब तक इन पौधों का परीक्षण ग्रीनहाउस तक सीमित था, लेकिन अब इन्हें वास्तविक खेतों में भी आजमाया जा रहा है। न्यूयॉर्क के ऑरोरा में स्थित कॉर्नेल यूनिवर्सिटी के मस्ग्रेव रिसर्च फार्म में इनका फील्ड ट्रायल चल रहा है। 30 जुलाई को आयोजित '2026 ऑरोरा फार्म फील्ड डे' के दौरान किसानों और अन्य आगंतुकों को इस तकनीक को देखने का मौका मिला। इस कार्यक्रम में कृषि क्षेत्र से जुड़े विभिन्न शोध और नई तकनीकों का प्रदर्शन किया गया था। कॉर्नेल क्रॉनिकल की सितंबर में प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार, जब इन पौधों को पर्याप्त नाइट्रोजन नहीं मिलती, तो वे बीटानिन (Betanin) नामक पिगमेंट का उत्पादन करने लगते हैं। यही प्राकृतिक रंगद्रव्य चुकंदर को उसका विशिष्ट लाल-बैंगनी रंग प्रदान करता है। वैज्ञानिकों का मानना है कि यह तकनीक भविष्य में किसानों को मिट्टी में पोषक तत्वों की कमी का शुरुआती स्तर पर पता लगाने और जरूरत के अनुसार खाद का इस्तेमाल करने में मदद कर सकती है।
RedAlert Tomato: नाइट्रोजन की कमी से क्यों बदल जाता है पौधों का रंग
इस अनोखे प्रयोग की सबसे खास बात पौधों की जैविक संकेत देने की क्षमता है। RedAlert टमाटर के पौधों को इस तरह जेनेटिकली इंजीनियर किया गया है कि वे अपनी जड़ों के आसपास मौजूद नाइट्रोजन की उपलब्धता को पहचान सकें। जब पौधों को पर्याप्त नाइट्रोजन नहीं मिलती, तो उनके भीतर एक जैविक संकेत प्रणाली सक्रिय हो जाती है। इसके बाद यह जानकारी पौधों के तनों तक पहुंचती है और संशोधित पौधे बीटानिन का उत्पादन शुरू कर देते हैं। बीटानिन के कारण पौधों का रंग सामान्य हरे रंग से बदलकर लाल-बैंगनी दिखाई देने लगता है। इस तरह किसानों को बिना किसी जटिल जांच के फसल में नाइट्रोजन की संभावित कमी का एक दृश्य संकेत मिल सकता है।
CROPPS प्रोजेक्ट के तहत विकसित किए गए RedAlert पौधे
RedAlert Tomato परियोजना कॉर्नेल यूनिवर्सिटी के 'सेंटर फॉर रिसर्च ऑन प्रोग्रामेबल प्लांट सिस्टम्स' (CROPPS) का हिस्सा है। इस रिसर्च सेंटर का मुख्य उद्देश्य ऐसी तकनीकें विकसित करना है, जिनके जरिए पौधों को उनके आसपास के वातावरण की परिस्थितियों के बारे में संकेत देने में सक्षम बनाया जा सके। इसके तहत वैज्ञानिक ऐसे पौधों पर काम कर रहे हैं, जो मिट्टी और पर्यावरण में होने वाले बदलावों को अपनी जैविक प्रतिक्रियाओं के माध्यम से प्रदर्शित कर सकें। रंग बदलने वाले टमाटरों का शुरुआती विचार वैज्ञानिक मार्गरेट फ्रैंक ने प्रस्तुत किया था। इसके बाद नाइट्रोजन का पता लगाने वाली प्रणाली पर शुरुआती शोध में ब्रैंडन विलियम्स और यिनन वू ने योगदान दिया। इस तकनीक को आगे बढ़ाते हुए डॉक्टरेट के छात्रों जैकब बेल्डिंग और एवा फोरिस्टेक ने RedAlert लिविंग सेंसर विकसित किए।
2025 में मिला 5,000 डॉलर का पुरस्कार
RedAlert तकनीक को शोध और नवाचार के क्षेत्र में पहचान भी मिल चुकी है। नेशनल इन्वेंटर्स हॉल ऑफ फेम के अनुसार, इस आविष्कार ने 2025 कॉलेजिएट इन्वेंटर्स प्रतियोगिता में स्नातक उपविजेता पुरस्कार हासिल किया था। इस उपलब्धि के लिए शोधकर्ताओं को 5,000 डॉलर की पुरस्कार राशि भी प्रदान की गई।
क्या RedAlert टमाटर खाने के लिए इस्तेमाल होंगे
इस परियोजना का उद्देश्य बाजार में खाने के लिए जेनेटिकली मॉडिफाइड टमाटर उपलब्ध कराना नहीं है। इन पौधों को मुख्य रूप से खेती में नाइट्रोजन की उपलब्धता का पता लगाने वाले जैविक सेंसर के रूप में तैयार किया गया है। भविष्य में इन्हें सामान्य फसलों के साथ खेतों में लगाया जा सकता है। इससे किसान आसपास की मिट्टी में नाइट्रोजन की स्थिति पर नजर रख सकेंगे और जरूरत के हिसाब से खाद का इस्तेमाल कर पाएंगे। वैज्ञानिकों को उम्मीद है कि RedAlert जैसी तकनीकें खेती को अधिक सटीक और संसाधनों के लिहाज से बेहतर बनाने में मददगार साबित होंगी। यदि खेतों में इसका प्रयोग सफल रहता है, तो किसानों को अनावश्यक खाद डालने से बचने और फसलों को सही समय पर जरूरी पोषक तत्व उपलब्ध कराने का एक नया तरीका मिल सकता है।




















