जबलपुर स्थित मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने पंचायत कर्मियों और आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं से जुड़े मामलों को लेकर अहम टिप्पणी की है। कोर्ट ने कहा है कि अगर सरकार पहल करे और इन विवादों को शुरुआती स्तर पर ही सुलझाए तो न सिर्फ हजारों मुकदमे कम हो सकते हैं बल्कि कर्मचारियों का पैसा भी बचेगा। इसी के साथ कोर्ट ने राज्य के महाधिवक्ता को नोटिस जारी कर इस दिशा में नीति बनाने पर विचार करने को कहा है। मामले की अगली सुनवाई 8 अप्रैल को होगी।
चीफ जस्टिस संजीव सचदेवा और जस्टिस विनय सराफ की डिवीजन बेंच ने कहा कि पंचायत कर्मी, आंगनबाड़ी कार्यकर्ता और ग्राम रोजगार सहायक जैसे कर्मचारी हर महीने 8 से 10 हजार रुपए ही कमा पाते हैं। इसके बावजूद उन्हें छोटे-छोटे विवादों के लिए हाईकोर्ट आना पड़ता है और उनकी कमाई का बड़ा हिस्सा मुकदमों में खर्च हो जाता है।
ये भी पढ़ें: रायसेन : खड़ी गेहूं की फसल में लगी भीषण आग, 50 एकड़ फसल जलकर राख
कोर्ट ने सुझाव दिया कि सरकार को एक उच्चस्तरीय समिति बनानी चाहिए, जो ऐसे मामलों को शुरुआती स्तर पर ही सुलझा सके। अगर ऐसा होता है तो कर्मचारियों को राहत मिलेगी और हाईकोर्ट में दाखिल होने वाले मामलों की संख्या भी कम होगी, जिससे पेंडेंसी घटेगी।
यह टिप्पणी सतना जिले के पंचायत कर्मी देवेंद्र सिंह के मामले की सुनवाई के दौरान आई। उन्हें हटाए जाने के खिलाफ दायर अपील पर सुनवाई करते हुए कोर्ट ने इस मुद्दे को गंभीरता से लिया। सिंगल बेंच से राहत न मिलने के बाद उन्होंने डिवीजन बेंच में अपील की थी। सुनवाई के दौरान कोर्ट ने संबंधित पक्षों को नोटिस जारी करने के निर्देश दिए और आवेदक के पक्ष में यथास्थिति बनाए रखने का अंतरिम आदेश भी दिया।
ये भी पढ़ें: एमपी में बदला मौसम का मिजाज: भोपाल में झमाझम बारिश, सीहोर में गिरे ओले
सुनवाई के दौरान कोर्ट ने यह भी कहा कि ऐसे कई मामले हैं, जिन्हें शुरुआत में ही प्रशासनिक स्तर पर हल किया जा सकता है। अगर ऐसा किया जाए तो कोर्ट पर अनावश्यक बोझ कम होगा और न्याय प्रक्रिया भी तेज हो सकेगी। कोर्ट की यह टिप्पणी साफ संकेत देती है कि छोटे कर्मचारियों से जुड़े विवादों को लेकर नई व्यवस्था की जरूरत है।