जबलपुर:पिता की मौत के बाद नाना के सहारे मुआवजे की लड़ाई लड़ रहे 3 बच्चे, हाईकोर्ट ने दिखाई संवेदनशीलता

मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने तीन नाबालिग बच्चों की मुआवजे की लड़ाई को गंभीरता से लेते हुए संवेदनशील टिप्पणी की है। कोर्ट ने कहा है कि अंतिम फैसला सुनाने से पहले बच्चों के पिता के रोजगार से जुड़े जरूरी दस्तावेजों पर जरूर विचार किया जाए। यह मामला 12 वर्षीय शेखर, 11 वर्षीय मिष्टी और 9 वर्षीय सृष्टि से जुड़ा है जो अपने पिता की मौत के बाद मुआवजे के लिए कानूनी लड़ाई लड़ रहे हैं। इस संघर्ष में बच्चों का सहारा उनके नाना प्रेमदास बने हैं।
रेल प्रोजेक्ट में काम के दौरान हुई थी मौत
तीनों बच्चों के पिता कुलपत दास कुलदीप कटनी-सिंगरौली रेल लाइन के दोहरीकरण प्रोजेक्ट में काम कर रहे थे। 19 दिसंबर 2018 को एक मालगाड़ी से गिरा कोयले का बड़ा टुकड़ा उनके ऊपर आ गिरा जिससे उनकी मौत हो गई थी। इसके बाद कुलपत की पत्नी बबली ने वर्ष 2019 में कर्मचारी क्षतिपूर्ति अधिनियम के तहत लेबर कोर्ट में मुआवजे का दावा दायर किया था।
मां की मौत के बाद नाना ने संभाली जिम्मेदारी
मुआवजे का मामला अभी लंबित ही था कि 3 नवंबर 2023 को बच्चों की मां बबली का भी निधन हो गया। इसके बाद बच्चों के नाना प्रेमदास ने तीनों नाबालिग बच्चों की ओर से कानूनी लड़ाई की जिम्मेदारी संभाली।
जरूरी दस्तावेज रिकॉर्ड पर नहीं थे
लेबर कोर्ट में 4 मई 2026 को मामले में अंतिम बहस पूरी हो चुकी थी। इसी दौरान बच्चों और उनके नाना को पता चला कि कुलपत दास के रोजगार से जुड़े अहम दस्तावेज अब तक रिकॉर्ड पर पेश ही नहीं किए गए हैं। नाबालिग होने के कारण बच्चों के पास वे दस्तावेज मौजूद नहीं थे। ऐसे में उन्होंने दस्तावेज रिकॉर्ड पर लेने की मांग करते हुए आवेदन लगाया। लेकिन आरोप है कि लेबर कोर्ट ने आवेदन पर फैसला किए बिना ही मामले में निर्णय की तारीख तय कर दी। इसके बाद बच्चों की ओर से हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया गया।
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हाईकोर्ट ने दिया अहम निर्देश
जस्टिस विवेक जैन की सिंगल बेंच ने मामले की गंभीरता और बच्चों की स्थिति को देखते हुए कर्मचारी क्षतिपूर्ति आयुक्त (लेबर कोर्ट) को निर्देश दिए हैं कि पहले दस्तावेजों से जुड़ी अर्जी पर फैसला लिया जाए। इसके बाद ही मामले में अंतिम निर्णय सुनाया जाए। कोर्ट ने यह भी कहा कि यदि आवेदन खारिज किया जाता है तो बच्चों को उस आदेश को चुनौती देने के लिए पर्याप्त समय दिया जाए।
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बच्चों की ओर से यह दलील दी गई
सुनवाई के दौरान बच्चों की ओर से अधिवक्ता राकेश सिंह ने अदालत को बताया कि 6 मई 2026 को आवेदन के साथ तत्काल सुनवाई की मांग भी की गई थी लेकिन उस पर सुनवाई नहीं हुई। हाईकोर्ट ने पूरे मामले में मानवीय पहलू को अहम मानते हुए बच्चों के हितों की सुरक्षा पर जोर दिया।












