Manisha Dhanwani
5 Feb 2026
नरेश भगोरिया, भोपाल। मप्र राज्य का गठन एक नवंबर 1956 को हुआ। इसके डेढ़ महीने बाद 17 दिसंबर 1956 को विधासभा का पहला सम्मेलन बुलाया गया। सबसे बड़ा सवाल था कि कोई विधानसभा तो थी नहीं, तो सम्मेलन कहां हो? काफी विचार-विमर्श के बाद तय किया गया कि मिंटो हॉल में विधानसभा की कार्यवाही संचालित की जा सकती थी। उन दिनों मिंटो हॉल में हमीदिया कॉलेज लगता था। विधानसभा के पहले अधिवेशन के लिए यह जगह मुफीद लगी। विधासभा के पहले अध्यक्ष चुने गए थे कुंजीलाल दुबे जबकि विपक्ष के नेता विश्वनाथ तामस्कर थे।
पहली विधानसभा बहुत विशालकाय थी। इसमें 288 सदस्य थे। इनमें मध्य प्रांत और महाकौशल के सबसे ज्यादा सदस्य थे। इसके बाद मध्यभारत और विंध्य प्रदेश का नंबर आता था। भोपाल के ही कुल 30 सदस्य थे। वर्ष 1967 में सदस्य संख्या 296 हो गई थी। वर्ष 1977 में कुल 320 सदस्य हो गए। वर्ष 2000 में छत्तीसगढ़ बनने के बाद 90 विधायक नए राज्य में गिने जाने लगे। इस तरह कुल विधायकों की संख्या 230 हो गई। वर्तमान सदन में भी 230 सदस्य हैं।
पहली विधानसभा से तीसरी विधानसभा तक मान्यता प्राप्त विरोधी दल नहीं था। वर्ष 1962 में जनसंघ के नेता वीरेंद्र कुमार सखलेचा विधिवत रूप से विरोधी दल के नेता चुने गए। उल्लेखनीय है कि 1962 मप्र में 230 में से 41 जनसंघ के विधायक चुनकर आए थे।
पहली विधानसभा में सभापति कुंजीलाल दुबे ने कहा कि ‘मैंने आज सुबह राज्यपाल महोदय के सामने शपथ ग्रहण की है अब माननीय मुख्यमंत्री से आरंभ करते हुए हर सदस्य मेरे सामने आकर शपथ ग्रहण करेंगे।’ जब 40 सदस्य शपथ ले चुके थे तो मध्यभारत प्रांत के जनसंघ के विधायक रामचंद्र विट्ठल बड़े ने व्यवस्था पर प्रश्न उठाया और कहा कि जब वर्तमान सदस्य पहले ही अपनी मूल विधानसभा यानी पुराने मध्य प्रदेश, विंध्य प्रदेश और भोपाल विधानसभा में सदस्य के रूप में शपथ ले चुके हैं तो दोबारा यह कसरत क्यों कराई जा रही है, उसका क्या कोई संवैधानिक औचित्य है? समाजवादी सदस्य ठाकुर निरंजन सिंह ने बड़े की बात का समर्थन किया। तब सभापति ने रूलिंग दी कि इस तरह का प्रश्न उठाने का अधिकार सदस्य को नहीं है। इस तरह पहली विधानसभा में यह पहला विवाद था।
मप्र की पहली विधानसभा जिस मिंटो हॉल में लगती थी उसकी आधारशिला खुद लॉर्ड मिंटो ने 12 नवंबर 1909 को रखी थी। इसका स्वरूप इंग्लैंड के किंग जॉर्ज पंचम के मुकुट की तरह रखा गया। यह इमारत 24 वर्षों में बनकर तैयार हुई थी। सुल्तान जहां बेगम ने इसका निर्माण कराया था। इसक विशिष्ठ अतिथियों के ठहरने की जगह के रूप में उपयोग किया गया। इसके बाद इसे सेना का मुख्यालय बनाया गया। इसके बाद इसमें कुछ दिनों तक वित्त विभाग का दफ्तर भी चला। एक समिति के सुझाव पर इसे होटल के रूप में परिवर्तित कर दिया गया। इस तरह मिंटो हॉल कुछ सालों तक होटल लेक व्यू रहा। फिर इसमें हमीदिया कॉलेज संचालित हुआ। वर्तमान में यह कुशाभाऊ ठाकरे कन्वेंशन सेंटर के रूप में जाना जाता है।