फादर्स डे स्पेशल:जन्म नहीं दिया लेकिन पिता से बढ़कर निभाया रिश्ता, चाचा ने गढ़ा सनराइजर्स हैदराबाद का उभरता सितारा

पल्लवी वाघेला, भोपाल। IPL 2026 के दौरान जब सनराइजर्स हैदराबाद के युवा बल्लेबाज अनिकेत वर्मा का नाम देशभर में चर्चा का विषय बना, तब उनकी शानदार पारियों के पीछे छिपे संघर्ष की कहानी भी लोगों के सामने आई। यह कहानी सिर्फ एक क्रिकेटर की सफलता की नहीं बल्कि उस शख्स के त्याग, समर्पण और तपस्या की भी है जिसने अनिकेत को जन्म तो नहीं दिया लेकिन एक पिता से बढ़कर उनका भविष्य संवारा। यह शख्स हैं अनिकेत के चाचा अमित वर्मा, जिन्हें अनिकेत अपनी पूरी दुनिया मानते हैं। फादर्स डे के मौके पर अनिकेत कहते हैं मैं जो कुछ भी हूं, उसमें मेरे चाचा का सबसे बड़ा योगदान है। उन्होंने मुझे कभी पिता की कमी महसूस नहीं होने दी।
तीन साल की उम्र में मां का साया उठा
अनिकेत की जिंदगी में संघर्ष बहुत छोटी उम्र से शुरू हो गया था। जब वह महज तीन साल के थे तभी उनकी मां का निधन हो गया। उस समय उनके चाचा अमित वर्मा की उम्र भी करीब 16 साल थी। कुछ समय बाद अनिकेत के पिता ने दूसरी शादी कर ली और परिवार की परिस्थितियां बदल गईं। ऐसे मुश्किल दौर में अमित वर्मा और अनिकेत की दादी ने बच्चे की पूरी जिम्मेदारी अपने कंधों पर उठा ली। अनिकेत को झांसी से भोपाल लाया गया ताकि उसे बेहतर माहौल और भविष्य मिल सके। उस समय शायद किसी ने नहीं सोचा होगा कि यही बच्चा एक दिन आईपीएल में अपनी पहचान बनाएगा।
18 साल की उम्र में शुरू किया काम
अनिकेत के बेहतर भविष्य के लिए अमित वर्मा ने बहुत कम उम्र में ही जिम्मेदारियां उठानी शुरू कर दी थीं। उन्होंने 18 साल की उम्र में नौकरी करना शुरू कर दिया ताकि भतीजे की पढ़ाई और क्रिकेट से जुड़ी जरूरतें पूरी की जा सकें। अमित बताते हैं कि उस समय उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती यह थी कि अनिकेत क्रिकेट में करियर बनाना चाहता था। क्रिकेट ऐसा क्षेत्र है जहां सफलता की कोई गारंटी नहीं होती। वह कहते हैं मुझे हमेशा डर रहता था कि अगर अनिकेत सफल नहीं हुआ तो लोग मुझे ही जिम्मेदार ठहराएंगे। लोग कहेंगे कि मैं उसे भोपाल लेकर आया और क्रिकेट के पीछे लगाकर उसका भविष्य खराब कर दिया।
तीन हजार की नौकरी, उधार लेकर पूरे किए क्रिकेट के खर्च
अनिकेत का क्रिकेट सफर आसान नहीं था। शुरुआत में उन्होंने रेलवे अकादमी में प्रशिक्षण लिया। करीब तीन साल बाद वहां के कोच ने सलाह दी कि अगर अनिकेत को आगे बढ़ना है तो उसे बेहतर प्रशिक्षण की जरूरत होगी। इसके बाद अनिकेत को अंकुर क्रिकेट अकादमी भेजा गया, जहां कोच प्रकाश त्यागी युवा खिलाड़ियों को प्रशिक्षण दे रहे थे। अमित वर्मा बताते हैं कि उस समय उनकी मासिक आय केवल तीन हजार रुपये थी। क्रिकेट किट, यात्रा, प्रशिक्षण और अन्य खर्चों को पूरा करना बेहद मुश्किल था। कई बार उधार लेकर खर्च पूरे किए। कई रातें ऐसी भी रहीं जब चिंता में नींद नहीं आती थी। लेकिन मैंने कभी अनिकेत को यह महसूस नहीं होने दिया कि उसकी वजह से घर पर आर्थिक दबाव है।
प्रतिभा देख कोच ने भी बढ़ाया मदद का हाथ
संघर्ष के बीच भगवान ने भी जैसे राह बनानी शुरू कर दी। अनिकेत की प्रतिभा देखकर उनके कोचों ने भी हर संभव मदद की। अमित बताते हैं कि कई बार फीस लेने के बजाय कोचों ने क्रिकेट का सामान उपलब्ध कराया और हर कदम पर सहयोग किया। इसी समर्थन और अनिकेत की मेहनत ने धीरे-धीरे सफलता का रास्ता तैयार किया। आज जब अनिकेत आईपीएल में अपनी पहचान बना चुके हैं, तब उन संघर्षों को याद कर अमित भावुक हो जाते हैं।
अनिकेत बोले- चाचा ही मेरी पूरी दुनिया हैं
अनिकेत वर्मा कहते हैं कि असली संघर्ष उनका नहीं बल्कि उनके चाचा का रहा है। वह कहते हैं अभावों के बीच भी उन्होंने कभी मुझे किसी चीज के लिए मना नहीं किया। आज भी जब मैं घर जाता हूं तो सबसे पहले उनके पास जाता हूं और उनकी गोद में सिर रखकर बैठता हूं। मेरे लिए वो सिर्फ चाचा नहीं, मेरी पूरी दुनिया हैं।
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अपने बच्चे की खुशी टालकर भतीजे का सपना पूरा किया
अमित वर्मा के त्याग की सबसे बड़ी मिसाल यह है कि उन्होंने अपनी शादी के बाद भी कई वर्षों तक अपना परिवार बढ़ाने का फैसला टाल दिया। उनकी शादी को करीब दस साल हो चुके हैं लेकिन उन्होंने और उनकी पत्नी ने पहले ही तय कर लिया था कि जब तक अनिकेत अपने करियर में स्थिर नहीं हो जाता और अपने सपनों की राह पर आगे नहीं बढ़ जाता, तब तक वे बेबी प्लान नहीं करेंगे। अमित कहते हैं हम दोनों ने मिलकर यह फैसला लिया था। आज अनिकेत को आगे बढ़ते देखकर लगता है कि हमारी तपस्या रंग ला रही है। लेकिन यह सिर्फ शुरुआत है। मेरा सपना है कि वह भारतीय क्रिकेट टीम के लिए खेले, देश को ट्रॉफी दिलाए और एक दिन वह ट्रॉफी मुझे समर्पित करे।
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एक चाचा जिसने पिता से बढ़कर निभाया रिश्ता
फादर्स डे पर अनिकेत और अमित वर्मा की यह कहानी बताती है कि रिश्ते सिर्फ खून से नहीं बल्कि त्याग, प्रेम और समर्पण से बनते हैं। एक चाचा ने अपने सपनों को पीछे रखकर भतीजे के सपनों को अपनी मंजिल बना लिया और आज वही बच्चा भारतीय क्रिकेट के बड़े मंच पर अपनी पहचान बना रहा है। यह कहानी उन सभी अभिभावकों और संरक्षकों को समर्पित है जो बिना किसी अपेक्षा के अपने बच्चों के सपनों को साकार करने में पूरी जिंदगी लगा देते हैं।












